'शहीद दिवस' पर सियासी संग्राम: मंत्री दिलीप घोष का पूर्व की ममता सरकार पर तीखा हमला, बोले–‘शहीदों और जनता दोनों के साथ किया विश्वासघात’

खबर सार :-

पश्चिम बंगाल की राजनीति फिलहाल तीखे राजनीतिक संघर्ष, आरोप-प्रत्यारोप और जनसमर्थन की प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रही है। शहीद दिवस पर दिलीप घोष के आरोपों ने राज्य की राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। आने वाले समय में सरकार की नीतियां, विपक्ष के आरोप और जनता की प्रतिक्रिया ही राज्य की राजनीतिक दिशा और चुनावी माहौल को तय करेंगे।
'शहीद दिवस' पर सियासी संग्राम: मंत्री दिलीप घोष का पूर्व की ममता सरकार पर तीखा हमला, बोले–‘शहीदों और जनता दोनों के साथ किया विश्वासघात’

खबर विस्तार : -

West Bengal Politics : पश्चिम बंगाल में 21 जुलाई यानी आज शहीद दिवस के अवसर पर एक बार फिर राजनीतिक माहौल गरमा गया। राज्य की भाजपा सरकार के मंत्री दिलीप घोष ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि शहीद दिवस जैसे भावनात्मक अवसर को राजनीतिक प्रदर्शन का मंच बना दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह दिन शहीदों को श्रद्धांजलि देने का है, न कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन या विरोध प्रदर्शन का। घोष ने सवाल उठाया कि जब आधिकारिक कार्यक्रम 21 जुलाई को आयोजित होना था, तब टीएमसी नेताओं को एक रात पहले से धरने पर बैठने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

सड़क से लेकर विधानसभा तक तीखी बयानबाजी

दरअसल, पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीति पिछले कुछ वर्षों से लगातार आरोप-प्रत्यारोप, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सड़क से लेकर विधानसभा तक तीखी बयानबाजी का केंद्र बनी हुई है। राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के विकास को अपनी उपलब्धि बताती है। वहीं विपक्ष लगातार कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा, सरकारी संस्थाओं की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर सरकार पर सवाल उठाता रहा है। यही राजनीतिक टकराव शहीद दिवस के अवसर पर भी खुलकर सामने आया।

पत्रकारों से बातचीत में मंत्री दिलीप घोष ने दावा किया कि शहीद दिवस पर आयोजित टीएमसी के कार्यक्रम में जनता का अपेक्षित समर्थन दिखाई नहीं दिया। उन्होंने कहा कि अब जनता टीएमसी के दावों पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं कर रही है। उनके अनुसार, ‘दिन हो या रात, अब आपके साथ कोई नहीं आएगा। आपने शहीदों के साथ धोखा किया, उनके परिवारों के साथ अन्याय किया और अब जनता का विश्वास भी खो दिया है।’

टीएमसी  के भीतर चल  रहा मतभेद हुआ सार्वजनिक

राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए घोष ने कहा कि टीएमसी के भीतर भी मतभेद अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शहीद दिवस के अवसर पर अलग-अलग गुटों द्वारा अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किया जाना इस बात का संकेत है कि पार्टी के भीतर एकजुटता पहले जैसी नहीं रही। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि ‘अब किसी में पहले जैसा राजनीतिक वोल्टेज नहीं बचा है।’ पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी लंबे समय से प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही है। राज्य सरकार लगातार विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं, किसानों, महिलाओं, छात्रों और गरीब परिवारों के लिए कई योजनाओं के जरिए अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने का प्रयास करती रही है। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि इन योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी है और कई मामलों में भ्रष्टाचार के आरोप सामने आते रहे हैं। राज्य में पंचायत चुनाव, शिक्षक भर्ती विवाद और विभिन्न जांच एजेंसियों की कार्रवाई जैसे मुद्दों ने भी राजनीतिक वातावरण को लगातार गर्म बनाए रखा है।

पूर्व की ममता सरकार में स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्थाओं को लेकर साधा निशाना

दिलीप घोष ने स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भी पूर्व की टीएमसी सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के सरकारी अस्पतालों की स्थिति लंबे समय तक चिंताजनक रही है और आम नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण इलाज के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता के शीर्ष नेता स्वयं सरकारी अस्पतालों में जाकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण तक नहीं करते थे, जबकि आम लोगों को उन्हीं व्यवस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। हालांकि,  राज्य में सत्ता परिवर्तन होने के बाद से सुवेंदु सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, नए अस्पतालों और चिकित्सा सुविधाओं में सुधार की दिशा में लगातार काम करने के दावे कर रही है।

शहीदों के परिजनों को मिलने वाले मुआवजे में खेल

शहीदों के परिवारों को मिलने वाले मुआवजे का मुद्दा भी घोष ने प्रमुखता से उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि अदालत द्वारा निर्धारित 25 लाख रुपये के मुआवजे के बजाय पूर्व की टीएमसी सरकार के दौरान केवल 2 लाख रुपये का भुगतान किया गया और शेष राशि नहीं दी गई। उनके अनुसार यह शहीद परिवारों के साथ अन्याय था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 21 जुलाई की घटना से जुड़े कई लोगों को बाद में राजनीतिक पद और जिम्मेदारियां मिलीं, जबकि शहीदों के परिजनों की उपेक्षा होती रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में इस तरह के बयान और आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो सकते हैं। ऐसे में शहीद दिवस जैसे ऐतिहासिक अवसर भी अब केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहकर राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच बनते जा रहे हैं।

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