IAS दुर्गा शक्ति नागपाल मामले पर हाईकोर्ट सख्त, जज को फोन करने को बताया न्यायपालिका पर प्रहार

खबर सार :-

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल द्वारा सिविल जज को फोन करने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रहार बताया है। पढ़ें पूरी खबर।
आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल के फोन कॉल विवाद: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया

खबर विस्तार : -

Lucknow News : उत्तर प्रदेश की नौकरशाही और न्यायपालिका के बीच एक बार फिर बड़ा टकराव सामने आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने गोंडा जिले के एक पुराने भूमि विवाद मामले में कमिश्नर और चर्चित आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल द्वारा सिविल जज को फोन किए जाने की घटना को बेहद गंभीरता से लिया है। अदालत ने इस आचरण को न्याय प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर करारा प्रहार करार दिया है। इस मामले में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के संकेत दिए गए हैं, जिससे प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।

नजूल भूमि विवाद और तीन दशकों पुराना मुकदमा

यह पूरा कानूनी विवाद देवीपाटन मंडल के अंतर्गत आने वाली एक बहुमूल्य नजूल भूमि से जुड़ा हुआ है। मूल मामला वर्ष 1997 का है, जिसमें ज्योति विद्या मंदिर की ओर से नगर पालिका परिषद गोंडा के खिलाफ एक नियमित मुकदमा दायर किया गया था। राज्य सरकार और नगर पालिका इस मामले में मुख्य पक्षकार हैं। प्रशासन का तर्क है कि यह भूमि कार्यालय भवनों और अन्य सरकारी एवं सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित थी, जबकि वहां स्कूल भवन का निर्माण कर लिया गया। यह संवेदनशील मामला पिछले करीब तीन दशकों से सिविल कोर्ट में साक्ष्य के चरण में लंबित है और अदालत द्वारा इस पर यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने के स्पष्ट आदेश दिए गए थे।

जज को टेलीफोन कॉल और प्रशासनिक दबाव का गंभीर आरोप

विवाद तब और गहरा गया जब गोंडा की सिविल जज (सीनियर डिवीज़न) शबीना खान ने हाईकोर्ट के संज्ञान में यह बात लाई कि कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल ने 15 जुलाई को उनके सरकारी और व्यक्तिगत नंबर पर फोन किया था। जज के अनुसार, इस कथित टेलीफोन बातचीत के दौरान उनकी छुट्टियों के जिक्र के साथ-साथ उनकी अदालत में विचाराधीन इसी भूमि विवाद मामले का भी संदर्भ दिया गया था। जज ने इसे अपनी स्वतंत्र कार्यप्रणाली पर अप्रत्यक्ष दबाव के रूप में महसूस किया। असहज परिस्थितियों के चलते उन्होंने 4 अगस्त को जिला जज, गोंडा से इस मुकदमे को अपनी अदालत से किसी अन्य कोर्ट में ट्रांसफर करने का औपचारिक अनुरोध किया, जिसके बाद मामला समान क्षेत्राधिकार वाली दूसरी अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया।

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हाईकोर्ट की कड़ी फटकार और आपराधिक अवमानना

हालांकि मामला दूसरी अदालत में ट्रांसफर होने के बाद स्कूल द्वारा दायर ट्रांसफर याचिका निष्प्रभावी हो गई थी, परंतु हाईकोर्ट ने इस गंभीर प्रशासनिक हस्तक्षेप को नजरअंदाज करने से इनकार कर दिया। अदालत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि कमिश्नर द्वारा फोन किए जाने के तथ्य से इनकार नहीं किया गया है। हाईकोर्ट ने गहरी हैरानी जताई कि आखिर कोई पक्षकार या वरिष्ठ अधिकारी लंबित मुकदमे के दौरान जज से संपर्क करने का दुसाहस कैसे कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि बातचीत का लहजा और संदर्भ प्रथम दृष्टया पीठासीन अधिकारी को प्रभावित करने का स्पष्ट प्रयास प्रतीत होता है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने इसे आपराधिक अवमानना के दायरे में रखने योग्य माना है।

न्यायपालिका की स्वायत्तता सर्वोपरि

अपने ऐतिहासिक और कड़े आदेश में हाईकोर्ट ने दोहराया कि अधीनस्थ अदालतों के जजों को बिना किसी भय, दबाव या बाहरी हस्तक्षेप के अपनी न्यायिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए। अदालत ने चेताया कि किसी भी प्रशासनिक अधिकारी, व्यक्ति या अधिवक्ता द्वारा न्याय प्रक्रिया में अनुचित दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस मामले को अब आवश्यक दिशा-निर्देशों के लिए मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायमूर्तियों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे यह तय हो गया है कि प्रशासनिक मनमानी और न्यायिक स्वतंत्रता के इस संघर्ष पर आगे भी कड़ी कानूनी कार्यवाही जारी रहेगी।

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