सोलर पंप और टैंकरों से भरा जा रहा पानी, फिर भी नहीं बच रही जान
खबर सार :-
विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान एक घना पक्षी विहार है। इसकी पहचान पूरी दुनिया में है। यह राष्ट्रीय उद्यान इन दिनों भीषण जल संकट का सामना कर रहा है। परिणाम इतने गंभीर हो चुके हैं कि यहां की मछलियां दम तोड़ रही हैं।
खबर विस्तार : -
भरतपुर, विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान एक घना पक्षी विहार है। इसकी पहचान पूरी दुनिया में है। यह राष्ट्रीय उद्यान इन दिनों भीषण जल संकट का सामना कर रहा है। परिणाम इतने गंभीर हो चुके हैं कि यहां की मछलियां दम तोड़ रही हैं। कछुए पानी की तलाष में तड़प रहे हैं। बड़ी संख्या में पक्षी दूसरे स्थानों को जाने लगे हैं। दरअसल, इसके तह तक जाना जरूरी है। यहां पांचना बांध से पानी नहीं मिला, इससे एक बडी समस्या उत्पन्न होने लगी। दूसरी ओर इस वर्ष सामान्य से कम बारिश हुई। यही कारण है कि उद्यान के अधिकांश वेटलैंड और तालाब सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं। यह तकलीफ पक्षी, कछुए और मछलियां उठा रही हैं।
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में जल संकट
इस मामले में वन विभाग के अधिकारियों की अपनी राय है। उनके अनुसार केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की जीवनरेखा माने जाने वाले पांचना बांध से अब तक इस बार पानी नहीं छोड़ा गया है। यह बांध भी जल संकट से जूझ रहा है। इसमें जलस्तर कम है, इस कारण पानी उपलब्ध नहीं कराया जा सका। वैसे तो पांचना बांध का पानी पहले अजान बांध में पहुंचता है। इसके बाद वहां से घना पक्षी विहार के वेटलैंड को पानी छोड़ा जाता है। यही कारण है कि उद्यान की पारिस्थितिकी संतुलित रहती है।
सैकड़ों मछलियों की मौत
यहां चेतन कुमार एक डीएफओ हैं। उद्यान के उप वन संरक्षक (डीएफओ) के अनुसार, पानी की लगातार कमी के कारण घना के अधिकांश तालाब और वेटलैंड लगभग खाली हो चुके हैं। गर्मी बढी और इसके कारण जलस्तर लगातार गिरा। यही कारण है कि सैकड़ों मछलियों की मौत हो चुकी है। उन्होंने कहा कि जहां पानी कम है, वहां से मछलियों को बचाकर डी ब्लॉक के अपेक्षाकृत गहरे जलाशय में पहुंचाया गया है। जलसंकट का प्रभाव अन्य जीवों पर भी पड़ रहा है। वन विभाग ने आपात व्यवस्था के तहत स्थिति की गंभीरता को देखते हुए धौलपुर स्थित चंबल नदी से पानी मंगाना शुरू किया है। उन्होंने बताया कि इस सीजन में अब तक चार बार चंबल का पानी उद्यान तक पहुंचा कर प्रयास किए गए हैं।
पंक्षी बदल रहे स्थान
यही नहीं, कई संवेदनशील क्षेत्रों में टैंकरों से पानी भेजा जा रहा हैै। यह प्रयास प्रभावषाली रहे हैं, दूसरी ओर सोलर ऊर्जा से संचालित मोटरों को 24 घंटे चलाकर उपलब्ध पानी को विभिन्न जलाशयों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। यह सारे प्रयास कामयाब भी हो सकते हैं। यदि पक्षियों की संख्या कम होगी और मछलियां या कछुए मरेंगे तो यह पर्यावरण के अनुकूल नहीं है। इस मामले में वन विभाग का कहना है कि यह व्यवस्था केवल अस्थायी राहत देने में मदद कर सकती है। जल संकट का असर अब उद्यान की जैव विविधता पर भी दिखाई दे रहा है। इन क्षेत्रों में पानी की तलाश में अनेक प्रवासी और स्थानीय पक्षी दूसरे वेटलैंड क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं, इनको किसी भी तरह रोकना होगा।
जलीय जीवों का अस्तित्व भी खतरे में
कछुओं सहित अन्य जलीय जीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ता जा रहा है। वन विभाग का मानना है कि यदि जल्द ही पांचना बांध से पानी नहीं छोड़ा गया तो आने वाले दिनों में वन्य जीवों और पक्षियों की मौत का आंकड़ा गंभीर बन सकता है। जहां तक पानी की सफाई का मामला है, अधिकारियों के अनुसार चंबल का पानी स्वच्छ है। केवलादेव की प्राकृतिक पारिस्थितिकी के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। पानी की गुणवत्ता पर भी कहा गया है कि पांचना बांध के पानी के साथ आने वाले जलीय पौधे, मछलियां, बीज और अन्य प्राकृतिक तत्व पक्षियों तथा वन्य जीवों के भोजन और उनके प्राकृतिक आवास का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। दूसरी ओर चंबल के पानी में ये तत्व नहीं मिलते। यही कारण है कि वन विभाग ने संबंधित विभागों से जल्द पानी उपलब्ध कराने की मांग की है। इस विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की समृद्ध जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान से बचाने में मदद मिलेगी।
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