Did You Know : डॉक्टर से सीरियल किलर और कुख्यात अपराधी बनने की दास्तान
खबर सार :-
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जन्मे और बी.ए.एम.एस. की डिग्री लेने वाले देवेंद्र शर्मा ने बिजनेस में घाटा होने के बाद अपराध की दुनिया में कदम रखा। गैरकानूनी किडनी ट्रांसप्लांट और दर्जनों हत्याओं को अंजाम देने के बाद उसे 'डॉक्टर डेथ' नाम दिया गया।
खबर विस्तार : -
लखनऊ : उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में 1958 में जन्मे देवेंद्र शर्मा ने वर्ष 1984 में पटना से बैचलर ऑफ आयुर्वेद, मेडिसिन एंड सर्जरी यानी बी.ए.एम.एस. की डिग्री हासिल की थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने राजस्थान के बांदीकुई में जनता क्लिनिक के नाम से अपना चिकित्सा केंद्र शुरू किया और कुछ वर्षों तक उसका जीवन सामान्य रूप से चलता रहा। वर्ष 1994 में कारोबार को विस्तारित करने के उद्देश्य से उसने गैस डीलरशिप योजना में अपनी सारी जमापूंजी यानी ग्यारह लाख रुपये निवेश कर दिए। यह योजना धोखाधड़ी साबित हुई और उसकी पूरी पूंजी डूब गई, जिसके बाद वह आर्थिक संकट से उबरने के लिए वापस अलीगढ़ लौट आया।
अलीगढ़ लौटने के बाद उसने एक अवैध गैस एजेंसी शुरू की और अधिक आय अर्जित करने के लिए डॉक्टर अमित के साथ मिलकर गैरकानूनी किडनी प्रत्यारोपण का काला कारोबार शुरू कर दिया। इस अवैध ट्रांसप्लांट के बदले उसे प्रति ऑपरेशन पांच से सात लाख रुपये तक मिलते थे, जिससे उसका आपराधिक दायरा लगातार बढ़ता चला गया।
अपराध का खौफनाक तरीका और मगरमच्छों का इस्तेमाल
शुरुआत में देवेंद्र और उसके सहयोगी अलीगढ़ के सुनसान रास्तों पर रात के वक्त एलपीजी सिलेंडर से भरे ट्रकों को रोकते थे और चालकों की हत्या कर देते थे। चालकों के शवों को ठिकाने लगाने के लिए उसने कासगंज स्थित हजारा नहर को चुना, जिसमें मौजूद मगरमच्छ शवों को खा जाते थे ताकि कोई साक्ष्य पीछे न बचे। अपराध के इस तरीके से ट्रक गायब होने की खबरें फैलने लगीं, जिसके बाद उसने अपनी रणनीति बदली और दिल्ली या जयपुर से कासगंज के लिए टैक्सी बुक करना शुरू कर दिया। वह सुनसान जगह पर टैक्सी चालकों को मौत के घाट उतारकर उनकी गाड़ियों को ब्लैक मार्केट में बीस से पच्चीस हजार रुपये में बेच देता था।
पहली गिरफ्तारी और 'डॉक्टर डेथ' नाम मिलने की कहानी
यह सिलसिला वर्ष 2004 तक अनवरत चलता रहा जब तक उसे हरियाणा के गुरुग्राम से किडनी रैकेट और हत्याओं के मामले में गिरफ्तार नहीं किया गया। पुलिस पूछताछ के दौरान उसने स्वीकार किया कि वह 1994 से 2004 के बीच एक सौ पच्चीस से अधिक अवैध किडनी ट्रांसप्लांट कर चुका था और पचास के करीब हत्याएं करने की बात उसे याद थी, जिसके बाद उसे 'डॉक्टर डेथ' उपनाम दिया गया।
उम्रकैद और पेरोल का दुरुपयोग कर लगातार फरार रहना
वर्ष 2004 में जयपुर और फरीदाबाद की अदालतों ने उसे गैरकानूनी किडनी प्रत्यारोपण और इक्कीस हत्याओं के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई और उसे जयपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। इसके अलावा, गुरुग्राम अदालत ने 2007 में एक टैक्सी चालक नरेश वर्मा की हत्या के मामले में उसे मौत की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया। सोलह वर्ष जेल में बिताने के बाद जनवरी 2020 में उसे बीस दिन के पेरोल पर रिहा किया गया, जिसके बाद वह जेल नहीं लौटा और दिल्ली में दूसरी शादी कर प्रॉपर्टी डीलर के रूप में रहने लगा। हालांकि, जुलाई 2020 में पुलिस ने सात महीने की मशक्कत के बाद उसे दिल्ली से पुनः गिरफ्तार कर लिया।
मंदिर में पुजारी बनकर छिपने का नया षड्यंत्र
नौ जून 2023 को उसे पुनः दो महीने के पेरोल पर छोड़ा गया, जिसके बाद वह एक बार फिर फरार हो गया और सुरक्षा एजेंसियों के लिए पहेली बन गया। दो वर्षों तक तलाश करने के बाद वर्ष 2025 में एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस राजस्थान के दौसा जिले के गुढ़ा कटला गांव स्थित रामेश्वर धाम मंदिर पहुंची। पुलिस वहां संत दयादास महाराज के रूप में रह रहे एक वृद्ध पुजारी को देखकर हैरान रह गई, जिसकी लंबी दाढ़ी और सफेद बाल थे। लंबी निगरानी और चेहरे के मिलान विशेषकर आंखों और नाक की बनावट की जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि वह वृद्ध पुजारी कोई और नहीं बल्कि वांछित अपराधी देवेंद्र शर्मा था, जिसे मई 2025 में गिरफ्तार कर लिया गया। देवेंद्र शर्मा का मामला भारतीय न्याय प्रणाली और जेल प्रशासन के इतिहास में पेरोल प्रणाली के दुरुपयोग के सबसे चर्चित मामलों में गिना जाता है। चिकित्सा पेशे से जुड़ा एक व्यक्ति किस प्रकार आर्थिक तंगी के चलते संगठित अपराध, अंग तस्करी और सीरियल किलिंग के दलदल में उतरा और कानून से बचने के लिए साधु का भेष बदलकर लंबे समय तक फरारी काटता रहा, यह प्रकरण अपराध अनुसंधान के क्षेत्र में एक अनूठा उदाहरण है।
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