Parliament Monsoon Session अनिश्चितकाल के लिए स्थगित: विपक्ष ने सरकार पर लगाया चर्चा से भागने का आरोप, सत्ता पक्ष ने विपक्ष को घेरा
खबर सार :-
संसद का मानसून सत्र हंगामे और राजनीतिक खींचतान के बीच समाप्त हो गया है। जहाँ कांग्रेस ने कई महत्वपूर्ण विधेयकों के अटकने को विपक्ष की एकजुटता का परिणाम बताया, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने सत्र में हुए व्यवधान के लिए कांग्रेस नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया है।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली: संसद का हाल ही में संपन्न हुआ मानसून सत्र भारी राजनीतिक गतिरोध, हंगामे और सत्ता पक्ष व विपक्ष के बीच तीखे आरोपों के बीच अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। सत्र के समापन के उपरांत दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे पर संसदीय कार्यवाही को बाधित करने का दोष मढ़ा है। एक तरफ जहाँ कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार गंभीर मुद्दों पर जवाबदेही से बचने का प्रयास कर रही थी, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का कहना है कि मुख्य विपक्षी दल की हठधर्मिता और अनुचित रवैये के कारण सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से नहीं चल सकी।
कार्यवाही के ब्यौरे के अनुसार, इस पूरे सत्र के दौरान कुल 12 विधेयक पेश किए गए, जिनमें से 11 विधेयक बिना किसी विस्तृत चर्चा के पारित कर दिए गए। केवल एक विधेयक, जो प्रतियोगी परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम से संबंधित था, पर ही व्यापक बहस हो सकी। आंकड़ों के मुताबिक, इस सत्र के दौरान लोकसभा में कार्य उत्पादकता मात्र 19 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि राज्यसभा में यह आंकड़ा 39 प्रतिशत रहा।
विधेयकों पर असहमति और विपक्षी रुख
सत्र की समाप्ति के बाद आयोजित एक पत्रकार वार्ता में कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश और लोकसभा में दल के उपनेता गौरव गोगोई ने सरकार की विधायी नीतियों पर सवाल उठाए। कांग्रेस नेताओं का दावा है कि विपक्षी दलों के कड़े विरोध के चलते सरकार 'एक देश-एक चुनाव', परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन और विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025 जैसे महत्वपूर्ण प्रस्तावों को इस सत्र में प्रस्तुत नहीं कर सकी। इसके अतिरिक्त, विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) से संबंधित विधेयक को विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति को सौंप दिया गया है।
"नंबर वन और नंबर टू पूरे सत्र में नहीं दिखे। सिर्फ अंत में आए और सदन बंद हो गया।"
— जयराम रमेश, वरिष्ठ कांग्रेस नेता
विपक्षी दलों ने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों, नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ियों, विदेश नीति और ढांचागत परियोजनाओं की स्थिति जैसे मुद्दों पर चर्चा कराने की मांग रखी थी। कांग्रेस का तर्क है कि सरकार इन विषयों पर विस्तृत बहस कराने से बचती रही, जिसके कारण सदन में सामान्य कामकाज प्रभावित हुआ।
सत्ता पक्ष का पलटवार और आरोप
दूसरी ओर, भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस के आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि विपक्ष का ध्यान सकारात्मक चर्चा के बजाय केवल व्यवधान उत्पन्न करने पर था। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेतृत्व के गैर-जिम्मेदाराना आचरण के कारण जनहित से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर बातचीत नहीं हो सकी। सत्ता पक्ष का कहना है कि जब भी सरकार नियमानुसार चर्चा कराने के लिए तैयार हुई, विपक्षी सदस्य नारों और हंगामे का सहारा लेकर प्रक्रिया से दूर चले गए।
विधायी कामकाज और उत्पादकता
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सत्र के समापन पर मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि विपरीत परिस्थितियों और बार-बार के स्थगन के बावजूद सरकार ने 12 महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में सफलता प्राप्त की है। उन्होंने कहा कि विधायी कार्य की दृष्टि से यह सत्र फलदायी रहा, यद्यपि विधायी बहसों की गुणवत्ता के दृष्टिकोण से यह अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार हर मुद्दे पर नियमानुकूल बहस के लिए तत्पर थी, किंतु विपक्षी दलों की प्राथमिकताओं में संसदीय विमर्श शामिल नहीं था।
संसद का यह मानसून सत्र आरंभ से ही विभिन्न नीतिगत और प्रशासनिक विषयों को लेकर असहमतियों की छाया में रहा। विपक्षी दल जहां जनहित और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के वक्तव्य की मांग पर अड़े रहे, वहीं सरकार का जोर पूर्व-निर्धारित विधायी एजेंडे को पूरा करने पर था। वर्ष 2015 के मानसून सत्र के दौरान भी इसी प्रकार की परिस्थितियां निर्मित हुई थीं, जब विभिन्न विषयों पर हुए हंगामे के कारण संसदीय कार्यवाही प्रभावित हुई थी। मौजूदा सत्र में खान एवं खनिज संशोधन विधेयक तथा राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम संशोधन विधेयक जैसे विधायी प्रस्ताव बिना विस्तृत बहस के पारित हुए हैं, जिन्हें लेकर आने वाले समय में कानूनी और राजनीतिक मंचों पर बहस जारी रहने की संभावना है।
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