Fuel Companies Losses : जनता की जेब कटी, फिर भी तेल कंपनियों का दिवाला! पेट्रोल पर ₹6 और डीजल पर ₹19 का तगड़ा झटका, जानिए असली खेल!
खबर सार :-
Fuel Companies Losses : पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर होने के बावजूद भारतीय तेल कंपनियों को क्यों हुआ भारी नुकसान? जानिए पेट्रोल पर ₹6 और डीजल पर ₹19 के प्रति लीटर घाटे के पीछे का पूरा सच और आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज की चौंकाने वाली रिपोर्ट।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली: हर आम आदमी आज महंगाई से त्रस्त है। जब भी पेट्रोल पंप पर गाड़ी की टंकी फुल कराने जाओ, तो जेब पूरी तरह ढीली हो जाती है। आम जनता हमेशा यही सोचती है कि पेट्रोल और डीजल (Fuel Prices) की इतनी ऊंची कीमतें चुकाने के बाद देश की सरकारी तेल कंपनियां (Fuel Companies) अंधा मुनाफा कमा रही होंगी। लेकिन बाजार से जो ताजा आंकड़े निकलकर सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जनता से मोटी रकम वसूलने के बाद भी इन दिग्गज तेल कंपनियों को बहुत भारी घाटा उठाना पड़ रहा है।
सरल शब्दों में समझें तो तेल कंपनियों को इस समय पेट्रोल बेचने पर प्रति लीटर 6 रुपये का घाटा हो रहा है, जबकि डीजल बेचने पर तो नुकसान का आंकड़ा पूरे 19 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया है। यह आम आदमी की सोच से परे है कि जब पेट्रोल-डीजल सस्ता नहीं हुआ, तो फिर कंपनियों की तिजोरी में छेद कैसे हो गया? इस पूरे मामले की गहराई से जांच करने वाली मशहूर संस्था आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज ने अपनी ताजा रिपोर्ट में इस कड़वे सच का खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल से जून की तिमाही के दौरान सरकारी तेल कंपनियों को ईंधन बेचने में भारी आर्थिक नुकसान (Fuel Companies Losses) का सामना करना पड़ा है। यह स्थिति तब है जब पिछले कुछ समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil Price) की कीमतों में गिरावट देखी गई है, लेकिन फिर भी कंपनियों का घाटा कम होने का नाम नहीं ले रहा है।
मुनाफे से सीधे पाताल में गिरा ग्राफ
अगर हम ठीक एक साल पहले की इसी तिमाही के आंकड़ों पर नजर डालें, तो कहानी बिल्कुल उलट थी। पिछले साल इसी दौरान यही कंपनियां हर लीटर डीजल पर 8.2 रुपये और पेट्रोल पर 10.3 रुपये का साफ-साफ मुनाफा कमा रही थीं। लेकिन इस बार विदेशी बाजार में कच्चे तेल और रिफाइंड ईंधन की कीमतों में जो उथल-पुथल हुई, उसका बोझ कंपनियों ने सीधा आम जनता पर नहीं डाला। चुनावी माहौल और सरकारी नीतियों के कारण पेट्रोल-डीजल के दाम घरेलू मार्केट में नहीं बढ़ाए गए। इसी का नतीजा है कि इन कंपनियों का मुनाफा अब भारी नुकसान (Fuel Companies Losses) में बदल चुका है।
समझिए आपकी जेब से पंप तक का पूरा गणित
एक आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब हम पंप पर 90 या 100 रुपये लीटर तेल खरीदते हैं, तो कंपनियां घाटे में कैसे रह सकती हैं? दरअसल, जो तेल आपके वाहन में डाला जाता है, उसकी कीमत केवल कच्चे तेल से तय नहीं होती। इसके पीछे एक लंबा-चौड़ा खर्च शामिल होता है। रिफाइनरी से निकलने के बाद तेल में ट्रांसपोर्ट का खर्च, डिस्ट्रीब्यूशन का घाटा, पेट्रोल पंप चलाने वाले डीलर का कमीशन और केंद्र व राज्य सरकारों के भारी-भरकम टैक्स जुड़ते हैं। जब दुनिया के बाजारों में तेल महंगा होता है और हमारे देश में कीमतें वैसी की वैसी ही बनी रहती हैं, तो इस पूरे अंतर का नुकसान तेल कंपनियों को खुद अपनी जेब से भरना पड़ता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरने के बाद भी पुराना घाटा इतना ज्यादा था कि कंपनियां अभी तक उससे उबर नहीं पाई हैं और लगातार भारी नुकसान (Fuel Companies Losses) उठा रही हैं।
75,000 करोड़ का महा-नुकसान, सरकार भी हैरान
इस घाटे की गंभीरता को खुद सरकार ने भी स्वीकार किया है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (Ministry of Petroleum) के मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने हाल ही में संसद और मीडिया के सामने एक बड़ा बयान दिया था। उन्होंने बताया कि इस तिमाही में बाजार भाव से बेहद कम दाम पर पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और हवाई जहाज का ईंधन बेचने की वजह से देश की बड़ी तेल कंपनियों को करीब 75,000 करोड़ रुपये का ऐतिहासिक नुकसान झेलना पड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले दो सालों में तेल कंपनियों ने जो शानदार मुनाफा कमाया था, वह इस एक झटके में पूरी तरह साफ हो गया है। साल 2025 की आखिरी तिमाही में पेट्रोल पर मिलने वाला मुनाफा 12 रुपये प्रति लीटर के रिकॉर्ड स्तर पर था, लेकिन अब बाजार का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है, जिससे तेल कंपनियां गहरे वित्तीय संकट (Financial Loss) में फंसती नजर आ रही हैं और यह भारी नुकसान (Fuel Companies Losses) पूरी इंडस्ट्री को हिला रहा है।
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