चीन बढ़ा रहा दोस्ती का हाथ, ब्रिक्स सम्मेलन पर दुनिया की निगाह
खबर सार :-
चीन और भारत के बीच कई सालों से अनबन की स्थिति रही। लेकिन मौजूदा हालात कह रहे हैं कि चीन दोस्त की भूमिका में है, ऐसे में भरत को सभी ब्रिक्स देशों को साथ लेकर ही चलना होगा। साथ ही वर्तमान में चीन से दूरियां कम करना भारत के हित में ही है।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली : चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग आज शनिवार को नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत पहुंच रहे हैं। उनकी यह यात्रा लगभग सात वर्षों बाद हो रही है। भारत और चीन दोनों वैश्विक स्तर पर बढ़ते युद्ध और तनाव के बीच अपनी विकास यात्रा को गतिशील बनाए हुए हैं।
भारत को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से काफी उम्मीदें
भले ही चीन और भारत के बीच कई सालों से अनबन की स्थिति रही, लेकिन मौजूदा हालात जो बन रहे हैं, उनमें इस बार चीन दोस्त की भूमिका में है। पिछली बार चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग जब भारत आए थे, उस दौर में कई क्षेत्रों में समझौते किए गए थे। इस बार भारत की भी स्थिति ऐसी है कि उसे कोई ‘सौदागर’ नहीं ‘दोस्त’ ही चाहिए। कई देशों में युद्ध और तनाव के बीच भारत को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से काफी उम्मीदें हैं। रक्षा विशेषज्ञ कमोडोर (रिटायर्ड) रंजीत राय कहते हैं कि रूस-यूक्रेन युद्ध चौथे साल में है और पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल संघर्ष गहरा रहा है।
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बीजिंग और नई दिल्ली के बीच बैठक की तैयारी
इन हालातों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर कई कई देशों के अध्यक्षों के साथ बैठक कर रहे हैं। उम्मीद है कि समिट के दौरान शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक भी होगी। भारत में चीन के राजदूत शू फीहोंग ने भी संकेत दिए हैं कि बीजिंग और नई दिल्ली के बीच द्विपक्षीय बैठक की तैयारी कर रहे हैं। उनकी ओर से उम्मीद जता दी गई है कि चीन भारत के साथ मिलकर काम करेगा।
दूसरी ओर चीन के विदेश मंत्रालय ने भी गुरुवार को शी के शामिल होने की घोषणा की थी। 2020 में भारत और चीन की घातक गलवान झड़पों के इतने सालों बाद अपने द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर करने के प्रयास कर रहे हैं। बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और शी के बीच कोई बातचीत नहीं हुई थी। यद्यपि उनकी मुलाकात पर दुनियाभर की मीडिया की नजर बनी थी।
कजान में भी उनकी मुलाकात मोदी से हुई थी, पर सार्थक नहीं। चीनी राजदूत की ओर से साफ कर दिया गया है कि चीन, भारत के साथ अच्छे पड़ोसी, अच्छे दोस्त की तरह मिलकर काम करेगा। उन्होंने कहा है कि दोनों नेताओं के रणनीतिक मार्गदर्शन पर अमल किया जाएगा। इसमें दीर्घकालिक नजरिया और द्विपक्षीय संबंधों को संभालना शमिल है। चीन मतभेदों को सही ढंग से सुलझाएगा।
मोदी के दुनिया के नेताओं से मित्रतापूर्ण संबंध
रक्षा विशेषज्ञ कमोडोर रंजीत राय ने कहा कि ब्रिक्स सम्मेलन का महत्व काफी बढ़ गया है। कई देश युद्ध कर रहे हैं। ऐसे नाजुक समय में यह बैठक बेहद अहम हो जाती है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जैसे निर्विवाद नेता के दुनिया के तमाम बड़े नेताओं से मित्रतापूर्ण संबंध हैं। उन्होंने बताया कि व्यापार सम्मेलन भी चल रहा है। यह ब्रिक्स से जोड़कर देखा जा रहा है। 11 देशों वाला ब्रिक्स समूह अर्थव्यवस्था पर ही जोर दे रहा है।
यही वजह है कि अर्थ व्यवस्था को लेकर ब्रिक्स देश अब संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में अपनी बड़ी भूमिका और हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं। भारत कई सालों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनी अर्थ व्यवस्था सुधारने में लगा हुआ है। ग्लोबल साउथ भारत मंडपम में यही प्रयास हैं। इसीलिए पश्चिम और यूरोप की नजरें भी इस सम्मेलन पर टिकी हैं। उम्मीद है कि इस बार सम्मेलन के अंत में एक ठोस और सुनने लायक संयुक्त बयान सामने आएगा।
प्रधानमंत्री हमेशा वसुधैव कुटुंबकम की बात करते
यद्यपि अभी प्रधानमंत्री मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मुलाकात और समझौते पर नजर कम, लेकिन इससे अमेरिका और पश्चिमी देशों को संदेश पर सबका ध्यान ज्यादा है। कारण है कि इस सम्मेलन में उसकी भागीदारी नहीं है। यहां ईरान है और रूस है। यह दोनों देश तेल का सौदा करते हैं। चीन और भारत इनसे खरीददारी करते हैं। अमेरिका की धमकी टैरिफ को लेकर दोनों को दी जा चुकी है। ऐसे में यह बैठक खास तो है ही। भले ही प्रधानमंत्री हमेशा वसुधैव कुटुंबकम की बात करते हैं, लेकिन भारत जब आत्मनिर्भर बन रहा है, ऐसे में भारत को भी अच्छे दोस्त की जरूरत है।
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