शेख हसीना बांग्लादेश वापसी की तैयारी में, दिसंबर में राजनीतिक भूचाल के संकेत
खबर सार :-
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना बांग्लादेश लौटने की तैयारी कर रही हैं। दिसंबर में उनकी संभावित वापसी से वहां की राजनीति में बड़ा भूचाल आ सकता है।
खबर विस्तार : -
Sheikh Hasina Bangladesh : जब दक्षिण एशिया के कूटनीतिक गलियारों में कोई सुगबुगाहट होती है, तो उसका असर पूरे उपमहाद्वीप पर पड़ना तय माना जाता है। पिछले कुछ समय से दिल्ली में रह रहीं बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री की गतिविधियों ने एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का पारा चढ़ा दिया है। हाल ही में उन्होंने वर्चुअल माध्यम से जो बयान दिए हैं, उसने सियासी पंडितों को नए सिरे से समीकरण साधने पर मजबूर कर दिया है।
वतन वापसी का खुला ऐलान
राजनीतिक निर्वासन या अनिश्चितता के बादल चाहे जितने गहरे हों, कुछ नेता अपनी माटी से जुड़ाव छोड़ने को तैयार नहीं होते। कुछ ऐसी ही जिद अब शेख हसीना बांग्लादेश की सियासत में फिर से हलचल मचाने के लिए दिखा रही हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि सत्ता की लालसा के लिए नहीं, बल्कि देश को बचाने के लिए उनकी वापसी जरूरी है। उन्होंने जिस तरह से दिसंबर में लौटने का संकेत दिया है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में ढाका की सड़कों से लेकर कूटनीतिक बैठकों तक सरगर्मी बढ़ने वाली है। गिरफ्तारी का खतरा होने के बावजूद उनका यह तेवर उनके पुराने तेवर की याद दिलाता है।
सत्ता समीकरण और अंदरूनी कलह
बीते कुछ समय से पड़ोसी मुल्क में जो बदलाव देखे गए हैं, उन्होंने वहां की प्रशासनिक नींव को हिलाकर रख दिया है। अंतरिम सरकार के दौर में जिस तरह से हालात बदले हैं, उस पर सवाल उठने लगे हैं। जानकारों का मानना है कि शेख हसीना बांग्लादेश की वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ एक बड़ा जनसमूहाम जुटाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। उनके समर्थकों और अवामी लीग के कार्यकर्ताओं पर जिस तरह का दबाव बनाया जा रहा है, उसने पार्टी के भीतर संघर्ष की एक नई आग सुलगा दी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि जब वह ज़मीन पर उतरेंगी, तो ज़मीनी स्तर पर जनता का रुख किस करवट बैठता है।
क्षेत्रीय स्थिरता पर मंडराते सवाल
किसी भी देश की आंतरिक उथल-पुथल का असर सिर्फ उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। भारत और दक्षिण एशिया के अन्य देशों की नजरें इस घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। जानकारों का कहना है कि एक अशांत पड़ोसी भारत की सुरक्षा के लिहाज से भी चिंता का विषय बन सकता है। ऐसे समय में जब शेख हसीना बांग्लादेश के आर्थिक और लोकतांत्रिक स्वरूप को फिर से पटरी पर लाने की बात कर रही हैं, क्षेत्रीय सहयोग और कूटनीति की भूमिका और अधिक अहम हो जाती है। उनके पुत्र सजीब वाजेद की ओर से अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेषकर भारतीय मीडिया से की गई अपील भी इसी रणनीति का हिस्सा है।
भविष्य की अनिश्चितता और राजनीतिक भविष्य
आने वाला दिसंबर का महीना पड़ोसी देश के राजनीतिक भविष्य की नई इबारत लिख सकता है। क्या शेख हसीना बांग्लादेश की सियासत में एक बार फिर से किंगमेकर या मुख्य धुरी बन पाएंगी, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि उनकी संभावित वापसी किसी बड़े राजनीतिक तूफान से कम नहीं होगी। वहां की मौजूदा व्यवस्था और उनके बीच की रस्साकसी अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां से हर एक कदम बेहद नपे-तुले ढंग से उठाया जा रहा है।
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