हमीरपुर के मराठाकालीन मंदिर में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की धूम, सूर्याेदय हाेते ही चमक उठती हैं मूर्तियां
खबर सार :-
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में यमुना तट पर स्थित मराठाकालीन महावीर मंदिर की अनूठी विशेषता और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तैयारियों पर विशेष रिपोर्ट। जानिए मंदिर का इतिहास और वास्तुकला।
खबर विस्तार : -
हमीरपुर: उत्तर प्रदेश के जनपद हमीरपुर शहर में ऐतिहासिक धरोहरों और आस्था के केंद्र के रूप में प्रसिद्ध मराठाकालीन मंदिर में इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को लेकर उत्साह का माहौल है। प्रशासन और स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर परिसर को भव्य रूप से सजाया गया है। यमुना नदी के तट पर स्थित यह मंदिर अपनी अनूठी निर्माण शैली और वास्तुकला के लिए पूरे क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है।
ऐतिहासिक वास्तुकला और प्राचीन स्वरूप
हमीरपुर शहर के ऐतिहासिक हाथी दरवाजा के पास यमुना नदी के तट पर स्थित महावीर मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। मंदिर के मठ और उसकी बनावट मराठाकाल की उत्कृष्ट शिल्प कला का जीवंत उदाहरण पेश करती हैं। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी एसके दुबे के अनुसार, सर्वे के दौरान इस मराठा कालीन मंदिर की भव्यता और ऐतिहासिक महत्व का आकलन किया गया था। मंदिर के मठ में की गई नक्काशी और कारीगरी के नमूने आज भी देखने वालों को अचंभित करते हैं।
साहित्यकार डॉ. बीडी प्रजापति ने जानकारी दी कि शहर में यमुना नदी के किनारे निर्मित यह मंदिर अपनी विशिष्ट वास्तुकला के कारण अनूठा है। मराठाकाल में जितने मंदिरों का निर्माण हुआ था, उतनी बारीकी और मजबूती अन्य कालखंडों में कम ही देखने को मिलती है। मंदिर के महंत हरिनारायण द्विवेदी के अनुसार, संवत 1723 में मराठाकाल के दौरान बालाजी बाजीराव पेशवा ने यमुना नदी के तट पर इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मठ का आकार अंडाकार है और इसे बिना किसी गुंबद के तैयार किया गया है, जिसकी बनावट ऐसी है कि बारिश का पानी गिरते ही तुरंत नीचे आ जाता है।
सूर्योदय का अद्भुत प्राकृतिक दृश्य और मूर्तियां
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका निर्माण और खगोलीय संरेखण है। मंदिर का निर्माण उस दौर में हुआ था जब आधुनिक सीमेंट और सरिया का प्रचलन नहीं था। पूरा मंदिर और उसका मठ केवल चूना, मिट्टी और कंकरीट के मिश्रण से तैयार किया गया है। सदियों का समय बीत जाने के बाद भी यह इमारत अपनी पूरी मजबूती के साथ खड़ी है, जिसकी दीवारों में लोहे की कीली तक नहीं ठोकी जा सकती है।
मंदिर के पुजारी ने बताया कि यमुना नदी के तट पर पूर्व दिशा में स्थित होने के कारण, जैसे ही सुबह सूर्योदय होता है, सूरज की पहली सीधी किरण मंदिर के गर्भगृह में विराजमान मूर्तियों पर पड़ती है। इस प्राकृतिक प्रकाश के कारण मूर्तियां अचानक चमक उठती हैं और इसी के साथ मंदिर के घंटे गूंज उठते हैं। मंदिर के अंदर प्रवेश करने के लिए सिर झुकाकर जाना पड़ता है। इतिहास में अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान भी अंग्रेज अधिकारी अपने परिवारों के साथ इस मंदिर के दर्शन के लिए आते रहे हैं।
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और विशेष अनुष्ठान
मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर सभी तैयारियां अंतिम चरण में हैं। स्थानीय नागरिकों के सक्रिय सहयोग से मंदिर को दुल्हन की तरह सजाया गया है। मुख्य मंदिर में प्रवेश करने पर सबसे पहले हनुमान जी के दर्शन होते हैं, जिसके बाद बगल में राधाकृष्ण की लगभग सवा फीट लंबी अष्टधातु की नयनाभिराम मूर्तियां सुशोभित हैं। ठीक इसी के सामने शिव-पार्वती की मूर्तियां भी मठ के भीतर विराजमान हैं।
मंदिर के महंत ने बताया कि इस बार जन्माष्टमी का उत्सव बेहद खास तरीके से मनाया जाएगा। रात्रि ठीक बारह बजे राधाकृष्ण की इन मूर्तियों को शहद, गंगाजल, दूध और पंचामृत से भव्य स्नान कराया जाएगा। इसके बाद मंगला आरती का आयोजन होगा, जिसमें शहर की बड़ी संख्या में आबादी के शामिल होने की संभावना है। अनुष्ठान के उपरांत सभी श्रद्धालुओं को श्रीकृष्ण का पंचामृत और प्रसाद वितरित किया जाएगा।
मराठाकालीन वास्तुकला और ऐतिहासिक विरासत
यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि मराठाकालीन वास्तुकला का एक जीवित दस्तावेज है। मराठा शासकों के शासनकाल में स्थापित इस तरह की संरचनाएं उस समय की इंजीनियरिंग और कला कौशल की गवाही देती हैं। इतिहास के पन्नों में दर्ज इन धरोहरों को संरक्षित करने की दिशा में पुरातत्व विभाग और स्थानीय साहित्यकारों द्वारा समय-समय पर इसके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया जाता रहा है, जो आज भी स्थानीय लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
