अस्पताल या संक्रमण का अड्डा? दुनिया के 60% स्वास्थ्य केंद्रों में बुनियादी स्वच्छता का भारी संकट

खबर सार :-

संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 60% स्वास्थ्य केंद्र बुनियादी स्वच्छता मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। जानें कैसे अस्वच्छ अस्पताल बढ़ा रहे हैं संक्रमण का खतरा।
सुरक्षित इलाज और स्वास्थ्य केंद्रों में स्वच्छता संकट: संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट

खबर विस्तार : -

Health Center Sanitation Standards : जब कोई इंसान बीमार पड़ता है, तो वह पूरी उम्मीद के साथ अस्पताल की ओर रुख करता है कि वहां उसे दर्द से राहत मिलेगी, बेहतरीन इलाज मिलेगा और वह पूरी तरह से स्वस्थ होकर अपने घर लौटेगा। लेकिन क्या आपने कभी यह कल्पना की है कि जिस अस्पताल को आपको जीवनदान देने या बीमारी से उबारने के लिए जाना जाता है, वही अस्पताल आपके लिए संक्रमण का एक नया अड्डा बन जाए? यह सुनने में भले ही डरावना लगे, लेकिन आज की वैश्विक सच्चाई यही है।

संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट ‘प्रोग्रेस ऑन वाटर, सैनिटेशन, हाइजीन, एनवायरनमेंटल क्लीनिंग एंड वेस्ट मैनेजमेंट इन हेल्थ-केयर फैसिलिटीज 2015–2025’ ने जो आंकड़े सामने रखे हैं, वे पूरी मानव सभ्यता और स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ को हिला देने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर के लगभग 60 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र आज भी बुनियादी स्वच्छता मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं, जबकि 11 फीसदी ऐसे केंद्र हैं जहां किसी भी तरह की स्वच्छता सेवा का नामोनिशान तक नहीं है। यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को दर्शाती है, बल्कि उन करोड़ों मरीजों के जीवन पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है जो हर दिन अपनी जान हथेली पर रखकर इन अस्पतालों में पहुंचते हैं।

अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की कमी 

संयुक्त राष्ट्र की इस व्यापक रिपोर्ट के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। अकेले साल 2025 की बात करें तो दुनिया भर के करीब 93.6 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने वाले अस्पतालों और क्लीनिकों में स्वच्छता की कोई बुनियादी सुविधा मौजूद नहीं थी। हालांकि, जब हम आंकड़ों की गहराई में जाते हैं तो यह तथ्य सामने आता है कि दुनिया भर की लगभग 89 फीसदी स्वास्थ्य सुविधाओं में किसी न किसी रूप में शौचालय की मौजूदगी है और 85 फीसदी में उपयोग योग्य शौचालय मौजूद बताए जाते हैं।

लेकिन कागजी आंकड़े और जमीनी हकीकत के बीच एक बहुत बड़ा और खतरनाक अंतर छिपा हुआ है। सिर्फ यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि अस्पताल के परिसर में चारदीवारी के भीतर एक शौचालय बना हुआ है। सवाल यह है कि क्या वह शौचालय मरीजों और कर्मचारियों की गरिमा, सुरक्षा और स्वास्थ्य के अनुकूल है भी या नहीं? रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि स्वच्छता का पैमाना केवल उपस्थिति तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसकी गुणवत्ता और पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

सिर्फ शौचालय होना काफी नहीं: समावेशी और सुलभ व्यवस्था की दरकार

बुनियादी स्वच्छता मानकों के दायरे में केवल शौचालय का होना ही नहीं आता, बल्कि उसकी उपयोगिता और सुरक्षा सर्वोपरि होती है। मानकों के अनुसार, स्वास्थ्य केंद्रों में बने शौचालय पूरी तरह से सुरक्षित, साफ-सुथरे और सभी के लिए सुलभ होने चाहिए। इसमें महिलाओं और पुरुषों के लिए पूरी तरह से अलग और पृथक व्यवस्था का होना अनिवार्य है।

इसके साथ ही, दिव्यांगजनों की सुगम पहुंच, बच्चों की जरूरतों और सबसे महत्वपूर्ण रूप से महिलाओं के लिए मासिक धर्म स्वच्छता (मेंस्ट्रुअल हाइजीन) की उचित व्यवस्था का होना बेहद जरूरी है। विडंबना यह है कि दुनिया के करीब आधे स्वास्थ्य केंद्रों में इनमें से एक या एक से अधिक बुनियादी व्यवस्थाओं का गंभीर अभाव पाया गया है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि यदि कोई गर्भवती महिला, कोई किशोरी या फिर व्हीलचेयर पर अपनी जिंदगी काटने को मजबूर कोई दिव्यांग मरीज अस्पताल पहुंचता है, तो वह उन शौचालयों का उपयोग या तो कर ही नहीं सकता या फिर उन्हें बेहद अपमानजनक और जोखिम भरे हालातों में इस्तेमाल करने पर मजबूर होता है। ऐसी स्थिति में चिकित्सा सेवा का मानवीय पक्ष पूरी तरह से तार-तार हो जाता है।

क्षेत्रीय असमानता और गरीब देशों के बदतर हालात

वैश्विक स्तर पर सामने आए इन आंकड़ों में क्षेत्रीय असमानता भी बेहद गहरी और चिंताजनक रूप से दिखाई देती है। रिपोर्ट में कुल 70 देशों के आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया गया है, जिससे यह साफ हो गया कि विकसित और विकासशील या गरीब देशों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं का खाईनुमा अंतर कितना बड़ा है।

