Did You Know : हैदराबाद का अत्याधुनिक केंद्र हिंद महासागर में सुनामी पर रख रहा है चौबीसों घंटे नजर
खबर सार :-
हैदराबाद स्थित INCOIS का सुनामी प्रारंभिक चेतावनी केंद्र समुद्र में होने वाली हलचल और भूकंपों की 24 घंटे निगरानी कर भारत समेत हिंद महासागर के 24 देशों को त्वरित चेतावनी भेजता है।
खबर विस्तार : -
हैदराबाद: समुद्र की गहराइयों में उठने वाली हलचल और अचानक आने वाले भूकंप कई बार विनाशकारी सुनामी का रूप ले लेते हैं, जिससे तटीय क्षेत्रों में भारी नुकसान की आशंका बनी रहती है। इस तरह के खतरों से समय रहते निपटने और तटीय आबादी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए देश में एक मजबूत तकनीकी ढांचा तैयार किया गया है। हैदराबाद स्थित भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) के अंतर्गत संचालित भारतीय सुनामी प्रारंभिक चेतावनी केंद्र (ITEWC) इन सभी गतिविधियों पर चौबीसों घंटे कड़ी निगरानी रखता है। यह अत्याधुनिक व्यवस्था भारत के साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र से जुड़े करीब चौबीस देशों को किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में त्वरित चेतावनी और परामर्श उपलब्ध कराने का काम करती है।
भूकंपीय गतिविधियों और जलस्तर की सूक्ष्म निगरानी
समुद्र के भीतर होने वाली भूगर्भीय हलचलों का सटीक आकलन करने के लिए यह केंद्र विभिन्न वैज्ञानिक उपकरणों और नेटवर्क का उपयोग करता है। जब भी समुद्र में कोई भूकंप आता है, तो यह प्रणाली तुरंत उसके केंद्र, गहराई और तीव्रता जैसे महत्वपूर्ण आंकड़ों का विश्लेषण करती है। इसके साथ ही, समुद्र के जलस्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव और अन्य वास्तविक समय (रियल-टाइम) के आंकड़ों को भी इसमें शामिल किया जाता है। इन सभी जानकारियों के आधार पर वैज्ञानिकों द्वारा यह आकलन किया जाता है कि संबंधित भूकंप से सुनामी आने की कितनी संभावना है। आधिकारिक तौर पर यह केंद्र सुनामी पैदा करने वाले भूकंप का पता लगाने में लगभग दस मिनट का समय लेता है, जो आपदा प्रबंधन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाला यह संस्थान केवल सुनामी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह समुद्र विज्ञान से जुड़ी कई अन्य सेवाएं भी प्रदान करता है। चेतावनी प्रणाली के संचालन में भूकंपीय सेंसर, समुद्र के जलस्तर को मापने वाले उपकरण और ज्वार मापक केंद्रों से मिलने वाले आंकड़ों का मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में जरा सी भी देरी भारी पड़ सकती है, इसलिए हर एक मिनट का हिसाब रखकर तेजी से निर्णय लिए जाते हैं।
विभिन्न माध्यमों से त्वरित संदेश और मछुआरों के लिए सहायता
संभावित खतरे की पुष्टि होने के बाद संबंधित प्रशासनिक निकायों और देशों तक सूचना पहुंचाने के लिए कई आधुनिक संचार माध्यमों का उपयोग किया जाता है। वैज्ञानिक डॉ. एन. श्रीनिवासन राव ने जानकारी दी कि चेतावनी संदेश भेजने के लिए ई-मेल, एसएमएस, फैक्स, ग्लोबल टेलीकम्युनिकेशन सिस्टम (जीटीएस) और आधिकारिक वेबसाइट का सहारा लिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य तटीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को समय रहते सतर्क करना है, ताकि निचले इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।
इसके अलावा, यह केंद्र मछुआरों के लिए भी बेहद उपयोगी सेवाएं संचालित करता है। संस्थान की ओर से मछुआरों को समुद्र की वर्तमान स्थिति और संभावित रूप से मछली बहुल क्षेत्रों की दैनिक सलाह दी जाती है। इस वैज्ञानिक सहायता से मछुआरों को समुद्र में सही दिशा और स्थान की जानकारी मिलती है, जिससे न केवल उनके समय की बचत होती है बल्कि ईंधन की खपत भी कम होती है।
खतरे के स्तर और प्रभाव का वैज्ञानिक विश्लेषण
वैज्ञानिक अजय कुमार ने इस व्यवस्था की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री आपदाओं के जोखिम को कम करने में यह चेतावनी तंत्र रीढ़ की हड्डी की तरह काम कर रहा है। भूकंप की सूचना मिलते ही उसके संभावित प्रभाव का त्वरित आंकलन किया जाता है और खतरे की गंभीरता के अनुसार संबंधित क्षेत्रों को अलर्ट जारी किया जाता है। सुनामी का असर मुख्य रूप से भूकंप के स्रोत और प्रभावित क्षेत्र के बीच की दूरी पर निर्भर करता है, इसलिए शुरुआती कुछ मिनटों की यह प्रक्रिया तटीय जीवन की रक्षा के लिए निर्णायक साबित होती है। इस क्षेत्रीय सेवा के दायरे में भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका, ईरान और म्यांमार सहित हिंद महासागर से लगे कुल चौबीस देश शामिल हैं।
विनाशकारी आपदा से सबक और चेतावनी तंत्र का विकास
वर्ष 2004 में हिंद महासागर में आई अत्यंत विनाशकारी सुनामी ने पूरे क्षेत्र में तबाही मचाई थी, जिसके बाद एक प्रभावी और भरोसेमंद पूर्व चेतावनी व्यवस्था स्थापित करने की तीव्र आवश्यकता महसूस हुई। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भारत ने इस दिशा में गंभीर प्रयास शुरू किए और परिणामस्वरूप 15 अक्टूबर 2007 को भारतीय सुनामी प्रारंभिक चेतावनी केंद्र (ITEWC) को पूरी तरह से परिचालन में लाया गया। पिछले कुछ वर्षों में इस तकनीक और संस्थान ने क्षेत्रीय स्तर पर अपनी क्षमता को काफी मजबूत किया है, जिससे आज यह केंद्र भारत सहित हिंद महासागर के दो दर्जन से अधिक देशों के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच बन चुका है।
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