इंदौर के भागीरथपुरा में सीवर का पानी पहुंचा था घरों में, 36 लोगों की मौत के लिए कई लोग जिम्मेदार

खबर सार :-

बुधवार को मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ की वेबसाइट पर अपलोड हुई रिपोर्ट में भागीरथपुरा इलाके में 36 लोगों की मौत का कारण व्यवस्थागत चूक है। इसमें सीवर का पानी पाइपों के जरिए घरों में पहुंचा था। यही दूषित पानी पीकर लोग बीमार हुए और उनमें करीब 36 लोगों की जान चली गई।
इंदौर के भागीरथपुरा में 36 लोगों की मौत का खुलासा : घरों में पहुंचा था सीवर का पानी

खबर विस्तार : -

इंदौर, मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के भागीरथपुरा इलाके में दिसंबर 2025 में दूषित पानी पीने से बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए थे। इनमें से 36 लोगों की जानें चली गईं थी। इस घटना को लेकर पूरे देश में सरकार के खिलाफ नाराजगी देखी गई थी। 36 लोगों की मौत की जिम्मेदारी तय करने के लिए एक सदस्यीय जांच आयोग गठित किया था। इसकी रिपोर्ट में व्यवस्थागत लंबी चूक मानी गई है। बुधवार को मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ की वेबसाइट पर इसे अपलोड किया गया है। इस रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। 

 दिसंबर 2025 में बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए थे। एक-’एक कर इनमें से 36 लोगों की जानें चली गईं। यह मामला काफी बढ गया था। इसलिए इसकी जांच कराने का निर्णय लिया गया था। सरकार ने एक सदस्यीय जांच आयोग गठित कर जल्द रिपोर्ट देने के लिए कहा था। इसी मामले की रिपोर्ट सामने आई है। इसमें दूषित पानी को घटना का मुख्य कारण माना गया है। यह घटना तकनीकी, प्रशासनिक और निगरानी संबंधी विफलताओं का सामूहिक परिणाम थी। 

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पहली जिम्मेदारी प्लानिंग करने वालों की

जांच रिपोर्ट में कहा गया कि भागीरथपुरा में दूषित पानी नलों में और लोगों के बीमार होने की जानकारी अफसरों और जनप्रतिनिधियों को फरवरी 2024 में ही मिल चुकी थी। इसके बाद भी किसी ने सुधार की गुंजाइश नहीं देखी। सीवरेज का दूषित पानी पेयजल पाइपलाइन में पहुंच रहा था। इसका मूल कारण सीवरेज नेटवर्क की गलत प्लानिंग व निर्माण है। रिपोर्ट के अनुसार आयोग ने 1990-95 के दौरान सीवरेज प्रोजेक्ट और 1999-2004 के दौरान वाटर सप्लाई पाइपलाइन बिछाने वाले तत्कालीन अधिकारियों, इंजीनियरों और तकनीकी अमले की भूमिका को जिम्मेदार माना है।

दूसरी जिम्मेदारी निगम के इंजीनियरों की

वर्षों में इन लाइनों की जांच, मेंटेनेंस, मॉनिटरिंग और खराब पाइपों को समय पर नहीं बदला गया। इसमें नगर निगम के इंजीनियरिंग और उनके अमले को भी जिम्मेदार माना है। सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर संजीव कुमार श्रीवास्तव, तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त संदीप सोनी, तत्कालीन इंचार्ज असिस्टेंट इंजीनियर सरोज कुमार प्रजापति के अलावा प्रज्ञा तिवारी और नीति चौरसिया खरे घटना के लिए जिम्मेदार बताए गए हैं। इसी रपोर्ट में कहा गया है कि टेंडर की अंतिम स्वीकृति की शक्ति तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त रोहित सिसोनिया के पास थी। उस अवधि की जिम्मेदारी उनकी भूमिका के अनुसार तय की जाएगी। 

पाइपें क्रास कर बिछा दी गईं

तकनीकी मानकों के मुताबिक अलग-अलग दूरी पर पाइप नहीं रखी थी। कुछ जगह दोनों पाइपलाइनें समानांतर या एक-दूसरे को क्रॉस करती मिलीं। इससे सीवरेज का पानी पेयजल लाइन में जाने का खतरा पैदा हुआ। रिपोर्ट में कहा गया कि यह किसी एक अधिकारी की गलती से नहीं हुआ। इसके लिए तीन दशक तक की जिम्मेदारी संभालने वाले भी जिम्मेदार हैंे। उच्च न्यायालय के निर्देश पर कोर्ट की वेबसाइट पर ऑनलाइन की गई भागीरथपुरा मामले की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि वर्ष 2024 से ही बस्ती में पथरी, पेट दर्द, पीलिया और टाइफाइड के मरीज आने लगे थे। 

क्षेत्रीय पार्षद ने रखा अपना पक्ष

क्षेत्रीय पार्षद कमल वाघेला ने जांच आयोग को अपना पक्ष रखा। उन्होंने इसमें बताया कि दूषित पानी नलों के जरिए पहुंच रहा था। इसकी जानकारी उनको थी। उन्होंने महापौर पुष्यमित्र भार्गव और जनप्रतिनिधियों को भी यह बात बताई। उसके बाद महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने पाइप बदलने के लिए टेंडर जारी करवाया और लाइन बदलने का काम शुरू हो गया था। बयान में बताया गया कि जब काम चल रहा था, तभी मरीज बढ़ते गए। 2023 में भी भागीरथपुरा में दूषित पानी की समस्या थी। लंबे समय तक यह पानी पीने से लोगों के लीवर और किडनी के बीमार बने।

राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी ने मामले को उछाला था

इंदौर के भागीरथपुरा में पिछले साल दिसंबर में भी दो हजार से ज्यादा लोग बीमार हुए थे। इनमें से करीब 600 से ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती कराए गए थे। इस मामले को लोकसभा स्तर पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने उछाला और भागीरथपुरा जाकर मृतकों के परिजनों से मिलेे। बाद में प्रदेश सरकार ने मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये का मुआवजा दिलाया और समाधान कराने का आदेश दिया। दरअसल, इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी घरों में पहुंचा और 36 लोगों की मौत हो गई थी। पहले की शिकायतों पर अधिकारी ध्यान नहीं दे रहे थे। जब 36 लोग मर गए, तब जाकर काम और जांच की जाने लगी। इसी मामले की बुधवार को मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ की वेबसाइट पर रिपोर्ट अपलोड की गई।

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