उदाहरण के तौर पर, उप-सहारा अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में केवल 23 फीसदी स्वास्थ्य सुविधाएं ही बुनियादी स्वच्छता के मानकों को पूरा कर पाती हैं। वहीं, यदि हम मध्य और दक्षिणी एशिया की बात करें तो वहां यह आंकड़ा थोड़ा बेहतर होकर 55 फीसदी तक पहुंचता है। लेकिन जब बात आर्थिक रूप से बेहद कमजोर और संघर्षरत देशों की आती है, तो स्थिति और भी अधिक भयावह हो जाती है—वहां महज 9 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ही बुनियादी स्वच्छता मानकों को पूरा करने में सक्षम हैं। यह असमानता इस बात की तस्दीक करती है कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में अभी भी बहुत लंबा सफर तय करना बाकी है और कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देशों की आबादी को सबसे बड़े स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।

न सफाई के स्पष्ट नियम और न ही प्रशिक्षित सफाई कर्मचारी

केवल शौचालयों और पानी की उपलब्धता ही स्वास्थ्य केंद्रों की सफलता का पैमाना नहीं है, बल्कि उस पूरे परिसर की पर्यावरणीय सफाई भी उतनी ही मायने रखती है। किसी भी अस्पताल को सुरक्षित मानने के लिए वहां पर्यावरणीय सफाई से जुड़े स्पष्ट प्रोटोकॉल और प्रशिक्षित सफाई कर्मचारियों का होना अनिवार्य शर्त है। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के 18 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों में न तो सफाई के कोई स्पष्ट नियम या प्रोटोकॉल हैं और न ही वहां कोई प्रशिक्षित सफाई कर्मचारी नियुक्त किया गया है। सबसे डराने वाली बात यह है कि ये उपेक्षित और अस्वच्छ केंद्र दुनिया की करीब 150 करोड़ (1.5 अरब) आबादी को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराते हैं। हालांकि, वैश्विक स्तर पर यह राहत की बात जरूर है कि करीब 59 फीसदी स्वास्थ्य सुविधाएं पर्यावरणीय सफाई के मानकों को पूरा करती हैं, जहां वार्डों, मरीजों के कमरों, ऑपरेशन थिएटरों, जांच कक्षों और उपचार क्षेत्रों की सफाई के लिए बाकायदा नियम और दक्ष कर्मचारी मौजूद हैं। इसके विपरीत, सबसे निचले पायदान पर खड़े देशों में केवल 24 फीसदी केंद्र ही इस पैमाने पर खरे उतरते हैं।

संक्रमण का बढ़ता खतरा और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बार-बार इस बात को रेखांकित किया है कि अस्पतालों का दूषित, गंदा और अस्वच्छ वातावरण मरीजों को नए और गंभीर संक्रमणों के जोखिम में झोंक देता है। जब मरीज पहले से ही किसी बीमारी से लड़ रहा होता है, तो अस्पताल की गंदगी उसे एक नई बीमारी का शिकार बना देती है। इसके अलावा, अस्वच्छ और दूषित माहौल ‘एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस’ (AMR) यानी दवाओं के बेअसर होने के खतरे को भी खतरनाक स्तर तक बढ़ा देता है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में लगभग 85 फीसदी स्वास्थ्य सुविधाओं में बुनियादी जल सेवा, 72 फीसदी में हाथों की साफ-सफाई की बुनियादी सुविधा और 71 फीसदी में कचरा प्रबंधन की बुनियादी व्यवस्था तो मौजूद थी, फिर भी हर 10 में से एक स्वास्थ्य केंद्र आज भी स्वच्छ पानी और बुनियादी स्वच्छता से वंचित है। यह स्थिति न केवल चिकित्सा विज्ञान की विफलता को दर्शाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि हमने अब तक बुनियादी मानव अधिकारों में स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं को नजरअंदाज किया है।

भविष्य की दिशा

संक्षेप में कहें तो सुरक्षित इलाज का सपना केवल अच्छे डॉक्टरों, महंगी दवाओं और अत्याधुनिक मशीनों के भरोसे पूरा नहीं हो सकता। जब तक अस्पतालों में साफ पानी, स्वच्छ वार्ड, सुरक्षित और सुलभ शौचालय, हाथों की स्वच्छता और कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक एक स्वस्थ समाज की कल्पना बेमानी है।मई 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्वास्थ्य केंद्रों में पानी, स्वच्छता और सफाई से जुड़ी सेवाओं को मजबूत करने के लिए नए राष्ट्रीय मानकों, नियमित निगरानी और पर्याप्त वित्तीय निवेश का आह्वान किया गया है, जो एक सकारात्मक कदम है। अब समय आ गया है कि सरकारें और स्वास्थ्य एजेंसियां केवल कागजी आंकड़ों की गिनती बंद करें और यह जमीनी हकीकत सुनिश्चित करें कि इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल आने वाला हर मरीज स्वस्थ होकर घर लौटे, न कि अस्पताल के अस्वच्छ माहौल से कोई नया संक्रमण लेकर जाए। मरीज की सुरक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि एक बेहतर और न्यायसंगत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की मूल बुनियाद है।

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