रूस-यूक्रेन युद्ध में आजमगढ़ और मऊ के चार भारतीयों की मौत, शव नहीं मिले तो वर्दी-टोपी को मानकर किया अंतिम संस्कार

खबर सार :-

रुस-यूक्रेन युद्ध में आजमगढ़ और मऊ के चार युवकों की मौत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। बलिदानियों के परिवार वालों को उनके शव तक नहीं सौंपे गए। परिवार द्वारा उनकी वर्दी और टोपी को अंतिम निशानी मानकर अंतिम संस्कार किया।
रूस-यूक्रेन युद्ध में आजमगढ़ और मऊ के चार भारतीयों की मौत, शव नहीं मिले तो वर्दी-टोपी को मानकर किया अंतिम संस्कार

खबर विस्तार : -

Russia Ukraine War: रुस-यूक्रेन युद्ध में आजमगढ़ और मऊ के चार भारतीय युवकों की मौत से हड़कंप मच गया है। बताया जा रहा है कि नौकरी के नाम पर उन्हें रुस ले जाया गया, जहां उन्हें युद्ध में भर्ती कर दिया गया। चारों के परिवार वालों को उनके शव भी नहीं दिए गए। उन्होंने बलिदानियों की सैन्य वर्दी, टोपी और प्रमाणपत्र को ही अंतिम निशानी मानकर रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया। बताया जा रहा है कि आजमगढ़ नौ और मऊ से अब तक चार युवकों को रुस भेजा जा चुका है, जिसमें 11 लोगों की मौत हो चुकी है। 

रुस-यूक्रेन युद्ध में आजमगढ़  और मऊ के चार भारतीयों की मौत

रुस-यूक्रेन युद्ध में आजमगढ़  और मऊ के चार भारतीयों की मौत हो गई। हैरानी की बात है कि मृतकों के परिवार वालों को उनके शव भी नहीं सौंपे गए। परिवारजनों का कहना है कि उनके जवान बेटों को छीनने के बाद उनके अंतिम विदाई का अधिकार भी नहीं मिला। बलिदानियों के शव न मिलने पर, रुस द्वारा आई उनकी सेना की वर्दी, टोपी, बैज, ध्वज और मृत्यु प्रमाणपत्र को ही अपने बेटों की अंतिम निशानी मानकर पूरे रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार करना पड़ा। इस घटना से पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई है। यह दृश्य देखकर हर किसी की आंखें नम हो गई। मिली जानकारी के अनुसार आजमगढ़ के रहने वाले योगेंद्र यादव, धीरेंद्र कुमार, अरविंद कुमार और मऊ के विनोद यादव ने विदेश में नौकरी देने के नाम पर दिल्ली के एजेंट सुमित से मिलवाया था। बताया जा रहा है कि आजमगढ़ से नौ और मऊ से अब तक चार युवकों को रुस भेजा जा चुका है, जिसमें 11 लोगों की मौत हो चुकी है। 

नौकरी का झांसा देकर चारों को रुस भेजा गया

परिजनों ने बताया कि प्लंबर और सुरक्षा गार्ड की नौकरी का झांसा देकर चारों को जनवरी 2024 में ही रुस भेजा गया, लेकिन वहां जाने के बाद उन्हें रुसी सेना में भर्ती कर दिया गया और जबरन यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में उतार दिया गया। युद्ध के दौरान योगेंद्र और विनोद की यूक्रेन के जापोरिजिया में मौत हो गई, जबकि अरविंद और धीरेंद्र की लुहान्स्क में मौत हो गई। इस दुखद कहानी के बीच जालंधर के जगदीप कुमार उम्मीद की किरण बनकर उभरे। उनका भाई भी रोजगार के लिए रुस गया था और युद्ध में मारा गया था। काफी कोशिश के बाद जनवरी 2026 में वो अपने भाई का शव भारत वापस लाने में सफल रहे। इसी दौरान मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास ने उन्हें जानकारी दी कि आजमगढ़ और मऊ के चार युवकों की मौत हो गई है। 

परिवार ने वर्दी और ध्वज को निशानी मानकर किया अंतिम संस्कार

दूतावास ने शव उपलब्ध न होने पर उन्हें चारों की वर्दी, टोपी, बैज, रुसी ध्वज और मृत्यु प्रमाण पत्र सौंप दिए। जगदीप चारों के अंतिम निशानियों को लेकर शुक्रवार को आजमगढ़ पहुंचे और कलेक्ट्रेट से जानकारी लेकर उनके परिवारों तक पहुंचे। योगेंद्र के परिवार ने शुक्रवार को और धीरेंद्र, अरविंद और विनोद के परिवार ने शनिवार को वर्दी और ध्वज को निशानी मानकर अंतिम संस्कार किया। योगेंद्र के छोटे भाई आशीष ने कहा कि 15 जनवरी 2024 को उनके भाई रुस गए थे। इसके बाद मई 2024 में ही उनसे फोन पर आखिरी बात हुई थी। इसके बाद जब फोन आया तो बताया गया कि युद्ध में विस्फोट के दौरान उनका पूरा शरीर नष्ट हो गया, इसलिए शव नहीं मिल सका। परिवार वालों ने नौकरी का झांसा देकर युवकों को युद्ध में भेजने वाले एजेंटों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी।  

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