Did You Know : एक जैसी डीएनए होने के बाद भी अलग क्यों होते हैं जुड़वां बच्चों के फिंगरप्रिंट? जानिए दिलचस्प वैज्ञानिक वजह

खबर सार :-

जानिए समान डीएनए वाले जुड़वां बच्चों के फिंगरप्रिंट अलग क्यों होते हैं। उंगलियों के निशान के विकास से जुड़ी रोचक वैज्ञानिक जानकारियां।
जुड़वां बच्चों के फिंगरप्रिंट क्यों होते हैं अलग? जानिए विज्ञान

खबर विस्तार : -

नई दिल्ली: उंगलियों के निशानों की अनूठी पहचान और उनका इतिहास 19वीं सदी के अंतिम दौर में स्थापित हुआ था, जब डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने यह साक्ष्य जुटाना शुरू किया कि व्यक्ति की उंगलियों की रेखाएं न केवल पूरी तरह विशिष्ट होती हैं, बल्कि जीवनभर अपरिवर्तित भी रहती हैं। इस महत्वपूर्ण खोज ने पहचान के क्षेत्र में एक नई दिशा दी और जल्द ही अपराधियों को पकड़ने के लिए फिंगरप्रिंट का उपयोग एक विश्वसनीय फोरेंसिक टूल के रूप में शुरू हुआ, जो आज भी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए बेहद अहम बना हुआ है। इस वैज्ञानिक वास्तविकता को समझने के लिए फिंगरप्रिंट विज्ञान का अध्ययन बहुत कुछ स्पष्ट करता है, जो आधुनिक जांच पद्धतियों का एक अहम हिस्सा है।

दो अलग-अलग व्यक्तियों के संयोगवश एक जैसे फिंगरप्रिंट होने की संभावना 64 अरब में एक से भी कम आंकी गई है। इन आंकड़ों के आधार पर शोधकर्ताओं ने गणना की है कि स्कॉटलैंड यार्ड के फिंगरप्रिंट डेटाबेस में संयोगवश समान फिंगरप्रिंट वाले दो व्यक्तियों को प्रकट होने में दस लाख से अधिक वर्ष लग सकते हैं। फोरेंसिक विशेषज्ञों के अनुसार, उंगलियों के निशान इतने सटीक और अनूठे होते हैं कि दुनिया भर में इनकी प्रामाणिकता पर कभी संदेह नहीं किया गया, और यही कारण है कि यह आपराधिक मामलों को सुलझाने में एक अचूक माध्यम साबित होते हैं। लेकिन सबसे दिलचस्प सवाल यह है कि एक जैसे डीएनए अनुक्रम और अत्यधिक मिलती-जुलती शारीरिक बनावट वाले समान जुड़वां बच्चों के फिंगरप्रिंट भी अलग क्यों होते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि फिंगरप्रिंट केवल आनुवंशिक कोड से तय नहीं होते, बल्कि गर्भ में विकास के दौरान पर्यावरणीय कारकों से भी गहरे रूप से प्रभावित होते हैं। आनुवंशिक समानता के बावजूद जुड़वां बच्चे अपनी विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं के साथ विकसित होते हैं, जिनमें उनकी उंगलियों की सूक्ष्म रेखाओं का अंतर भी शामिल होता है।

यह भी पढ़ें:- Did You Know : जब एक दर्जी ने बनाई थी उड़ने वाली जैकेट: एफिल टॉवर के उस प्रयोग की दुखद दास्तान

गर्भ के भीतर विकास और फिंगरप्रिंट का निर्धारण

मानव शरीर में फिंगरप्रिंट भ्रूण के विकास के 13वें और 19वें सप्ताह के बीच तय हो जाते हैं। इन रेखाओं, भंवरों और लूप्स के सटीक विवरण कई कारकों से प्रभावित होते हैं, जिनमें गर्भ में बच्चे की स्थिति, गर्भनाल की लंबाई, रक्तचाप, पोषण और उंगलियों की वृद्धि दर शामिल हैं। विकास की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान गर्भावस्था के कारक और शारीरिक स्थितियां हर भ्रूण के लिए अलग होती हैं, जिसके कारण जुड़वां बच्चों में भी उंगलियों के निशान पूरी तरह से एक जैसे नहीं बन पाते हैं। जन्म के बाद ये छोटे-छोटे अंतर समय के साथ और अधिक स्पष्ट हो सकते हैं, जो ऊंचाई और वजन में भिन्नता जैसे शारीरिक बदलावों का परिणाम होते हैं। हालांकि उनके साझा डीएनए के कारण जुड़वां बच्चों के फिंगरप्रिंट अजनबियों की तुलना में अधिक मिलते-जुलते जरूर हो सकते हैं, लेकिन अत्याधुनिक रिकग्निशन सॉफ्टवेयर और प्रशिक्षित फोरेंसिक विशेषज्ञ इनके बीच का अंतर आसानी से पहचान लेते हैं।

वन्यजीवों में फिंगरप्रिंट की अनोखी दुनिया

फिंगरप्रिंट केवल इंसानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रकृति ने यह विशेषता अन्य जीवों को भी प्रदान की है। चिंपैंजी और गोरिल्ला जैसे प्राइमेट्स की उंगलियों के सिरों पर भी बेहद बारीक रेखाएं होती हैं जो प्रत्येक व्यक्ति या जीव के लिए विशिष्ट होती हैं, और यह विशेषता हमें संभवतः किसी साझा पूर्वज से विरासत में मिली है। इसके अलावा, एक अधिक दूर के संबंधी यानी कोआला ने स्वतंत्र रूप से ऐसे फिंगरप्रिंट विकसित किए हैं जो आश्चर्यजनक रूप से इंसानों के फिंगरप्रिंट से काफी मिलते-जुलते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि उंगलियों के इन निशानों का विकास प्रकृति की एक ऐसी अद्भुत व्यवस्था है जो जीवों को बेहतर पकड़ और स्पर्श संवेदनशीलता प्रदान करती है। चाहे बात इंसानों की हो या वन्यजीवों की, फिंगरप्रिंट का रहस्य इस बात का प्रमाण है कि जीव विज्ञान में आनुवंशिकी और पर्यावरण का संयोजन कितने अनूठे परिणाम उत्पन्न कर सकता है।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से ही उंगलियों के निशानों को मानवीय पहचान का एक अचूक माध्यम माना जाता रहा है। आधुनिक फोरेंसिक विज्ञान में इसका उपयोग अपराधियों की पहचान करने से लेकर विभिन्न कानूनी और प्रशासनिक कार्यों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। वैज्ञानिक अनुसंधान इस बात की पुष्टि करते रहे हैं कि डीएनए और पर्यावरणीय दशाओं का आपसी मेल किस प्रकार प्रत्येक जीव की शारीरिक विशिष्टता को गढ़ता है।

यह भी पढ़ें:- जबलपुर में संतुलन का अद्भुत नजारा देखकर हो जाएंगे हैरान, कुदरत का अनोखा अजूबा है ‘बैलेंसिंग राॅक’

अन्य प्रमुख खबरें