ऊर्जा संकट के बीच भारत की बड़ी तैयारी, LNG के लिए अब 15 देशों पर भरोसा, 41 देशों से कच्चे तेल की खरीद

खबर सार :-

पश्चिम एशिया संकट ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को नई दिशा दी है। एलएनजी और कच्चे तेल के आयात स्रोतों का विस्तार देश को वैश्विक आपूर्ति झटकों से बचाने में मदद करेगा। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की क्षमता बढ़ने से संकट के समय अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी। आने वाले समय में विविध आयात स्रोत, मजबूत भंडारण और लगातार बाजार निगरानी भारत की ऊर्जा नीति के अहम आधार बने रहेंगे।
ऊर्जा संकटः LNG के लिए भारत सरकार की नई चाल

खबर विस्तार : -

India's energy security: पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने एलएनजी आयात के स्रोत छह देशों से बढ़ाकर 15 देशों तक कर दिए हैं। वहीं कच्चे तेल की खरीद भी अब 41 देशों से की जा रही है। सरकार का कहना है कि इस रणनीति से किसी एक देश, क्षेत्र या मार्ग पर निर्भरता घटेगी और वैश्विक आपूर्ति संकट से निपटने की क्षमता बढ़ेगी।

ऊर्जा आपूर्ति के लिए बढ़ाई गई निर्भरता की रेंज

पश्चिम एशिया में जारी संकट और वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत ने एलएनजी यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस के आयात स्रोतों में व्यापक बदलाव किया है। अब देश छह देशों के बजाय 15 देशों से एलएनजी आयात कर रहा है। सरकार के मुताबिक, इस कदम का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र या आपूर्ति मार्ग पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता को कम करना है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने सोमवार को राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारत ने केवल एलएनजी ही नहीं, बल्कि कच्चे तेल की खरीद के स्रोतों का नेटवर्क भी तेजी से विस्तारित किया है।

कच्चे तेल के लिए 41 देशों का नेटवर्क

सरकार के अनुसार, भारत पहले 27 देशों से कच्चे तेल का आयात करता था, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 41 देशों तक पहुंच गई है। यानी देश ने कच्चे तेल की खरीद के लिए भी अपने वैश्विक विकल्पों का दायरा काफी बढ़ाया है। मंत्री ने कहा कि आयात स्रोतों में यह विविधता किसी एक देश, क्षेत्र या पारगमन मार्ग पर निर्भरता कम करने में मदद करती है। इससे आपूर्ति में अचानक आने वाले व्यवधानों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले तेज उतार-चढ़ाव से निपटने की भारत की क्षमता भी मजबूत होती है। यह रणनीति ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ने की आशंका बनी हुई है। तेल और गैस की कीमतों में अचानक होने वाली तेजी का सीधा असर आयात बिल और घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

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वैश्विक बाजार पर सरकार की नजर

सुरेश गोपी ने कहा कि सरकार ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े जोखिमों की नियमित निगरानी करती है। इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र की तेल और गैस कंपनियों के साथ-साथ अन्य संबंधित पक्षों के साथ समन्वय किया जाता है। वैश्विक बाजार में होने वाले बदलावों का लगातार आकलन किया जाता है, ताकि किसी संभावित संकट से पहले जरूरी कदम उठाए जा सकें। सरकार का कहना है कि कच्चे तेल, एलएनजी और पेट्रोलियम उत्पादों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है। बाजार की परिस्थितियों और जरूरत के आधार पर आवश्यक कदम उठाए जाते हैं।

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भारत के लिए क्यों जरूरी है ऊर्जा सुरक्षा?

भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी भी बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम का असर देश की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। पश्चिम एशिया वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से उत्पादन, समुद्री परिवहन, शिपिंग मार्ग और आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने का जोखिम रहता है। ऐसे में अलग-अलग देशों से ऊर्जा खरीदना भारत के लिए रणनीतिक सुरक्षा कवच की तरह काम कर सकता है। आयात स्रोतों में विविधता बढ़ने से यदि किसी एक देश से आपूर्ति बाधित होती है, तो भारत के पास दूसरे बाजारों से खरीद बढ़ाने का विकल्प मौजूद रहेगा। इससे अचानक पैदा होने वाली कमी और कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव के असर को सीमित करने में मदद मिल सकती है।

रणनीतिक तेल भंडार भी बढ़ा रहा भारत

भारत केवल आयात स्रोतों को विविध बनाने तक सीमित नहीं है। सरकार रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। इसका मकसद वैश्विक बाजार में अचानक आपूर्ति संकट या कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल की स्थिति में देश को अतिरिक्त सुरक्षा देना है। इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड यानी आईएसपीआरएल ने आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों में तीन रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व सुविधाएं स्थापित की हैं। इनकी कुल क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन यानी एमएमटी है। इन भंडारों में जरूरत के समय इस्तेमाल के लिए कच्चा तेल सुरक्षित रखा जाता है। वैश्विक बाजार में असाधारण अस्थिरता आने पर सार्वजनिक क्षेत्र की तेल रिफाइनरियां इन भंडारों का इस्तेमाल कर सकती हैं। इससे अचानक पैदा हुई आपूर्ति चुनौती से निपटने में मदद मिलती है।

ओडिशा और कर्नाटक में नई परियोजनाएं

सरकार ने रणनीतिक भंडारण क्षमता को और बढ़ाने के लिए दो अतिरिक्त वाणिज्यिक-सह-रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व सुविधाओं को भी मंजूरी दी है। इन दोनों परियोजनाओं की कुल क्षमता 6.5 एमएमटी होगी। इनमें ओडिशा के चांदीखोल और कर्नाटक के पडुर में विकसित की जाने वाली सुविधाएं शामिल हैं। इन परियोजनाओं को जुलाई 2021 में मंजूरी दी गई थी। इनके पूरा होने के बाद भारत की रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता और मजबूत होगी। रणनीतिक भंडार और आयात स्रोतों का विस्तार मिलकर भारत को वैश्विक ऊर्जा झटकों से निपटने के लिए अतिरिक्त विकल्प देते हैं। खासतौर पर पश्चिम एशिया जैसे महत्वपूर्ण ऊर्जा क्षेत्र में संकट के दौरान यह व्यवस्था देश की ऊर्जा आपूर्ति को अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित रखने में मदद कर सकती है।

ऊर्जा रणनीति में बड़ा बदलाव

भारत की मौजूदा रणनीति केवल अधिक तेल और गैस खरीदने की नहीं, बल्कि खरीद के स्रोतों और भंडारण क्षमता दोनों को मजबूत करने की है। एलएनजी के लिए छह से 15 देशों और कच्चे तेल के लिए 27 से 41 देशों तक पहुंच बढ़ना इसी व्यापक रणनीति का संकेत है। सरकार की कोशिश है कि वैश्विक स्तर पर किसी एक क्षेत्र में संकट पैदा होने पर उसका असर भारतीय ऊर्जा आपूर्ति पर सीमित रहे। इसके साथ रणनीतिक भंडार देश को अचानक पैदा होने वाले आपूर्ति झटकों के खिलाफ अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करेंगे।

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)...

1. भारत अब कितने देशों से LNG आयात कर रहा है?

भारत ने LNG आयात के स्रोत छह देशों से बढ़ाकर 15 देशों तक कर दिए हैं।

2. भारत कितने देशों से कच्चा तेल खरीद रहा है?

भारत अब 41 देशों से कच्चे तेल का आयात कर रहा है, जबकि पहले यह संख्या 27 थी।

3. आयात स्रोत बढ़ाने से भारत को क्या फायदा होगा?

इससे किसी एक देश, क्षेत्र या पारगमन मार्ग पर निर्भरता कम होगी और आपूर्ति बाधित होने के जोखिम से निपटने में मदद मिलेगी।

4. भारत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार क्यों बढ़ा रहा है?

रणनीतिक भंडार का उद्देश्य वैश्विक बाजार में अचानक आपूर्ति संकट या कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के दौरान देश की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखना है।

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