विक्रमशिला अभ्यारण्य में डॉल्फिनों की संख्या बढ़ी, 171 से बढ़कर अब 210 हो गईं

खबर सार :-

भारत के विलुप्तप्राय राष्ट्रीय जलीय जीव और गंगा की सेहत का पैमाना माने जाने वाले गांगेय डॉल्फिन (सोंस) के अच्छे दिन आने वाले हैं। इनके लिए बिहार के भागलपुर से एक राहत भरी खबर आई है। भागलपुर पर्यटन वाला स्थान है। सुल्तानगंज से कहलगांव तक 60 किलोमीटर के दायरे में यह फैला है। खुशी की बात यह है कि विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभ्यारण्य में डॉल्फिनों की संख्या बढ़ी हैे।
विक्रमशिला अभ्यारण्य में डॉल्फिनों की संख्या बढ़ी, 171 से बढ़कर अब 210 हो गईं

खबर विस्तार : -

भागलपुर ; भारत के विलुप्तप्राय राष्ट्रीय जलीय जीव और गंगा की सेहत का पैमाना माने जाने वाले गांगेय डॉल्फिन (सोंस) के अच्छे दिन आने वाले हैं। इनके लिए बिहार के भागलपुर से एक राहत भरी खबर आई है। भागलपुर पर्यटन वाला स्थान है। सुल्तानगंज से कहलगांव तक 60 किलोमीटर के दायरे में यह फैला है। खुशी की बात यह है कि विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभ्यारण्य में डॉल्फिनों की संख्या बढ़ी हैे।

वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट और वन विभाग ने हाल में ही एक गणना की है। इसके अनुसार अभ्यारण्य क्षेत्र में डॉल्फिन की संख्या 171 से बढ़कर अब 210 हो गई है। यह गणना वर्ष 2018 से की जा रही है। जानकारी दी गई है कि सुरक्षित ब्रीडिंग और संरक्षण के बेहतर प्रयासों के कारण यह संख्या बढाने में मदद मिली है। डॉल्फिन के संरक्षण के लिए वन विभाग और केंद्र सरकार सालों से प्रयासरत है। 

गंगा में चलने वाली नावों में लगा सकते हैं अब विशेष सेंसर 

प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत अत्याधुनिक उपाय भी हो रहे हैं। यह नए प्रयास हैं। गंगा में चलने वाली नावों में अब विशेष सेंसर यंत्र लगाए जा सकते हैं। कोई नाव जैसे ही डॉल्फिन के करीब पहुंचेगी, नाव चलाने वाले को इसकी जानकारी मिल जाएगी। इससे नाव की दिशा बदलने में नाविक को आसानी हो जाएगीे। तीन हजार किलो से अधिक अवैध नायलॉन जब्त किया गया है। साथ ही करंट वाले जालों को नहीं छोड़ा गया। यह सामग्री डॉल्फिनों की मौत का फंदा मानी जा रही थी। बिहार सरकार इस क्षेत्र में देश की पहली डॉल्फिन वेधशाला बना रही है। इससे उनके व्यवहार और जीवन चक्र को परखने में आसानी होगी और इनकी गतिविधि में निगरानी रखी जा सकेगी। 

भारत में डॉल्फिन के शिकार पर है प्रतिबंध

भारत में डॉल्फिन के शिकार या उन्हें नुकसान पहुंचाने पर पूर्ण प्रतिबंध है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 के तहत यह घोषित भी है। अब डॉल्फिन की संख्या पर गौर करने के बाद यह चिंता स्वाभाविक है कि गंगा नदी में बढ़ता प्रदूषण इनको नुकसान दे सकता है। गांगेय डॉल्फिन प्राकृतिक रूप से देख नहीं सकती हैं। वे रास्ता खोजती हैं तो आवाज पर और शिकार भी करतीं तो भी आवाज की तरंगों का उपयोग करती हैं। गंगा में प्रदूषण बढाने के लिए क्रूज, मोटर बोट के अलावा निर्माण कार्य शामिल हैं। इनके शोर के कारण ध्वनि प्रदूषण बढ रहा है। इससे सिस्टम गड़बड़ा रहा है। 

सीवेज का पानी गंगा के पानी को बना रहा है जहरीला 

यहां कृषि क्षेत्रों से बहकर खतरनाक रासायनिक कीटनाशक तथा शहरों का अनुपचारित सीवेज पानी गंगा के पानी को जहरीला बना रहा हैै। यह सब डॉल्फिन के प्रजनन अंगों और हार्मोनल सिस्टम को नुकसान दे रहा है। छोटी मछलियों की संख्या भी यहां घट रही है। यह मछलियां डॉल्फिन का मुख्य भोजन हैं। प्लास्टिक का कचरा खतरनाक बन रहा है। आए दिन नायलॉन के जालों में वह फंस जाती हैं। दम घुटने से भी कई बार डॉल्फिन मर जाती हैं। यह खुशी की बात है कि डाल्फिन की संख्या बढने से पर्यावरण भी सही होगा।

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