23500 से ज्यादा बिकीं sculptures, 361 रजिस्टर्ड कारीगरों ने लगाए stalls

खबर सार :-

कॉटेज और ग्रामीण उद्योग विभाग की ओर से 14 से 18 सितंबर तक गुजरात के पांच स्थानों पर मेले लगाए गए। यह मेला एक रोजगार और पर्यावरण रक्षक के रूप में देखा जा रहा है।
Ganesh-idols बेचकर जुटाए पांच करोड़, 186 tonnes मिट्टी की खपत हुई

खबर विस्तार : -

बड़ोदरा: गुजरात के माटी काम कलाकारी और ग्रामीण प्रौद्योगिकी संस्थान के एक नये तरकीब ने मिट्टी से कलाकृतियां बनाने और मिट्टी से बर्तन बनाने वाले कलाकारों को कमाई का बेहतरीन मौका दिया है। इसका खूबसूरत नतीजा भी सामने आया है। 361 रजिस्टर्ड कारीगरों को लगभग 5 करोड़ रुपए की कमाई हुई है। इस महीने राज्य सरकार के सहयोग से सात दिवसीय मेले का आयोजन किया गया था। इसमें गणेश प्रतिमाओं की 23500 से ज्यादा मूर्तियां बिकीं। यही कमाई का माध्यम बनीं।  

देशभर में ऐसी योजना हो सकती है सफल

आयोजन जब सरकारी होते हैं और बड़े स्तर पर कराए जाते हैं तो लोगों को कमाई का अवसर भी बड़ा मिलता है। इसका एक जीता जागता उदाहरण माटी कलाकारी और ग्रामीण प्रौद्योगिकी संस्थान की ओर से लगवाया गया मेल बना। इसमें मिट्टी से बनी पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमाओं ने लोगों का इतना ध्यान आकर्षित किया कि 23500 मूर्तियां बिक गई। यह मेला 14 से 18 सितंबर तक आयोजित किया गया था। 

कई सालों से चलाई जा रही है योजना

कॉटेज और ग्रामीण उद्योग विभाग के तहत संस्थान द्वारा आयोजित मूर्ति कला 2026 अहमदाबाद, बड़ोदरा और सूरत की पांच जगह पर मिट्टी की 23542 मूर्तियां बिकी। योजना बेहद आकर्षित करने वाली रही, इसमें हिस्सा लेने वाले कारीगरों को मूर्तियां बनाने वाली मिट्टी दी गई। इस आयोजन के लिए सरकार की ओर से ही 186 टन मिट्टी की व्यवस्था की गई थी।

साथ ही मेले में भाग लेने वाले मूर्ति विक्रेताओं को फ्री स्टॉल उपलब्ध कराए गए। यह मेला गुजरात में कई जगहों पर लगाया गया। सरकार की ओर से बताया गया कि मेले को पांच जगहों पर केंद्रित किया गया था। जिनमें से अहमदाबाद की वस्त्रापुर स्थित अहमदाबाद हाट में जमकर खरीदारी की गई। यहां पर 1.91 करोड़ रुपए से ज्यादा की बिक्री हुई। इसी तरह सूरत सबसे ज्यादा मूर्तियों की बिक्री हुई। यहां 7920 मूर्तियों की बिक्री होने से 1.11 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम मिली। 

प्रोत्साहन वाली योजना का बेहतरीन रिजल्ट मिला

बड़ोदरा के ही पारसी अगियारी मैदान में भी मेले का आयोजन किया गया। यहां पर 79 स्टार लगाए गए थे और इनमें भी जबरदस्त बिक्री हुई। 85.77 लाख रूपये विक्रेताओं के पास आएए,जबकि आंकड़े बता रहे हैं की साबरमती के रिवर फ्रंट पर 124 स्टार लगाए गए थे। इनमें 77.97 लख रुपए की बिक्री की गई। हस्त कला हाट भी अहमदाबाद में ही है। यहां पर 30 स्टॉल के जरिए 32.55 की बिक्री की गई।

माटी कला को प्रोत्साहित करने वाली योजना का बेहतरीन रिजल्ट भी मिला। राज्य सरकार की कोशिशों का मकसद गणेश उत्सव के दौरान प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों के विकल्प को सामने लाना था। इस लिहाज से मिट्टी से बनी मूर्तियों को पर्यावरण संरक्षण के लिए हाट के माध्य से सभी के सामने लाया गया। साथ ही आत्मनिर्भर भारत के मकसद को भी इस आयोजन ने सार्थक किया है। राज्य सरकार के मुताबिक 2014-15 तक गुजरात में गणेश की लगभग 90 फीसदी मूर्तियां पीओपी से बनती थी।

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स्टॉल पर रोज 1000 रूपये की सरकारी मदद 

पर्यावरण के अनुकूल मिट्टी की बनी मूर्तियां खूब पसंद की गईं। सरकार का कहना है कि पानी में पीओपी घुलती नहीं है। इसलिए जलीय जीवन और जल स्रोतों पर इनका विपरीत असर पड़ता है। इसलिए सरकार ने 2015 और 2016 में मिट्टी की मूर्ति बनाने वालों को लेकर प्रोत्साहन शुरू कर दिया। इस योजना के तहत कारीगर भी रजिस्टर्ड कराए गए और इनको प्रोत्साहित किया जाने लगा।

50 फीसदी सब्सिडी वाली दर पर इस्तेमाल के लिए तैयार हालत में मिट्टी मिलती है। इस आयोजन में भाग लेने के लिए योजना के तहत रजिस्टर्ड होना जरूरी होता है। साथ ही मुफ्त बिक्री स्टॉल और मेले के लिए रोजाना 1000 रूपये की मदद दी जाती है। इस योजना को जमीन पर उतरते ही पीओपी की मूर्तियां बिकने में कमी आई है और मिट्टी की मूर्तियां बड़ी मात्रा में बिक रही हैं। 

84500 से ज्यादा छात्र योजना से जुड़े

इस योजना का शिक्षा से जुड़ा महत्व भी है। इसके तहत 10 जिलों के 302 स्कूलों के 84500 से ज्यादा छात्रों ने योजना के तहत मिट्टी की मूर्ति बनाने के लाइव डेमो और खुद से करने वाले गतिविधियों का में हिस्सा लिया है। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा नीति के तहत कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। इनमें पर्यावरण से जुड़े मुद्दे पर जागरूकता बढ़ाने में मदद मिली है।

सरकार आने वाले सालों की योजना बना रही है, जिसमें आत्मनिर्भर गुजरात से आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को सार्थक किया जा सके। संस्थान ने कहा है की योजना कारीगरों को केवल आर्थिक मदद देने से कहीं आगे बड़ी है, इसमें पर्यावरण का संरक्षण और पारंपरिक हुनर देने के साथ रोजगार के रूप में आजीविका महत्वपूर्ण स्थान रखती है। मूर्तियां बनाने और उन्हें सजाने का काम कारीगर परिवारों की महिलाएं करती हैं। उनके लिए रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं।

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