मुख्यमंत्रियों ने भारत रत्न प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को श्रद्धांजलि दी

खबर सार :-

भारत रत्न से सम्मानित शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी जा रही है। देश के कई मुख्यमंत्रियों ने पोस्ट कर अपने विचार व्यक्त किए हैं।
शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की पुण्यतिथि पर दी गई श्रद्धांजलि

खबर विस्तार : -

नई दिल्ली : भारत रत्न से सम्मानित शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को आज देशभर में याद किया जा रहा है। उनकी पुण्यतिथि पर देश के नेताओं के साथ संगीत प्रेमियों ने भी उस्ताद को श्रद्धांजलि अर्पित की है।

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट किया है। इसमें उन्होंने उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को सुरों के महान आराधक बताया। कला के सच्चे साधक एवं शहनाई के अद्भुत वादक, भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की पुण्यतिथि पर मुख्यमंत्री ने विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।  दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया है। इसमें उन्होंने खां के लिए लिखा है कि अपनी अनुपम साधना और शहनाई के सुरों से उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्वभर में प्रतिष्ठा दिलाई। सीएम ने पोस्ट में नमन करते हुए लिखा है कि उस्ताद के योगदान को सदैव स्मरणीय रखा जाएगा। 

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राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने एक्स पर एक  पोस्ट कर प्रख्यात शहनाई वादक, भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की पुण्यतिथि पर नमन किया है।  उन्होंने लिखा है कि खां ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई। उनका यह अतुलनीय योगदान सदैव आने वाली पीढ़ियों को कला, साधना एवं उत्कृष्टता के लिए निरंतर प्रेरित करता रहेगा। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी ने भी सोशल मीडिया पोस्ट में शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन किया है। उन्होंने विनम्र श्रद्धांजलि दी और भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व पटल पर पहचान दिलाने के लिए तथा योगदान देने के लिए अविस्मरणीय बताया है। लिखा है कि उनकी शहनाई की मधुर स्वर सदैव भारतीय संस्कृति और संगीत की समृद्ध विरासत की याद दिलाती रहेंगी।

भारतीय शास्त्रीय संगीत को पहचान दिलाई

 दिल्ली सरकार में मंत्री प्रवेश वर्मा ने एक्स पर लिखा है कि विश्वविख्यात शहनाई वादक, ‘भारत रत्न’ से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि। वर्मा ने लिखा है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत और शहनाई को विश्व पटल पर विशिष्ट पहचान दिलाने में उनके योगदान को सदैव याद रखा जाएगा। बिहार सरकार में मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने लिखा है कि उस्ताद ने अपना पूरा जीवन संगीत के प्रति समर्पित करने किया है। उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी ने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है कि शहनाई को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दिलाने में आपका योगदान अविस्मरणीय है। आपकी अमर संगीत साधना हमें सदैव प्रेरित करती रहेगी। 

दुनिया के मंच पर अपनी जगह बनाई

अगस्त 2006 को आज के दिन ऐसी आवाज खामोश हो गई, जिसने शहनाई को सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं रहने दिया, उसे कॉन्सर्ट हॉल से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाय। जो शहनाई कभी विवाह और पारंपरिक अवसरों तक सीमित रही, उसी शहनाई को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने दुनिया में पहचान दिलाई। भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा शहनाई के सुरों में रही है। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने कला से शहनाई की पहचान ही बदल दी। 21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया था। उनकी शहनाई की गूंज आज भी उनकी साधना और विरासत की कहानी कहती रहती है।

पूर्वज रियासतों के दरबार में संगीतकार रहे 

बिस्मिल्लाह खां का जन्म 21 मार्च 1916 को डुमरांव में हुआ था। इस परिवार में पीढ़ियां संगीत से जुड़ी थीं। उनके पूर्वज भी कभी रियासतों के दरबार में संगीतकार रहे थे। उनके पिता पैगंबर खां डुमरांव के महाराजा के दरबार में शहनाई वादक थे। उनके दादा रसूल बख्श खां ने पहली बार उन्हें देखा तो उनके मुख से बिस्मिल्लाह शब्द निकला। इसी नाम से उनकी पहचान बनी। बचपन से ही शहनाई की धुनों और संगीत के माहौल में वह पले। उनका भी मन स्वाभाविक रूप से संगीत में लगता गया। वह छह वर्ष की उम्र में वाराणसी आ गए। उनके चाचा अली बक्स भी काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े प्रसिद्ध शहनाई वादक थे। अली बक्स ने उन्हें शहनाई में परंगत कर दिया।  

 1937 को उन्होंने हमेशा याद किया

बिस्मिल्लाह खां ने निरंतर अभ्यास किया और वादन की बारीकियों को सीखा। 1937 को उन्होंने हमेशा याद किया। उस समय कोलकाता में अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन का कार्यक्रम था। खान को यहां प्रस्तुति देने का अवसर मिला। इस मंच से बजी शहनाई को संगीत प्रेमियों ने उनके वादन को खूब सराहा। यहीं से उनकी चर्चा बड़े स्तर पर होने लगी। देश की आजादी मिलने पर 1947 में उन्होंने लाल किले से शहनाई वादन किया। इसके बाद 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र दिवस के अवसर पर भी अपनी शहनाई से लोगों को मंत्रमुग्ध किया। बिस्मिल्लाह खां ने अपनी कला को अफगानिस्तान, अमेरिका, कनाडा, बांग्लादेश, ईरान, इराक, जापान, हांगकांग और यूरोप के कई हिस्सों तक प्रस्तुति देकर पहुंचाया। अब अंतरराष्ट्रीय संगीत मंचों पर भी सम्मान के साथ सुनी जाने लगी। उनके लिए सुरों की कोई धार्मिक सीमा नहीं थी। 

खां की स्मृति में दिए जाते हैं पुरस्कार

बिस्मिल्लाह खां को देश और दुनिया में कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। इनमें 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1961 में पद्म श्री, 1968 में पद्म भूषण, 1980 में पद्म विभूषण, 1992 में ईरान गणराज्य की ओर से तलार मौसिकी और 2001 में भारत रत्न मिला। उनकी स्मृति में संगीत नाटक अकादमी ने वर्ष 2007 में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार की शुरुआत की।

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