युद्ध और समुद्री संकट के बीच भारतीय नाविकों की सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए डीजीएमए ने उठाया बड़ा कदम

खबर सार :-

समुद्री सुरक्षा और आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए डीजीएमए ने ई-नैविक पोर्टल पर सीफेयरर ट्रैकिंग मॉड्यूल शुरू किया है। जानिए इसकी पूरी जानकारी और महत्व।
भारतीय नाविकों की सुरक्षा के लिए डीजीएमए का सीफेयरर ट्रैकिंग मॉड्यूल शुरू

खबर विस्तार : -

कोलकाता:  हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक हालात और समुद्री सुरक्षा से जुड़े खतरों के बीच भारत ने अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर निगरानी तंत्र मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। समुद्री प्रशासन महानिदेशालय (DGMA) ने ई-नैविक पोर्टल पर सीफेयरर ट्रैकिंग मॉड्यूल की शुरुआत की है। इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य भारतीय और विदेशी झंडे वाले जहाजों पर तैनात भारतीय नाविकों की स्थिति और उनके जलपोतों की आवाजाही से जुड़ी जानकारी को एक केंद्रीकृत मंच पर उपलब्ध कराना है। विशेष रूप से बंगाल की खाड़ी जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह व्यवस्था समुद्री सुरक्षा और मछुआरों के लिए काफी उपयोगी साबित होगी।

बंगाल की खाड़ी का जोखिम भरा सफर और चुनौतियां

बंगाल की खाड़ी में भारत और बांग्लादेश की समुद्री सीमा पर आजीविका की तलाश में निकलने वाले मछुआरों के लिए हर साल का सफर काफी जोखिम भरा रहता है। तटरक्षक बलों और मछुआरा संगठनों के पिछले चार-पांच सालों के आंकड़े दर्शाते हैं कि खराब मौसम, चक्रवाती तूफानों और इंजन खराब होने के कारण हर साल दोनों देशों के औसतन 150 से 200 नाविक व मछुआरे अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर भटक जाते हैं या समुद्र के बीच फंस जाते हैं। इनमें से अधिकांश को संयुक्त अभियानों और फ्लैग बैठकों के जरिए बचा लिया जाता है, लेकिन उफनती लहरों और नाव पलटने की घटनाओं में हर साल 30 से 50 मछुआरे गहरे समुद्र में अपनी जान गंवा बैठते हैं या लापता हो जाते हैं। छोटे ट्रॉलरों में आधुनिक जीपीएस और नेविगेशन प्रणाली की कमी के कारण जून से अक्टूबर के मॉनसून सीजन में यह संकट और अधिक गंभीर हो जाता है।

आपात स्थिति में सुगम होगी जहाजों की ट्रैकिंग

किसी भी समुद्री दुर्घटना, जहाज पर हमले, आगजनी, समुद्री डकैती या अन्य आपात हालात में सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि प्रभावित जहाज कहां है और उस पर कितने भारतीय नागरिक सवार हैं। अभी तक यह जानकारी विभिन्न एजेंसियों, शिपिंग कंपनियों और संचालकों के माध्यम से अलग-अलग जुटानी पड़ती थी। इस नई प्रणाली के जरिए इसी सूचना तंत्र को एक जगह लाया गया है। इसमें जहाज की पहचान, उसकी मौजूदा स्थिति, यात्रा से जुड़ी जानकारी, उस पर मौजूद भारतीय नाविकों का विवरण और संबंधित भर्ती एजेंसी का ब्योरा दर्ज किया जाएगा। जहाज की वास्तविक स्थिति उपलब्ध न होने पर संबंधित भौगोलिक क्षेत्र का चयन कर जानकारी दर्ज करने की सुविधा भी दी गई है, जिससे संकट के समय तुरंत मदद पहुंचाई जा सके।

उच्च जोखिम वाले समुद्री क्षेत्र और रोजाना अपडेट

डीजीएमए ने बंगाल की खाड़ी के अलावा हॉर्मुज जलडमरूमध्य, फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी, लाल सागर, अदन की खाड़ी, बाब-अल-मंदेब, काला सागर और सोमालिया के आसपास के जल क्षेत्रों को उच्च जोखिम वाला क्षेत्र घोषित किया है। इन इलाकों में मौजूद जहाजों और नाविकों की जानकारी को रोजाना अपडेट करना अनिवार्य किया गया है। चालक दल के किसी सदस्य के जहाज पर आने या उतरने की सूचना भी नियमित रूप से दर्ज करनी होगी। हालांकि यह प्रणाली अभी बीटा संस्करण में है और इसमें संबंधित कंपनियों व एजेंसियों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।

पश्चिम एशिया के संकट और विशेषज्ञों की राय

हाल के घटनाक्रमों ने इस तरह की ट्रैकिंग व्यवस्था की जरूरत को और बढ़ा दिया है। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, मध्य-पूर्व के संकट में अब तक दस भारतीय नाविकों की जान जा चुकी है, जबकि काला सागर क्षेत्र में पांच और भारतीय नाविकों के मारे जाने की पुष्टि हुई है। इन घटनाओं ने यह गंभीर सवाल खड़ा किया है कि संकट के समय सरकार के पास विदेशों में मौजूद भारतीय नाविकों का कितना सटीक डेटा उपलब्ध है।

सेवानिवृत्त नौसेना अधिकारी धनंजय भगत ने इस पहल को समुद्री स्थितिजन्य जागरूकता मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। उनके अनुसार, समुद्री सुरक्षा के लिए केवल यह जानना काफी नहीं है कि जहाज कहां है, बल्कि यह भी जरूरी है कि उस पर कितने भारतीय नागरिक मौजूद हैं। यदि यह जानकारी विश्वसनीय और अद्यतन रूप में मिलती है, तो नौसेना, तटरक्षक और विदेश मंत्रालय जैसी एजेंसियों के बीच समन्वय तेजी से स्थापित किया जा सकता है।

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