व्यंग्य : कैमरा को केसरिया रंग है बेहद पसंद!
खबर सार :-
लोकसभा और राज्यसभा में कार्यवाही का सजीव चित्रण कर पाना केवल कैमरे के बस की बात है। किंतु यह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला वाले न हों।
खबर विस्तार : -
लखनऊ, लोकसभा और राज्यसभा में कार्यवाही का सजीव चित्रण कर पाना केवल कैमरे के बस की बात है। किंतु यह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला वाले न हों। इन पर उनका अधिकार भी न हो, अन्यथा वह गडबडी कर सकते हैं। उनमें विशेष मौके पर तकनीकी खराबी आ सकती है। यह कैमरे एकतरफा दृष्यांकन करते हैं। इनको केसरिया रंग बेहद पसंद है। इसलिए इनका जूम उधर से ही झूमता है। बीते सालों लोकसभा में विपक्ष के नेता भाषण देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गले मिल रहे थे।
वह कुछ पल ही उनके पास रूके, फिर भी यहां का चालू कैमरा चमचागीरी कर गया। एक आॅख का लुक अपनी मर्जी से तो दूसरी का केसरिया रंग वालों के कहने पर बदल दिया। अब भला इन पर भरोसा हो तो क्यों? तब से अब तक विपक्ष कह भी रहा है कि सरकार को ही संसद के कैमरे हाईलाइट करते हैं। बुद्धिजीवी लोगों में कभी-कभी मीडियावालों की भी गिनती कर ली जाती है। संसद के बाहर हाईलाइट होने का नुस्खा शायद इनका ही रहा है। अब अलग-अलग रंग पसंद करने वाले कैमरे लपझप-लपझप कर रहे हैं। इनके आने और इनको नियंत्रित कर पाने वाले मिल जाने से दलों के नेताओं के खूबसूरत चित्र-चलचित्र मीडिया में छाए हुए हैं। कई क्रांतिकारी नेता तो कैमरा चलाने वाले को मुंहमांगी रकम दे रहे हैं। जबकि कुछ ऐसे भी पोज चाहने वाले हैं कि बस आंखें खुली हो या हों बंद, सडक का प्रदर्शन संसद तक छा जाए। ऐसे ही कैमरे बीते दिन दिनभर चमकते रहे। अब उन दृष्यों की ओर गौर करें।
सवालों में राम, फिर क्यों कोहराम!
संसद में हंगामा हो रहा है। जो बोल रहा है, वह भी हंगामा कर रहा है। यह लोग करीब एक दषक से हंगामे का स्वाद ले रहे हैं। राजनीति की पुस्तक इन्होंने भले ही नहीं पढी, किंतु पार्टी के स्लेबस में पहला लेसन हंगामा ही है। सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि संसद नियमों के तहत चलेगी। विपक्ष कह रहा है कि पहले हमारे प्रश्नों का उत्तर दो। लोकसभा अध्यक्ष भी कह रहे हैं कि संसद संविधान के अनुसार ही चलेगी। बस इतनी सी बात पर तलवारें खिंची हुई हैं।
संसद से लेकर सड़क तक कोहराम मचा हुआ है। आखिर सदन में जिन सांसदों को अपनी बात रखनी है, वह निर्धारित अवधि में भी कह सकते हैं। कुछ घंटे पहले कह लेने मात्र से वह हाईलाइट नहीं हो जाएंगे। मगर, कुछ लोकतंत्र बचाने वाले हैं, जिनको कीचड में छलांग लगाने का अभ्यास है। ओम बिरला वाले कैमरे इनको ही हाईलाइट नहीं कर रहे हैं। अब राम नाम का स्वाद इनको भी लेना है। इसीलिए चंदा चोर का खुद ही भंडाफाड करना चाह रहे हैं।
कुर्ता फाड दंगे
संसदीय कार्य मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक कह रहे हैं कि आरोपियों पर कार्रवाई हो रही है आगे भी होगी। सदन में विपक्ष के नेता जो सवाल करेंगे, उनके उत्तर दिए जाएंगे, उनकी बात सुनी जाएगी। पर पहले कभी किसी परीक्षा में नकल नहीं हुई है? इसका विरोध भी होना चाहिए। पर सदन में यह सवाल उठाए जाएं तो प्रशंसा होगी। पर वह कैमरावाले हाईलाइटर दम भी नहीं लेने देते। जिनके हाथों ने मिट़़टी भी न देखी हो, उनसे सड़क पर कुर्ताफाड़ प्रदर्शन करवा रहे हैं। विपक्ष के नेता भी उत्तर प्रदेश की अयोध्या में बनाए गए भव्य राम मंदिर में चंदा चोरी मामले पर तमाम सवाल करना चाह रहे हैं। उनके मन में भी राम बसे है?
कसूर है तो दिल्ली पुलिस का !
भला इतनी महंगाई नहीं है। दिल्ली पुलिस के पास फूल.मालाएं खरीदने के लिए पैसा नहीं है। वह प्रदर्शनकारियों को फूल.मालाएं देकर हाथ जोड़कर उन्हें घर वापसी के लिए कहते तो वह चले भी जात! तमाम अवसर ऐसे भी आते हैं, जब पुलिस वाले चैराहों पर खड़े होकर गुलाब के फूल और हेलमेट भेंट कर यात्रियों की सुरक्षा की दुहाई देते हैं। तभी तो दिल्ली में सब के सब बाइक वाले हेलमेट लगाने लगे हैं। आखिर कनॉट प्लेस और जंतर मंतर जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर दिल्ली पुलिस को कम से कम 2-4 कुंतल फूल लेकर पहुंच जाना चाहिए था।
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