बढ़ती महंगाई के बीच बलरामपुर में मूर्तिकारों की मेहनत से आकार ले रहीं भगवान गणेश की प्रतिमाएं

खबर सार :-

बलरामपुर जिले के रामानुजगंज में पश्चिम बंगाल के कारीगरों द्वारा तैयार की जा रही भगवान गणेश की पारंपरिक प्रतिमाएं। जानिए कच्चे माल की महंगाई और मूर्तिकारों की संघर्ष गाथा।
बलरामपुर में गणेशोत्सव: बंगाल के कारीगरों द्वारा तैयार हो रहीं मूर्तियां

खबर विस्तार : -

बलरामपुर : छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में आगामी गणेशोत्सव को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। बाजारों में सजावटी सामानों की आवक शुरू हो गई है, वहीं रामानुजगंज और आसपास के ग्रामीण अंचलों में पश्चिम बंगाल से आए बंगाली कारीगर भगवान गणेश की आकर्षक प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं। बांस, मिट्टी, रस्सी और प्राकृतिक रंगों के समन्वय से तैयार होने वाली ये पारंपरिक हस्तनिर्मित मूर्तियां स्थानीय लोगों के बीच खासी पसंद की जाती हैं। आगामी 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी के साथ ही इस पर्व का औपचारिक आरंभ होगा, जिसके चलते मूर्तिकार कई हफ्तों पहले से ही निर्माण कार्यों में व्यस्त हैं।

पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक कला

रामानुजगंज क्षेत्र में इन बंगाली परिवारों के लिए मूर्ति निर्माण केवल व्यवसाय या आजीविका का साधन मात्र नहीं है, बल्कि यह उनकी पुश्तैनी और पारंपरिक कला का हिस्सा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। स्थानीय स्तर पर लगभग अस्सी वर्ष के वरिष्ठ मूर्तिकार दिलीप सरकार बताते हैं कि उन्होंने अपने बचपन के दिनों में पिता को मूर्तियां गढ़ते देखा था और उन्हीं से यह जटिल हुनर सीखा। समय के चक्र के साथ उन्होंने अपने इस अनुभव को अपनी अगली पीढ़ी यानी बेटे तक पहुंचाया और आज परिवार के युवा सदस्य भी इस विरासत को सहेजने का कार्य कर रहे हैं।

दिलीप सरकार के अनुसार, इस वर्ष उन्होंने अपने हाथों से लगभग साठ से पैंसठ गणेश प्रतिमाओं का निर्माण किया है। इन मूर्तियों की बनावट, आकार और डिजाइनों में विविधता के आधार पर इनकी कीमतें डेढ़ हजार रुपये से लेकर आठ हजार रुपये तक निर्धारित की गई हैं। यद्यपि गणेशोत्सव में अभी कुछ वक्त शेष है, फिर भी कई कलाप्रेमियों द्वारा अपनी पसंद की मूर्तियों की अग्रिम बुकिंग पहले ही कराई जा चुकी है। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार खरीदारों में बेहतर उत्साह और अधिक मांग दर्ज की जा रही है।

ये भी पढ़ें.. एनीमिया का खतरा : क्या आप हर समय थकान और कमजोरी महसूस करते हैं? इसे नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी!

कच्चे माल की बढ़ती कीमतों की चुनौती

बनी हुई मांग के बीच मूर्तिकारों के लिए सबसे बड़ी बाधा निर्माण सामग्री की बढ़ती लागत बन गई है। युवा मूर्तिकार दीपांकर का कहना है कि इस बार सुतली, रस्सी, बांस, खूंटा और लकड़ी जैसे आवश्यक घटकों के दाम आसमान छू रहे हैं। उदाहरण के लिए, जो सुतली रस्सी पूर्व में लगभग एक सौ दस रुपये प्रति किलोग्राम मिल जाती थी, उसके दाम बढ़कर अब तीन सौ रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुके हैं। इसके अतिरिक्त, ढांचा खड़ा करने के लिए आवश्यक बांस और अन्य सामग्री भी दूरदराज से मंगानी पड़ती है, जिससे कुल उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है।

मूर्तिकला में मिट्टी का चयन भी अत्यंत महत्वपूर्ण चरण होता है। स्थानीय मिट्टी के साथ-साथ गुणवत्ता बनाए रखने के लिए बाहर से मंगाई जाने वाली गंगा की मिट्टी का भी उपयोग किया जाता है। इसके पश्चात मिट्टी का ढांचा तैयार करने से लेकर उसे सुखाने, पक्का करने, रंगने और अंत में आकर्षक सजावट देने तक कई चरणों की श्रमसाध्य प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। बढ़ती लागत और आर्थिक दबाव के कारण कुछ कारीगरों ने इस वर्ष मूर्तियों की कुल संख्या सीमित कर दी है, ताकि जोखिम से बचा जा सके।

मशीनी युग में पारंपरिक कला का अस्तित्व

आधुनिक समय में जहां बाजार मशीनों से निर्मित और विभिन्न नए डिज़ाइनों वाली मूर्तियों से पटे पड़े हैं, वहीं हाथों से गढ़ी गई इन पारंपरिक प्रतिमाओं का आकर्षण आज भी अलग पहचान बनाए हुए है। रामानुजगंज में इन बंगाली कारीगरों की उपस्थिति स्थानीय गणेशोत्सव को विशिष्ट रूप प्रदान करती है। इन कलाकारों के लिए प्रत्येक मूर्ति कोई वस्तु नहीं, बल्कि उनका जीवट, उनका हुनर और पीढ़ियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर है। मिट्टी के ढेरों को आकार देते इन हाथों से केवल भगवान गणेश की मूर्तियां ही नहीं बन रहीं, बल्कि लोक कला की यह अनमोल विरासत निरंतर नई पीढ़ी तक स्थानांतरित हो रही है।

ये भी पढ़ें....बदलते मौसम में बढ़ा बीमारियों का खतरा, Infection से बचाव के लिए अपनाएं ये आसान Health Tips

अन्य प्रमुख खबरें