धीमी पड़ रही है पृथ्वी की घूमने की रफ्तार: वैज्ञानिकों के अनुसार हर सदी में बढ़ रही दिन की अवधि, 60 करोड़ साल पहले केवल 21 घंटे का होता था एक दिन
खबर सार :-
पृथ्वी की अपनी जगह पर घूमने की रफ्तार धीरे-धीरे कम हो रही है। इस बदलाव के कारण पृथ्वी पर दिन की लंबाई में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, औसतन हर 100 साल में दिन की अवधि लगभग 1.8 सेकंड बढ़ जाती है।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली: पृथ्वी की अपनी धुरी पर चक्कर लगाने यानी घूमने की रफ्तार में निरंतर बदलाव देखा जा रहा है। हालिया वैज्ञानिक विश्लेषणों और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह पुष्टि हुई है कि हमारे ग्रह के घूमने की रफ्तार पहले की तुलना में धीमी हो रही है। इस चाल के धीमे होने का सीधा प्रभाव समय और दिन की अवधि पर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस परिवर्तन की वजह से प्रति शताब्दी दिन की औसत लंबाई में करीब 1.8 सेकंड का इजाफा हो रहा है। यह प्रक्रिया अचानक नहीं हुई है, बल्कि करोड़ों वर्षों से जारी एक प्राकृतिक बदलाव का हिस्सा है।
इस खगोलीय और भू-भौतिकीय घटना का असर तुरंत महसूस नहीं होता, क्योंकि प्रति सदी होने वाला यह परिवर्तन बेहद सूक्ष्म है। हालांकि, अगर इसे लंबे कालखंड के संदर्भ में देखा जाए तो परिणाम काफी बड़े नजर आते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि समय के साथ पृथ्वी के चक्र में आ रहा यह बदलाव ग्रह के अपने आंतरिक और बाहरी बलों के आपसी खिंचाव की वजह से घटित हो रहा है।
दिन की अवधि में ऐतिहासिक बदलाव का पैटर्न
पृथ्वी पर समय की गणना हमेशा से इसकी घूमने की रफ्तार पर निर्भर रही है। जब पृथ्वी अपनी जगह पर एक पूरा चक्कर लगा लेती है, तो उसे एक दिन माना जाता है। इतिहास और जीवाश्मों से मिले वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि अतीत में पृथ्वी के घूमने की रफ्तार आज के मुकाबले काफी तेज थी। आज से लगभग 60 करोड़ साल (600 मिलियन वर्ष) पहले पृथ्वी पर एक पूरा दिन वर्तमान के 24 घंटे का न होकर केवल 21 घंटे का हुआ करता था। इसका सीधा अर्थ यह है कि बीते करोड़ों वर्षों में पृथ्वी की घूमने की रफ्तार धीरे-धीरे घटी है और दिन में 3 घंटे की कुल बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है।
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गति धीमी होने के वैज्ञानिक कारण और प्रभाव
शोधकर्ताओं का मानना है कि पृथ्वी की घूमने की रफ्तार प्रभावित होने के पीछे कई प्राकृतिक और वैज्ञानिक कारक काम करते हैं। इसमें चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल और उसके कारण समुद्रों में उठने वाले ज्वार-भाटा सबसे प्रमुख हैं। ज्वारीय घर्षण के कारण पृथ्वी की ऊर्जा धीरे-धीरे कम होती जाती है, जिससे इसकी घूमने की रफ्तार में सुस्ती आती है।
इसके अलावा, पृथ्वी का आंतरिक भाग यानी कोर और उसके ऊपर स्थित मेंटल परत के बीच होने वाली हलचलें भी इस प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। पृथ्वी के केंद्र में मौजूद तरल और ठोस पदार्थों का प्रवाह ग्रह के संतुलन और इसकी घूमने की रफ्तार में मामूली लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव लाता है।
वैज्ञानिकों के विचार और अवलोकन
इस विषय पर अध्ययन कर रहे खगोलविदों और भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि आम लोगों को दैनिक जीवन में 1.8 सेकंड प्रति सदी के इस अंतर का सीधे तौर पर पता नहीं चलता। लेकिन अति-संवेदनशील प्रणालियों, जैसे परमाणु घड़ियों (Atomic Clocks), उपग्रह संचालन और अंतरिक्ष अभियानों के लिए यह सूक्ष्म अंतर भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
"पृथ्वी की घूमने की रफ्तार में आ रहा यह बदलाव दीर्घकालिक वैज्ञानिक गणनाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। करोड़ों सालों का डेटा यह साबित करता है कि ग्रह की चाल स्थिर नहीं है और इसमें लगातार बदलाव आ रहा है।"
आधुनिक तकनीक पर असर
वैज्ञानिकों का ध्यान इस बात पर भी है कि दिन की लंबाई में हो रही इस बढ़ोतरी को आधुनिक वैश्विक समय प्रणालियों में कैसे समायोजित किया जाए। आधुनिक समय मापन के लिए अत्यंत सटीक एटॉमिक क्लॉक का इस्तेमाल किया जाता है। पृथ्वी की घूमने की रफ्तार की प्राकृतिक गति और इस सटीक डिजिटल समय के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए समय-समय पर 'लीप सेकंड' जैसी व्यवस्थाओं का सहारा लेना पड़ता है। यदि पृथ्वी की घूमने की रफ्तार इसी तरह घटती रही, तो भविष्य के दूरगामी समय में कैलेंडरों और घड़ियों के मानक में बड़े बदलावों की आवश्यकता पड़ सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रक्रिया इतनी धीमी है कि मानव समाज को इसके साथ तालमेल बैठाने के लिए पर्याप्त समय मिलता रहता है।
दिन की लंबाई को लेकर अनुसंधान नया नहीं
पिछले कई दशकों से वैज्ञानिक प्राचीन कोरल रिफ (मुंगा चट्टानों) के जीवाश्मों, प्राचीन चंद्र ग्रहणों के अभिलेखों और आधुनिक लेज़र तकनीक की मदद से पृथ्वी की गति का अध्ययन करते आ रहे हैं। प्राचीन जीवाश्मों के अध्ययन से वैज्ञानिकों को यह पता चला था कि करोड़ों साल पहले एक साल में दिनों की संख्या आज की तुलना में अधिक होती थी, क्योंकि तब एक दिन छोटा होता था। उदाहरण के तौर पर, 60 करोड़ वर्ष पहले 21 घंटे का दिन होने के कारण उस समय एक वर्ष में दिनों की संख्या लगभग 417 होती थी।
इसके बाद के अध्यायों में पृथ्वी, चंद्रमा और महासागरों के बीच के संबंधों पर व्यापक शोध किए गए। हाल के वर्षों में उपग्रह आधारित जीपीएस तकनीक और परमाणु घड़ियों के आने के बाद पृथ्वी की घूमने की रफ्तार में होने वाले मिलीसेकंड स्तर के बदलावों को भी सटीकता से मापा जाना संभव हो सका है। वर्तमान आंकड़े यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं कि पृथ्वी की यह धीमी होती चाल एक दीर्घकालिक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो आने वाली सदियों में भी इसी दर से जारी रहने की संभावना है।
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