ये भी पढ़ेंः- Janmashtami 2026 Special: 'राधा कैसे ना जले' से 'वो किसना है' तक, इन गानों से जन्माष्टमी को बनाएं खास
हमीरपुर: उत्तर प्रदेश के जनपद हमीरपुर शहर में ऐतिहासिक धरोहरों और आस्था के केंद्र के रूप में प्रसिद्ध मराठाकालीन मंदिर में इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को लेकर उत्साह का माहौल है। प्रशासन और स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर परिसर को भव्य रूप से सजाया गया है। यमुना नदी के तट पर स्थित यह मंदिर अपनी अनूठी निर्माण शैली और वास्तुकला के लिए पूरे क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है।
ऐतिहासिक वास्तुकला और प्राचीन स्वरूप
हमीरपुर शहर के ऐतिहासिक हाथी दरवाजा के पास यमुना नदी के तट पर स्थित महावीर मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। मंदिर के मठ और उसकी बनावट मराठाकाल की उत्कृष्ट शिल्प कला का जीवंत उदाहरण पेश करती हैं। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी एसके दुबे के अनुसार, सर्वे के दौरान इस मराठा कालीन मंदिर की भव्यता और ऐतिहासिक महत्व का आकलन किया गया था। मंदिर के मठ में की गई नक्काशी और कारीगरी के नमूने आज भी देखने वालों को अचंभित करते हैं।
साहित्यकार डॉ. बीडी प्रजापति ने जानकारी दी कि शहर में यमुना नदी के किनारे निर्मित यह मंदिर अपनी विशिष्ट वास्तुकला के कारण अनूठा है। मराठाकाल में जितने मंदिरों का निर्माण हुआ था, उतनी बारीकी और मजबूती अन्य कालखंडों में कम ही देखने को मिलती है। मंदिर के महंत हरिनारायण द्विवेदी के अनुसार, संवत 1723 में मराठाकाल के दौरान बालाजी बाजीराव पेशवा ने यमुना नदी के तट पर इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मठ का आकार अंडाकार है और इसे बिना किसी गुंबद के तैयार किया गया है, जिसकी बनावट ऐसी है कि बारिश का पानी गिरते ही तुरंत नीचे आ जाता है।
सूर्योदय का अद्भुत प्राकृतिक दृश्य और मूर्तियां
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका निर्माण और खगोलीय संरेखण है। मंदिर का निर्माण उस दौर में हुआ था जब आधुनिक सीमेंट और सरिया का प्रचलन नहीं था। पूरा मंदिर और उसका मठ केवल चूना, मिट्टी और कंकरीट के मिश्रण से तैयार किया गया है। सदियों का समय बीत जाने के बाद भी यह इमारत अपनी पूरी मजबूती के साथ खड़ी है, जिसकी दीवारों में लोहे की कीली तक नहीं ठोकी जा सकती है।
मंदिर के पुजारी ने बताया कि यमुना नदी के तट पर पूर्व दिशा में स्थित होने के कारण, जैसे ही सुबह सूर्योदय होता है, सूरज की पहली सीधी किरण मंदिर के गर्भगृह में विराजमान मूर्तियों पर पड़ती है। इस प्राकृतिक प्रकाश के कारण मूर्तियां अचानक चमक उठती हैं और इसी के साथ मंदिर के घंटे गूंज उठते हैं। मंदिर के अंदर प्रवेश करने के लिए सिर झुकाकर जाना पड़ता है। इतिहास में अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान भी अंग्रेज अधिकारी अपने परिवारों के साथ इस मंदिर के दर्शन के लिए आते रहे हैं।
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और विशेष अनुष्ठान
मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर सभी तैयारियां अंतिम चरण में हैं। स्थानीय नागरिकों के सक्रिय सहयोग से मंदिर को दुल्हन की तरह सजाया गया है। मुख्य मंदिर में प्रवेश करने पर सबसे पहले हनुमान जी के दर्शन होते हैं, जिसके बाद बगल में राधाकृष्ण की लगभग सवा फीट लंबी अष्टधातु की नयनाभिराम मूर्तियां सुशोभित हैं। ठीक इसी के सामने शिव-पार्वती की मूर्तियां भी मठ के भीतर विराजमान हैं।
मंदिर के महंत ने बताया कि इस बार जन्माष्टमी का उत्सव बेहद खास तरीके से मनाया जाएगा। रात्रि ठीक बारह बजे राधाकृष्ण की इन मूर्तियों को शहद, गंगाजल, दूध और पंचामृत से भव्य स्नान कराया जाएगा। इसके बाद मंगला आरती का आयोजन होगा, जिसमें शहर की बड़ी संख्या में आबादी के शामिल होने की संभावना है। अनुष्ठान के उपरांत सभी श्रद्धालुओं को श्रीकृष्ण का पंचामृत और प्रसाद वितरित किया जाएगा।
मराठाकालीन वास्तुकला और ऐतिहासिक विरासत
यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि मराठाकालीन वास्तुकला का एक जीवित दस्तावेज है। मराठा शासकों के शासनकाल में स्थापित इस तरह की संरचनाएं उस समय की इंजीनियरिंग और कला कौशल की गवाही देती हैं। इतिहास के पन्नों में दर्ज इन धरोहरों को संरक्षित करने की दिशा में पुरातत्व विभाग और स्थानीय साहित्यकारों द्वारा समय-समय पर इसके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया जाता रहा है, जो आज भी स्थानीय लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
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