कूचबिहार के शाही दौर की प्राचीन पांडुलिपियों पर संकट, संरक्षण की कमी से मिटने की कगार पर मंत्र व पूजा विधियां

खबर सार :-

कूचबिहार की शाही दौर की प्राचीन पांडुलिपियां संरक्षण के अभाव में मिटने की कगार पर हैं। इनमें दर्ज मंत्रों और रीति-रिवाजों को देखकर आज भी मदनमोहन और बारा देवी की पूजा की जाती है।
कूचबिहार की प्राचीन पांडुलिपियां संरक्षण के अभाव में मिटने की कगार पर

खबर विस्तार : -

कूचबिहार: कूचबिहार में शाही दौर की धार्मिक परंपराओं की अहम धरोहर मानी जाने वाली ताड़ के पत्तों की दो दुर्लभ पांडुलिपियां, सही देखभाल न होने के कारण नष्ट होने की कगार पर हैं। सदियों से मदनमोहन और बारादेवी की पूजा इन्हीं पांडुलिपियों में दर्ज मंत्रों और रीति-रिवाजों के आधार पर की जाती रही है। इसलिए, अगर इनके पन्ने पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं, तो इन प्राचीन पूजा पद्धतियों को मूल धार्मिक तरीकों के अनुसार समझना और जारी रखना मुश्किल हो जाएगा।

कूचबिहार देबोत्तर ट्रस्ट बोर्ड की देखरेख में रखी गई ये पांडुलिपियां शाही परंपराओं से जुड़ी अहम धरोहर मानी जाती हैं। कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, ये 300 से 500 साल पुरानी हो सकती हैं। प्राचीन काल से मदनमोहनबाड़ी में की जाने वाली तांत्रिक पूजा पद्धतियों से इनका संबंध बहुत अहम माना जाता है; कहा जाता है कि पूजा का यह तरीका आम वैष्णव परंपराओं से अलग है।

दुर्लभ मंत्रों की कोई दूसरी प्रति नहीं

इन पांडुलिपियों की सबसे अहम बात यह है कि ताड़ के पत्तों पर लिखे दुर्लभ मंत्रों की कोई दूसरी प्रति मौजूद नहीं है। इसलिए, इनके नष्ट होने का मतलब सिर्फ एक प्राचीन दस्तावेज का खोना नहीं, बल्कि इन मंत्रों और रीति-रिवाजों के मूल स्रोत का भी खत्म हो जाना होगा। अगर ये पत्ते पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं, तो भविष्य में इन मंत्रों और रीति-रिवाजों को उनके असली रूप में समझना या तय धार्मिक तरीकों से पूजा करना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

प्राचीन लिपि और कलात्मक कवर

हालांकि ये पांडुलिपियां संस्कृत में लिखी गई हैं, लेकिन इनमें इस्तेमाल की गई लिपि पारंपरिक देवनागरी से अलग है; इनके अक्षर प्राचीन बंगाल और कामरूपी शैलियों को दर्शाते हैं। इससे न केवल धार्मिक नजरिए से, बल्कि ऐतिहासिक और भाषाई नजरिए से भी इनका महत्व बढ़ जाता है। इनमें से एक पांडुलिपि की लंबाई लगभग 18 इंच और चौड़ाई छह इंच है। इसे मजबूत लकड़ी के कवर के बीच रखा गया है। इन कवर पर कभी रंग-बिरंगी फूलों की नक्काशी हुआ करती थी, हालांकि समय के साथ उनकी चमक फीकी पड़ गई है। कवर के एक तरफ देवी दुर्गा की तस्वीर है जो 'बारा देवी' के रूप जैसी दिखती है, जबकि दूसरी तरफ पुरुष योद्धाओं और दो महिला योद्धाओं के बीच युद्ध का दृश्य दिखाया गया है। इसलिए, इस पांडुलिपि को उस दौर की कला और सांस्कृतिक परंपराओं का अहम सबूत माना जाता है। 

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खास मौकों पर ही बाहर निकाली जाती हैं पांडुलिपियां 

इन पांडुलिपियों का इस्तेमाल रोजाना की पूजा में नहीं होता है। एक पांडुलिपि को स्नान यात्रा और उत्थान एकादशी जैसे खास धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान गर्भगृह से बाहर निकाला जाता है। दूसरी पांडुलिपि को सिर्फ़ बारा देवी की शरदीय पूजा के समय ही बाहर लाया जाता है। साल के बाकी समय में, इन्हें मदनमोहन के गर्भगृह में लाल कपड़े में लपेटकर सुरक्षित रखा जाता है। पांडुलिपियों को संरक्षित करने की जरूरत को समझते हुए, 2022 में प्रशासनिक स्तर पर एक पहल शुरू की गई थी। हालांकि, खबर है कि यह मामला सिर्फ सरकारी फाइलों तक ही सीमित रह गया। अब इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण में हो रही देरी पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वैज्ञानिक संरक्षण के उपायों के अभाव में ताड़ के पत्तों और उन पर लिखी स्याही को और नुकसान पहुंचने का खतरा बना हुआ है।

300 से 500 साल पुराने होने का अनुमान

इतिहासकार स्वप्नकुमार रॉय के अनुसार, इसमें कोई शक नहीं कि ये पांडुलिपियां कई सदियों पुरानी हैं। उनका कहना है कि महाराजा शिवेंद्रनारायण के शासनकाल में बारादेवी की पूजा-पद्धति में कुछ बदलाव किए गए थे; हो सकता है कि उस दौरान ही यह पांडुलिपि दोबारा लिखी गई हो। इसके आधार पर, अनुमान है कि इनमें से एक पांडुलिपि कम से कम 300 साल पुरानी है। उनका मानना ​​है कि मदनमोहन से जुड़ी पांडुलिपि और भी पुरानी हो सकती है। हालांकि, इनकी सही उम्र का पता लगाने के लिए विशेषज्ञों की मदद से ताड़ के पत्तों और इस्तेमाल की गई स्याही की कार्बन डेटिंग की जरूरत होगी। इससे पांडुलिपियों के सही समय का पता लगाने में मदद मिलेगी।

प्रशासन वैज्ञानिक संरक्षण का काम करेगा

कूचबिहार के जिला मजिस्ट्रेट जितिन यादव ने कहा कि उन्हें पहले इस मामले की जानकारी नहीं थी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि शाही दौर की इन ऐतिहासिक पांडुलिपियों को किसी भी तरह के नुकसान से बचाने के लिए जल्द से जल्द डिजिटाइजेशन और वैज्ञानिक संरक्षण की व्यवस्था की जाएगी।

पांडुलिपियों से जुड़ा इतिहास

ताड़ के पत्तों पर लिखी इन दो पांडुलिपियों का महत्व सिर्फ धार्मिक रीति-रिवाजों तक ही सीमित नहीं है। ये कूचबिहार के शाही परिवार की सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं, प्राचीन लिपियों, कला, साहित्य और पूजा-पद्धतियों से जुड़ी हैं। पांडुलिपियों में लिखी बातें और उनके कलात्मक कवर उस दौर के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की झलक भी दिखाते हैं। इसलिए, इनके संरक्षण का मुद्दा सिर्फ दो पुराने दस्तावेजों को बचाने का नहीं है, बल्कि इनसे जुड़ी पूरी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का है। अगर समय रहते इनका वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण नहीं किया गया, तो ताड़ के पत्तों के साथ-साथ इतिहास के कई अनमोल पन्ने हमेशा के लिए खो सकते हैं।

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