लखनऊ, अमेरिकी राष्ट्रपति इन दिनों टैरिफ के प्रेम दीवाने हो गए हैं। अपने देश को आर्थिक समृद्धि प्रदान करने के लिए टैरिफ उनके सिर पर सवार है। जिस दिशा में उनका ध्यान खिंच जाता है, उस दिशा वाले देशों के लिए शुल्क पत्र लिख भेजे जा रहे हैं। वह टैरिफ से खेल रहे हैं, इसका यह मतलब नहीं है कि उनकी इससे कोई रंजिश है। बस थोड़ी दिल्लगी जरूर है। ट्रंप के देश में कुछ औद्योगिक घराने वाले नाराज बताए जा रहे हैं। कुछ दिनों पहले तक करीबी रहे एलन मस्क ने भी अपनी दोश्त को फिलहाल नांद में बंद कर दिया है।
अमेरिका की अर्थ व्यवस्था भी इन दिनों काफी खराब है। मंदी के मुहाने पर खड़े ट्रंप को शुल्क पत्र सबसे बढ़िया और सरल तरीका सूझ रहा है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि अमेरिका से औद्योगिक प्रतिस्पर्धा करने वाला दूसरा मुल्क नहीं है। दबाव बनाने के लिए भी टैरिफ अच्छा रास्ता है, लेकिन भारत और चीन संपन्न राष्ट्र है। यदि यह कुछ आयात करते हैं तो कुछ निर्यात भी करते हैं। कुछ अन्य राष्ट्रों में फिलीपीन, ब्रुनेई, मॉल्डोवा, अल्जीरिया, लीबिया, इराक और श्रीलंका तक अमेरिकी पैगाम पहुंच चुका है। जब तक ट्रंप को टैरिफ शब्द के प्रति मोह रहेगा, वह अपना ही मूड बिगाड़ते रहेंगे। इस बार उनका मूड बिगड़ा तो नए टैरिफ की घोषणाएं कर दीं। पिछली बार उन्होंने टैरिफ को बम के रूप में फोड़ा था, लेकिन बाद में सात जुलाई तक इसे समेट लिया।
इस बार समय सीमा खत्म होते ही उन्होंने मनमर्जी वाला टैरिफ थोप दिया है। बुधवार को ब्राजील पर 50 प्रतिशत, जबकि अल्जीरिया, ब्रुनेई, ईराक, लीबिया, मोलदोवा, फिलिपींस और श्रीलंका पर अलग-अलग टैरिफ लगाया है। अल्जीरिया, इराक, लीबिया और श्रीलंका पर 30 प्रतिशत, ब्रुनेई और मालदोवा पर 25 फीसद टैरिफ लगाए तो सवाल उठने लगे। फिलिपींस पर 20 प्रतिशत टैरिफ लगा है। अभी एक और बात चल रही है कि टैरिफ की यह नई दर एक अगस्त से लागू होगी।
बता दें कि ट्रंप अपने तरीके से काम कर रहे हैं तो अन्य देश भी बीच का रास्ता तलाश रहे हैं। इसी टैरिफ के चलते चीन से पहले ही मनमुटाव हो चुका है। भारत भी डेयरी और कृषि उत्पाद पर किसी प्रकार की दादागीरी नहीं सहेगा। अभी दो दिन पहले कृषि मंत्री ने कह दिया है कि राष्ट्र सर्वापर है। किसानों के हित में ही फैसले लिए जाएंगे। उधर, वाशिंगट का भी जिक्र ट्रंप कर चुके हैं। उन्होंने दावा किया कि भारत से समझौता लगभग हो चुका है। उनका भारत के प्रति बड़ी दिलचस्पी है। यह बात तो सब जानते हैं कि जिस देश के प्रति ट्रंप का मोह है, उसे वह छोड़ने वाले नहीं हैं, लेकिन इससे उनका दांव उलटा साबित हो सकता है। यही बात आर्थिक विश्लेषक कहते हैं कि शुल्क से मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ेगा। ट्रंप की टैरिफ में मनमानी से आर्थिक विकास में कमी आएगी।
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