उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मधुमिता हत्याकांड के दोषी संतोष राय और दो अन्य कैदियों की रिहाई के निर्देश
खबर सार :-
नैनीताल उच्च न्यायालय ने उम्रकैद की सजा काट चुके कैदियों की समय पूर्व रिहाई मामले में सुनवाई करते हुए कवियत्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के दोषी संतोष राय सहित तीन कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया है।
खबर विस्तार : -
नैनीताल: उत्तराखंड के नैनीताल स्थित उच्च न्यायालय ने उम्रकैद की सजा भुगत रहे बंदियों की समयपूर्व रिहाई को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय पारित किया है। अदालत ने अपने इस आदेश में बहुचर्चित कवियत्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के दोषी संतोष राय समेत कुल दो अन्य कैदियों को भी जेल से रिहा किए जाने के निर्देश दिए हैं। न्यायिक प्रक्रिया के तहत जैसे ही इन मामलों से जुड़े दस्तावेज संबंधित जेल अधिकारियों तक पहुंचेंगे, वैसे ही इनकी रिहाई से जुड़ी कानूनी औपचारिकताएं तेजी से पूरी कर ली जाएंगी। यह पूरा मामला उच्च न्यायालय के समक्ष तब आया जब अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एक याचिका पर विचार करना शुरू किया। इसके साथ ही कुछ कैदियों की ओर से व्यक्तिगत रूप से भी याचिकाएं दाखिल की गई थीं, जिनमें लंबे समय से कैद में बंद लोगों की रिहाई की मांग प्रमुखता से रखी गई थी। न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने इन सभी याचिकाओं को एक साथ समेकित करते हुए संयुक्त रूप से सुनवाई पूरी की।
राज्य सरकार की नीति और रिहाई की मांग
सुनवाई के दौरान अदालत में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि राज्य सरकार की समयपूर्व रिहाई नीति का सही ढंग से क्रियान्वयन होना चाहिए। याचिकाकर्ताओं के पक्ष से यह दलील दी गई कि जो कैदी चौदह वर्ष या उससे अधिक की कैद की अवधि पूरी कर चुके हैं, उन्हें कानूनी प्रावधानों के तहत राहत का लाभ मिलना चाहिए। कई मामलों में तो बंदी दो दशक से भी अधिक का समय जेल की चारदीवारी के भीतर बिता चुके हैं, जिसके बाद उनके मामलों पर मानवीय और कानूनी दोनों दृष्टियों से विचार करने की आवश्यकता है। बहस के दौरान याचिकाकर्ता के पक्ष ने यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि आजीवन कारावास की सजा का अर्थ यह कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति को अपने जीवन का शेष पूरा हिस्सा सलाखों के पीछे ही बिताना पड़े। सुधार गृहों में लंबे समय तक रहने के बाद यदि कैदी का आचरण संतोषजनक पाया जाता है, तो स्थापित नियमों के दायरे में उसे समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास किए जाने चाहिए।
शासन की ओर से पेश की गई नई सूची
मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार की ओर से भी न्यायालय के समक्ष पक्ष रखा गया। सुनवाई के क्रम में सरकार के नुमाइंदों ने अदालत को बताया कि पात्र बंदियों की छंटनी के लिए एक विशेष समिति का गठन किया गया है। इस समिति की बैठकें पूर्व में जुलाई और उसके बाद सितंबर के महीने में आयोजित की जा चुकी हैं, जिनमें विभिन्न मामलों की समीक्षा की गई है। सरकार की तरफ से अदालत में समयपूर्व रिहाई से जुड़ी एक अद्यतन सूची भी प्रस्तुत की गई। इसमें यह जानकारी दी गई कि योग्य पाए जाने वाले कैदियों को एक निश्चित प्रक्रिया के तहत चरणबद्ध तरीके से रिहा किया जा रहा है। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान अब तक कुल कितने कैदियों को रिहाई का लाभ मिल चुका है, इसका कोई आधिकारिक और सटीक आंकड़ा फिलहाल अदालत के समक्ष पेश नहीं किया गया है।
कानूनी प्रक्रिया और आगे के कदम
अदालत ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद संतोष राय और अन्य दो कैदियों की रिहाई का रास्ता साफ कर दिया है। न्यायिक निर्देशों के अनुपालन में अब जेल प्रशासन अपने स्तर पर दस्तावेजों की जांच कर रहा है। जैसे ही कागजी कार्रवाई पूरी होगी, इन कैदियों के जेल से बाहर आने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। इस पूरे प्रकरण की जड़ें उस नीति से जुड़ी हैं जिसके तहत राज्य सरकारें उन उम्रकैद के कैदियों की सजा की समीक्षा करती हैं जिन्होंने कानून द्वारा तय न्यूनतम अवधि पूरी कर ली है। भारतीय न्याय प्रणाली और जेल नियमावली के अंतर्गत, चौदह वर्ष की वास्तविक सजा काट चुके कैदी समयपूर्व रिहाई के लिए आवेदन करने के पात्र होते हैं। इसके लिए राज्य स्तर पर गठित समीक्षा समितियां कैदियों के आचरण, अपराध की प्रकृति और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करती हैं। मधुमिता शुक्ला हत्याकांड का यह मामला देश के चर्चित मामलों में से एक रहा है, जिसमें निचली अदालत से लेकर उच्च अदालतों तक लंबी कानूनी लड़ाइयां लड़ी जा चुकी हैं। इसी कड़ी में अब कैदियों के मानवाधिकारों और कानूनी प्रावधानों के संतुलन को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने यह नया आदेश जारी किया है।
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