दीपावली पर अनगिनत दीपों से जगमगा उठता है विशाखापत्तनम का कनक महालक्ष्मी मंदिर, दर्शन को उमड़ते हैं भक्त

खबर सार :-

दीपावली पर विशाखापत्तनम का कनक महालक्ष्मी मंदिर अनगिनत दीपों से जगमगा उठता है। यहां खुले आसमान के नीचे विराजमान देवी महालक्ष्मी की आभा देखते ही बनती है।
विशाखापत्तनम में स्थित है कनक महालक्ष्मी मंदिर, दीपावली पर करें दर्शन

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विशाखापत्तनम: दीपावली का त्योहार देवी लक्ष्मी के स्वागत और समृद्धि के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर लोग धन और वैभव की देवी मां लक्ष्मी का आशीर्वाद पाने के लिए अपने घरों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और मंदिरों को दीपों से जगमगा देते हैं। ऐसे में, जब देवी लक्ष्मी को समर्पित प्रमुख और पूजनीय मंदिरों की बात आती है, तो विशाखापत्तनम स्थित 'श्री कनक महालक्ष्मी मंदिर' का विशेष स्थान है।

विशाखापत्तनम (विजाग) का श्री कनक महालक्ष्मी मंदिर उत्तरी आंध्र प्रदेश का एक अत्यंत प्रसिद्ध और पवित्र धार्मिक स्थल है, जो अपनी अनूठी परंपराओं और वास्तुकला के लिए जाना जाता है। दीपावली और धनतेरस जैसे शुभ त्योहारों के दौरान इस मंदिर की शोभा और रौनक कई गुना बढ़ जाती है। कहा जाता है कि यहां स्थापित देवी महालक्ष्मी की प्रतिमा इंसानों द्वारा नहीं बनाई गई है, बल्कि यह स्वयं धरती से प्रकट हुई है (एक 'स्वयंभू' प्रतिमा)। आइए, इस पवित्र मंदिर की विशेषताओं और दीपावली के दौरान यहाँ की जाने वाली पूजा-पद्धतियों के बारे में जानें।

खुले आसमान के नीचे विराजमान हैं देवी

इस मंदिर की एक खास बात यह है कि इसके गर्भगृह के ऊपर कोई छत या शिखर (गोपुरम) नहीं है; देवी कनक महालक्ष्मी खुले आसमान के नीचे विराजमान हैं। दीपावली की रात, जब पूरा मंदिर पारंपरिक दीपों और आधुनिक सजावटी रोशनी से जगमगा उठता है, तब खुले आसमान के नीचे अनगिनत दीपों की चमक से नहाई देवी की 'स्वयंभू' प्रतिमा एक अलौकिक और दिव्य दृश्य प्रस्तुत करती है।

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सोने-चांदी के आभूषणों से होता है श्रृंगार

दीपावली और धनतेरस के शुभ अवसरों पर देवी कनक महालक्ष्मी को सोने और चांदी के सुंदर प्राचीन आभूषणों से सजाया जाता है। चूंकि 'कनक' शब्द का अर्थ 'सोना' होता है, इसलिए दीपावली के समय देशभर से हजारों व्यापारी और भक्त यहां आते हैं और देवी से सुख, समृद्धि तथा आर्थिक स्थिरता का आशीर्वाद मांगते हैं। अन्य पारंपरिक हिंदू मंदिरों के विपरीत, यहां भक्तों और देवी के बीच कोई पर्दा या भौतिक रुकावट नहीं है। दीवाली जैसे बड़े त्योहारों के दौरान भी भक्त सीधे गर्भगृह में प्रवेश कर सकते हैं, देवी की प्रतिमा को छू सकते हैं और अपने हाथों से अभिषेक या कुमकुम अर्चन कर सकते हैं। इतने शुभ दिन पर धन और समृद्धि की देवी की इस तरह व्यक्तिगत रूप से पूजा करने का गहरा आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। दीवाली की रात, देवी महालक्ष्मी का आशीर्वाद पाने के लिए विशेष मंत्रों का जाप, महाआरती और पंचामृत अभिषेक जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

दीपावली पर भक्तों के लिए खास इंतजाम

वैसे तो यह मंदिर रोज सुबह 5:00 बजे से आधी रात तक खुला रहता है, लेकिन दीपावली के समय यहां आने वाली भारी भीड़ और विशेष अनुष्ठानों को देखते हुए भक्तों के लिए खास इंतजाम किए जाते हैं। दीपावली के अलावा मार्गशीर्ष महीने (नवंबर-दिसंबर) में यहां पूरे महीने 'मार्गशीर्ष मास महोत्सव' मनाया जाता है, जिसमें गुरुवार के दिन विशेष रूप से भारी भीड़ उमड़ती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, देवी लक्ष्मी यहां 'स्वयंभू' (स्वयं प्रकट) रूप में विराजमान हैं। कहा जाता है कि 1912 में एक कुएं से देवी लक्ष्मी की प्रतिमा मिली थी, जिसे बाद में उसी स्थान पर स्थापित कर दिया गया। उन्हें विशाखापत्तनम शहर की अधिष्ठात्री (रक्षक) देवी माना जाता है। यह भी माना जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं, देवी उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

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