जौहर विश्वविद्यालय: ध्वस्तीकरण के आदेश को चुनौती, मैदान में कूदी सपा
खबर सार :-
रामपुर विकास प्राधिकरण के 38 भवनों को ध्वस्त करने के आदेश के खिलाफ मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय ने कमिश्नर कोर्ट में अपील दायर की है। मामले की सुनवाई 28 जुलाई को होगी, जबकि सपा ने भी प्रतिनिधिमंडल भेजने का ऐलान किया है।
खबर विस्तार : -
रामपुर: रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) द्वारा मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की 38 इमारतों को ध्वस्त करने के आदेश के खिलाफ विश्वविद्यालय प्रबंधन ने कानूनी लड़ाई तेज कर दी है। विश्वविद्यालय प्रबंधन ने मुरादाबाद मंडलायुक्त (कमिश्नर) की अदालत में अपील दाखिल करते हुए ध्वस्तीकरण आदेश पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। इस अपील पर 28 जुलाई को सुनवाई निर्धारित की गई है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने भी इस मामले में सक्रिय रुख अपनाते हुए 23 जुलाई को नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पाण्डेय के नेतृत्व में उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल रामपुर भेजने की घोषणा की है।
ट्रस्ट के अधिवक्ता ने दी जानकारी
विश्वविद्यालय प्रबंधन की ओर से दाखिल अपील में रामपुर विकास प्राधिकरण के ध्वस्तीकरण आदेश को चुनौती दी गई है। विश्वविद्यालय और मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट की ओर से अधिवक्ता जुनैद एजाज ने बताया कि कमिश्नर कोर्ट में अपील दाखिल कर दी गई है और अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए 28 जुलाई की तारीख तय की है। प्रबंधन का आग्रह है कि अंतिम निर्णय आने तक ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।
प्रबंधन की ओर से अदालत में यह दलील दी गई है कि पूरा विवाद गांव सिंघन खेड़ा से जुड़ा हुआ है। अधिवक्ता के अनुसार, इस गांव को 27 सितंबर 2024 को रामपुर विकास प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में शामिल किया गया, जबकि विवादित भवनों का निर्माण वर्ष 2018 में ही पूरा हो चुका था। ऐसे में इन भवनों पर बाद में लागू किए गए प्राधिकरण के नियम प्रभावी नहीं हो सकते। उनका कहना है कि किसी भी कानून या प्रशासनिक आदेश को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं किया जा सकता।
विश्वविद्यालय प्रबंधन ने यह भी दावा किया है कि जिस क्षेत्र में भवन बने हैं, वहां वर्तमान में कोई मास्टर प्लान या जोनल डेवलपमेंट प्लान लागू नहीं है। इसके अलावा संबंधित क्षेत्र नियंत्रित ग्राम क्षेत्र (कंट्रोल्ड विलेज एरिया) की श्रेणी में भी शामिल नहीं है। ऐसे में भवन निर्माण के लिए विकास प्राधिकरण से नक्शा स्वीकृत कराने की कानूनी अनिवार्यता नहीं थी। इसी आधार पर ध्वस्तीकरण के आदेश को अवैध और नियमों के विपरीत बताया गया है।
अधिवक्ता जुनैद एजाज ने यह भी तर्क दिया कि यदि अदालत यह मान भी ले कि किसी स्तर पर प्रक्रिया संबंधी त्रुटि हुई है, तब भी लागू नियमों के अनुसार अधिकतम 500 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। उनके अनुसार, ऐसी स्थिति में सीधे ध्वस्तीकरण का आदेश देना कानून की मंशा के अनुरूप नहीं है और यह अत्यधिक कठोर कार्रवाई है।
क्या है पूरा मामला
