मधुमेह का ‘डबल अटैक’: केजीएमयू शोध में बड़ा खुलासा, एमडीआर टीबी मरीजों में मौत का खतरा बढ़ा

खबर सार :-

केजीएमयू के शोध से स्पष्ट हुआ है कि मधुमेह एमडीआर टीबी मरीजों के इलाज को जटिल बना सकता है। डायबिटीज और प्री-डायबिटीज मरीजों में टीबी संक्रमण खत्म होने में अधिक समय लगता है और गंभीर परिणामों का खतरा बढ़ता है। इसलिए एमडीआर टीबी मरीजों की नियमित मधुमेह जांच, बेहतर निगरानी और दोनों बीमारियों का संयुक्त इलाज बेहद जरूरी है।
मधुमेह का ‘डबल अटैक’: केजीएमयू शोध में बड़ा खुलासा, एमडीआर टीबी मरीजों में मौत का खतरा बढ़ा

खबर विस्तार : -

Diabetes Awareness: बहु दवा प्रतिरोधी (एमडीआर) टीबी से जूझ रहे मरीजों के लिए मधुमेह एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के एक शोध में पता चला है कि टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित एमडीआर टीबी मरीजों में दवाओं का असर धीमा होता है। इसके कारण संक्रमण खत्म होने में अधिक समय लगता है और इलाज लंबा चलने से मृत्यु का जोखिम भी बढ़ जाता है। यह अध्ययन वर्ल्ड जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल मेडिसिन (डब्ल्यूजेईएम) में प्रकाशित हुआ है।

केजीएमयू शोध में 264 एमडीआर टीबी मरीज हुए शामिल

केजीएमयू के श्वसन रोग विभाग की ओर से वर्ष 2023 से 2024 के बीच किए गए अध्ययन में 264 एमडीआर टीबी मरीजों को शामिल किया गया। इनमें 155 पुरुष और 109 महिलाएं थीं। शोध में शामिल मरीजों को उनकी मधुमेह स्थिति के आधार पर तीन समूहों में बांटा गया। पहले समूह में 61 टाइप-2 मधुमेह मरीज, दूसरे समूह में 66 प्री-डायबिटीज मरीज और तीसरे समूह में 137 ऐसे मरीज शामिल थे, जिन्हें मधुमेह नहीं था। सभी मरीजों को मुंह से लेने वाली टीबी की दवाएं दी गईं। इलाज के दौरान बलगम जांच, संक्रमण की स्थिति और स्वास्थ्य सुधार की लगातार निगरानी की गई।

डायबिटीज मरीजों में ज्यादा गंभीर संक्रमण

शोध में सामने आया कि मधुमेह से पीड़ित एमडीआर टीबी मरीजों के फेफड़ों में संक्रमण की गंभीरता अधिक थी। इनके शरीर में टीबी के जीवाणुओं की संख्या भी ज्यादा पाई गई। जांच में जीवाणुओं के उन जीन में बदलाव मिले, जो दवाओं के प्रति प्रतिरोध बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि मधुमेह मरीजों में टीबी की दवाओं का असर धीमा होने के कारण संक्रमण नियंत्रित होने में ज्यादा समय लगा। इससे इलाज की अवधि बढ़ी और गंभीर जटिलताओं का खतरा भी बढ़ गया।

बलगम जांच निगेटिव होने में लगे ज्यादा दिन

अध्ययन के अनुसार, मधुमेह वाले एमडीआर टीबी मरीजों की बलगम जांच रिपोर्ट सामान्य होने में औसतन 133 दिन लगे। वहीं प्री-डायबिटीज मरीजों में यह समय 113 दिन और मधुमेह रहित मरीजों में केवल 97 दिन रहा। इससे स्पष्ट हुआ कि केवल मधुमेह ही नहीं, बल्कि प्री-डायबिटीज की स्थिति भी एमडीआर टीबी के इलाज को प्रभावित कर सकती है। ऐसे मरीजों में संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त निगरानी की जरूरत होती है।

