21 मई 1991: भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला पन्ना
तारीख- 21 मई 1991 (21 May 1991)। वक्त- ढलती हुई शाम। देश आम चुनावों के शोर में डूबा हुआ था। सियासी सरगर्मियां चरम पर थीं और भविष्य की सरकार को लेकर कयासों का बाजार गर्म था। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि इसी शाम को चेन्नई (मद्रास) से करीब 30 मील दूर श्रीपेरंबुदूर (Sriperumbudur) के मैदान में एक ऐसा खूनी खेल खेला जाने वाला है, जो भारत के इतिहास की दिशा और दशा हमेशा के लिए बदल देगा। एक आत्मघाती मानव बम (Suicide Bomber) के धमाके ने देश के सबसे युवा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) को हमसे हमेशा के लिए छीन लिया। इस भीषण हत्याकांड (Assassination) की खबर जब दुनिया के कोने-कोने में फैली, तो हर तरफ सन्नाटा पसर गया। वैश्विक मीडिया घरानों से लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों तक, हर कोई स्तब्ध था।
उस दौर के पत्रकार बताते हैं कि जब यह खबर फ्लैश हुई, तो पहले किसी को यकीन ही नहीं हुआ। चुनावी रैलियों की गहमागहमी के बीच एक वीभत्स बम विस्फोट (Bomb Blast) ने नेहरू-गांधी वंश के सबसे आधुनिक चेहरे का अंत कर दिया था। इस त्रासदी ने न केवल एक परिवार को तोड़ा, बल्कि देश की सियासत में एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया जिसे भरना नामुमकिन लग रहा था।

राजीव गांधी का राजनीतिक सफर जितना चमकीला था, उसकी शुरुआत उतनी ही दुखद परिस्थितियों में हुई थी। साल 1984 में इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के बाद राजीव गांधी को बेहद कठिन परिस्थितियों में देश की कमान संभालनी पड़ी थी। उस दौर के गवाह रहे पत्रकार याद करते हैं कि 31 अक्टूबर 1984 की रात जब राजीव गांधी देश के नाम अपना पहला संदेश रिकॉर्ड कराने वाले थे, तब राजधानी दिल्ली में सिख विरोधी दंगों की आग सुलग रही थी। हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल था।
एक अनसुना किस्सा: उस रात 1 अकबर रोड पर नए प्रधानमंत्री का भाषण तैयार करने में उनके करीबी दोस्त और महानायक अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) मदद कर रहे थे। उस समय वहां कोई टाइपराइटर मौजूद नहीं था, इसलिए एक महिला पत्रकार की हस्तलेखन (Handwriting) का उपयोग करके भाषण को कागज पर उतारा गया। राजीव गांधी को हिंदी के कुछ जटिल शब्दों के उच्चारण में दिक्कत हो रही थी, क्योंकि वे सीधे हाथ से लिखे गए कागज से पढ़ रहे थे। यह वही दौर था जब राजीव गांधी बेहद अनिच्छा के साथ राजनीति (Politics) के अखाड़े में उतरे थे। अपनी मौत से महज एक साल पहले दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने खुद यह स्वीकार किया था कि उन पर राजनीति में आने का भारी दबाव था। उन्होंने कहा था, "मुझे लगा कि एक जरूरत है, एक शून्य है जिसे भरना जरूरी है।"