गौरतलब है कि इस पूरे मामले की शुरुआत 28 जून को हुई थी, जब रामपुर विकास प्राधिकरण के क्षेत्रीय अवर अभियंता ने मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट के सचिव और विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार के खिलाफ वाद दर्ज करते हुए नोटिस जारी किया था। नोटिस में विश्वविद्यालय प्रशासन से 8 जुलाई तक परिसर में स्थित 38 भवनों के स्वीकृत नक्शे प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने निर्धारित समय के भीतर अपना जवाब दाखिल किया और इसके बाद व्यक्तिगत सुनवाई भी हुई। सुनवाई के उपरांत जिलाधिकारी अजय कुमार द्विवेदी ने प्राधिकरण की रिपोर्ट के आधार पर 38 भवनों को अवैध निर्माण मानते हुए उन्हें ध्वस्त करने का आदेश जारी कर दिया। प्राधिकरण का दावा है कि जांच के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद कुल 40 भवनों में से 38 भवन बिना स्वीकृत नक्शे के निर्मित पाए गए।
सपा प्रतिनिधिमंडल करेगा जिलाधिकारी से मुलाकात
इस मामले ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है। समाजवादी पार्टी ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का विरोध करते हुए इसे गंभीर मुद्दा बताया है। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश पर 23 जुलाई को नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पाण्डेय के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल रामपुर पहुंचेगा। प्रतिनिधिमंडल जिलाधिकारी से मुलाकात कर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग करेगा और इस संबंध में ज्ञापन भी सौंपेगा। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल अपनी विस्तृत रिपोर्ट पार्टी नेतृत्व को सौंपेगा, जिसके आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।
अखिलेश यादव ने इस मामले पर 19 जुलाई को प्रतिक्रिया दी थी जिसके बाद से ये कयास लगाए जा रहे थे कि समाजवादी पार्टी अब खुलकर आजम खान और विश्वविद्यालय के सपोर्ट में उतरेगी ।
प्रिय छात्रों और अभिभावकगण,
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) July 19, 2026
जौहर यूनिवर्सिटी को बचाने की युवाओं और उनके अभिभावकों की मुहिम में, हम सब पूरी तरह से आपके साथ हैं।
बदले की भावना में जल रही भाजपा सरकार जौहर यूनिवर्सिटी को अपनी संकीर्ण राजनीति का शिकार बनाने की कोशिश न करे। इस दुर्भावनापूर्ण पक्षपाती फ़ैसले के…

इस शासनादेश के आधार पर भाजपा सरकार चाहे तो बदले की भावना छोड़कर जौहर यूनिवर्सिटी का नक़्शा भी आसानी से एक दिन में पास करा सकती है। भाजपा अपने लोगों के लिए इस शासनादेश को मानती है लेकिन किसी और के लिए इसे इस्तेमाल न करके हर समाज के छात्रों और उनके परिवारवालों के ख़िलाफ़ नाइंसाफ़ी… pic.twitter.com/L0AVX8c78K
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) July 19, 2026
स्थानीय स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ सामाजिक संगठनों और रामपुर के नागरिकों का कहना है कि विश्वविद्यालय जैसी शैक्षणिक संस्था को ध्वस्त करने के बजाय सरकार को उसका अधिग्रहण (टेकओवर) करने पर विचार करना चाहिए, ताकि छात्रों की पढ़ाई और विश्वविद्यालय की परिसंपत्तियां सुरक्षित रह सकें। वहीं कुछ लोगों ने विश्वविद्यालय के संस्थापक और वरिष्ठ समाजवादी नेता आजम खान से भी विश्वविद्यालय को राष्ट्रहित में सरकार को सौंपने की अपील की है।
अब सभी की निगाहें 28 जुलाई को मुरादाबाद कमिश्नर कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। इस सुनवाई में यह तय होगा कि ध्वस्तीकरण आदेश पर अंतरिम रोक मिलेगी या नहीं। अदालत के आगामी फैसले का असर न केवल विश्वविद्यालय के भविष्य पर पड़ेगा, बल्कि इस पूरे मामले की कानूनी और राजनीतिक दिशा भी उसी के अनुसार तय होगी।
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