एमडीआर टीबी मरीजों की मधुमेह जांच जरूरी

केजीएमयू के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के संस्थापक प्रभारी प्रो. सूर्यकांत ने बताया कि भारत में टीबी और मधुमेह दोनों तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याएं हैं। एमडीआर टीबी मरीजों में मधुमेह एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक बन सकता है। उन्होंने कहा कि एमडीआर टीबी से पीड़ित प्रत्येक मरीज की मधुमेह और प्री-डायबिटीज जांच जरूरी है। दोनों बीमारियों का एक साथ इलाज और नियमित निगरानी करने से मरीजों के बेहतर स्वास्थ्य परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

टीबी उन्मूलन अभियान को मिलेगी मजबूती

केजीएमयू श्वसन रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ज्योति बाजपेयी के अनुसार, भारत में टीबी और मधुमेह के मरीजों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है। मधुमेह को नियंत्रित रखना एमडीआर टीबी मरीजों के इलाज की सफलता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने बताया कि समय पर मधुमेह की पहचान और बेहतर नियंत्रण से मरीजों के ठीक होने की संभावना बढ़ेगी। इससे देश के राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन अभियान को भी मजबूती मिलेगी।

क्या है एमडीआर टीबी?

एमडीआर टीबी यानी मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस ऐसी टीबी है, जिसमें बीमारी फैलाने वाले जीवाणु सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाली प्रमुख टीबी दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं। इस कारण इलाज कठिन हो जाता है और मरीज को लंबे समय तक दवाएं लेनी पड़ती हैं।

एमडीआर टीबी के प्रमुख कारण

  • टीबी का अधूरा इलाज छोड़ देना
  • दवाओं का अनियमित या गलत सेवन
  • एमडीआर टीबी मरीज से संक्रमण फैलना
  • टीबी जीवाणुओं में आनुवंशिक बदलाव (म्यूटेशन)
  • शरीर की कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता

एमडीआर टीबी की प्रमुख जांचें

एमडीआर टीबी की पहचान के लिए सीबी-नैट, जीन एक्सपर्ट, ट्रूनेट, एलपीए और बीडी मैक्स जैसी जांचों का इस्तेमाल किया जाता है। इन जांचों से टीबी जीवाणु की मौजूदगी और दवा प्रतिरोध की स्थिति का पता लगाया जाता है।

FAQ ...

1-एमडीआर टीबी मरीजों में मधुमेह से खतरा क्यों बढ़ जाता है?

मधुमेह से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है। इससे टीबी संक्रमण ज्यादा गंभीर हो सकता है और टीबी की दवाओं का असर धीमा पड़ सकता है। नतीजतन संक्रमण खत्म होने में अधिक समय लगता है और जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।

2-केजीएमयू के शोध में क्या पाया गया?

केजीएमयू के अध्ययन में 264 एमडीआर टीबी मरीजों को शामिल किया गया। शोध में पाया गया कि मधुमेह वाले मरीजों की बलगम जांच रिपोर्ट सामान्य होने में सबसे अधिक समय लगा। इससे पता चला कि मधुमेह एमडीआर टीबी के इलाज को प्रभावित करता है।

3- एमडीआर टीबी की पहचान कैसे की जाती है?

एमडीआर टीबी की पहचान के लिए सीबी-नैट, जीन एक्सपर्ट, ट्रूनेट, एलपीए और बीडी मैक्स जैसी जांचें की जाती हैं। इन जांचों से टीबी संक्रमण और दवाओं के प्रति जीवाणुओं के प्रतिरोध का पता लगाया जाता है।

4- एमडीआर टीबी मरीजों के लिए मधुमेह जांच क्यों जरूरी है?

एमडीआर टीबी मरीजों में मधुमेह की पहचान समय पर होने से दोनों बीमारियों का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है। मधुमेह को नियंत्रित रखने और नियमित निगरानी से इलाज के परिणाम बेहतर हो सकते हैं और गंभीर जोखिम कम किए जा सकते हैं।

ये भी पढ़ें....केरल में टीबी मुक्त अभियान को मिल रहा जन-जन का समर्थन

अन्य प्रमुख खबरें