राजीव गांधी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वे तकनीकी क्रांति और आधुनिक भारत के सपने के अग्रदूत थे। उनकी अमेरिका यात्रा (US Visit) आज भी कूटनीति के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है। अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए उनके कहे शब्द आज भी हर भारतीय को गौरवान्वित करते हैं। उन्होंने वैश्विक मंच पर डंके की चोट पर कहा था "भारत एक प्राचीन देश है, लेकिन एक युवा राष्ट्र है और हर युवा की तरह हममें अधीरता है। मैं भी युवा हूँ और मुझमें भी धीरज की कमी है।" वे देश के माथे से 'विकासशील देश' का टैग हटाकर उसे 21वीं सदी (21st Century) में ले जाने का सपना देखते थे। जब उनसे एक बार पूछा गया कि वे खुद को किस रूप में याद किया जाना पसंद करेंगे, तो उनका उत्तर था कि वे भारत को एक आधुनिक और सशक्त राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं।
21 मई 1991 की रात जैसे ही श्रीपेरंबुदूर से मौत की खबर आई, पूरी दुनिया के न्यूज़ रूम्स में हड़कंप मच गया। आज के डिजिटल युग के विपरीत, 90 के दशक की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय संचार व्यवस्था और टेलीफोन लाइनें इतनी सुगम नहीं थीं। भारत से संपर्क साधना एक पहाड़ तोड़ने जैसा काम था। जैसे-जैसे तड़के सुबह की डेडलाइन नजदीक आ रही थी, वैसे-वैसे ग्राउंड रिपोर्टर्स से संपर्क करने की कोशिशें तेज की गईं। वैश्विक नेताओं के शोक संदेश आने शुरू हो गए थे। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश (George Bush), ब्रिटिश प्रधानमंत्री जॉन मेजर और राष्ट्रमंडल के महासचिव एमेका अन्याकू ने इसे वैश्विक क्षति बताया।
दूसरी ओर, हैदराबाद और मद्रास से आ रही खबरें डरावनी थीं। राजीव गांधी की हत्या की खबर सुनते ही दक्षिण भारत के कई हिस्सों में हिंसक झड़पें (Violence) शुरू हो गई थीं। जनमानस आक्रोशित था और हर कोई यह जानना चाहता था कि इस खूनी साजिश के पीछे आखिर कौन है। तत्कालीन गृह राज्य मंत्री सुबोधकांत सहाय ने शुरुआती जांच के आधार पर आतंकी संगठन एलटीटीई (LTTE) की तरफ इशारा किया था, जिसने बाद में देश को हिलाकर रख दिया।

इस हत्याकांड ने न केवल देश को झकझोरा, बल्कि सबसे बड़ा संकट कांग्रेस पार्टी (Congress Party) के सामने खड़ा कर दिया। चुनावी समर के बीचोबीच पार्टी का सर्वोच्च नेता चला गया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि यह भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। हर जुबान पर एक ही सवाल था- अब कांग्रेस का नेतृत्व (Leadership) कौन करेगा? पार्टी के भीतर और बाहर कयासों का दौर जारी था। कुछ वरिष्ठ संपादकों ने संकेत दिया कि इस संकट की घड़ी में पी. वी. नरसिम्हा राव (P. V. Narasimha Rao) का नाम अंतरिम नेता के रूप में सबसे आगे आ सकता है। लेकिन उस रात नरसिम्हा राव दिल्ली में नहीं, बल्कि नागपुर में थे और उनकी तबीयत भी खराब थी।
तड़के सुबह जब पत्रकारों ने नागपुर में उनके ठिकाने पर फोन मिलाया, तो दूसरी तरफ से एक उनींदी और भारी आवाज आई- "बोल रहा हूँ।" जब उनसे राजीव गांधी की हत्या पर प्रतिक्रिया मांगी गई, तो उन्होंने बेहद भावुक होकर कहा, "मुझे तो इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ। जब खबर मिली तो मैं पूरी तरह स्तब्ध रह गया। यह हमारे देश के लिए परीक्षा की घड़ी है। कांग्रेस के लिए यह बहुत बड़ा झटका है, लेकिन पार्टी इस सदमे को सहन कर लेगी। मुझे उम्मीद है कि इस भयानक त्रासदी के बाद भी पार्टी अपनी ताकत बनाए रखेगी।" लेकिन असली 'ब्रेकिंग न्यूज़' तब सामने आई जब उनसे पूछा गया कि क्या वे इस संकट में कांग्रेस की कमान संभालने के लिए तैयार हैं? इस पर राव साहब ने अपनी राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए कहा, "यह पूरी तरह से कांग्रेस कार्य समिति (CWC) पर निर्भर करता है कि वे मुझे क्या जिम्मेदारी देते हैं। मैं जल्द ही दिल्ली के लिए निकल रहा हूँ।" इस एक बयान ने साफ कर दिया था कि वे देश के अगले नेतृत्व की दौड़ में शामिल हो चुके थे।
इस भयावह घटना के तुरंत बाद मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन (T. N. Seshan) ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई और देश में चल रहे आम चुनावों के अगले दो चरणों को जून तक के लिए टाल दिया। देश में कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका को देखते हुए सेना (Indian Army) को अलर्ट पर रखा गया था। 22 मई 1991 की सुबह जब देश की जनता सोकर उठी, तो अखबारों की सुर्खियां और रेडियो-टीवी के बुलेटिन देश के एक चहेते नेता की विदाई की चीख-पुकार से भरे थे। एनालॉग तकनीक के उस दौर में, जहां टेप को ब्लेड से काटकर और चिपकाकर खबरें तैयार होती थीं, पत्रकारों ने रातभर जागकर इस ऐतिहासिक और दुखद घटना की पल-पल की रिपोर्ट दुनिया तक पहुंचाई। वह रात आज भी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक कभी न भूलने वाले जख्म की तरह दर्ज है।
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