एलपीजी के महंगे झटके से OMCs पर दबाव, अब दूसरी तिमाही में कीमतों में नरमी से राहत की उम्मीद
खबर सार :-
पश्चिम एशिया संकट ने एलपीजी आयात लागत बढ़ाकर सरकारी तेल कंपनियों की पहली तिमाही की कमाई पर दबाव बढ़ाया। अंडर-रिकवरी 61,900 करोड़ रुपये तक पहुंची, लेकिन जुलाई-अगस्त में अंतरराष्ट्रीय कीमतें नरम हुईं। सऊदी सीपी में गिरावट और आपूर्ति सुधार से दूसरी तिमाही में अंडर-रिकवरी करीब 40 प्रतिशत घटने की उम्मीद है, जिससे OMCs की लाभप्रदता को राहत मिल सकती है।
खबर विस्तार : -
LPG Price Updates: रसोई गैस की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय उतार-चढ़ाव ने सरकारी तेल कंपनियों की कमाई का गणित बिगाड़ दिया है। वित्त वर्ष 2026 में मजबूत लाभप्रदता दर्ज करने के बाद वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की आय और मुनाफे पर दबाव बढ़ा। रिफाइनिंग मार्जिन में सुधार के बावजूद एलपीजी पर भारी अंडर-रिकवरी और मार्केटिंग घाटे ने कंपनियों की कमाई को प्रभावित किया। हालांकि, जुलाई-अगस्त में अंतरराष्ट्रीय एलपीजी कीमतों में आई नरमी से अब दूसरी तिमाही में कंपनियों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है।
तीनों OMCs को 13,700 करोड़ की अंडर-रिकवरी
केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, देश की तीन प्रमुख सरकारी तेल विपणन कंपनियों को वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में एलपीजी की बिक्री पर करीब 13,700 करोड़ रुपये की संयुक्त अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ा। इसमें सरकार से मिली 7,500 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति को समायोजित किया गया है। घरेलू उपभोक्ताओं को बाजार कीमत से कम दर पर रसोई गैस उपलब्ध कराने के कारण कंपनियों को लागत और बिक्री मूल्य के बीच बड़ा अंतर झेलना पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार, एलपीजी पर कुल अंडर-रिकवरी 31 मार्च 2026 को 48,200 करोड़ रुपये थी, जो 30 जून 2026 तक बढ़कर 61,900 करोड़ रुपये हो गई। यानी कुछ ही महीनों में कंपनियों के सामने करीब 13,700 करोड़ रुपये का अतिरिक्त दबाव आया। पश्चिम एशिया में संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी आपूर्ति बाधाओं ने इस स्थिति को और गंभीर बनाया।
सऊदी सीपी में करीब 50% उछाल
वैश्विक एलपीजी कीमतों में तेजी का सबसे बड़ा असर अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस (Saudi CP) पर दिखाई दिया। वित्त वर्ष 2025-26 में इसका औसत भाव करीब 530 डॉलर प्रति मीट्रिक टन था। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में यह बढ़कर 785 डॉलर प्रति मीट्रिक टन पहुंच गया। यानी एक साल के औसत स्तर की तुलना में करीब 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। पश्चिम एशिया संकट के दौरान आपूर्ति शृंखला में आई बाधाओं ने कंपनियों की खरीद लागत बढ़ा दी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगी एलपीजी खरीदने के बावजूद घरेलू ग्राहकों के लिए कीमतों को सीमित रखना पड़ा। इसका सीधा असर OMCs की मार्केटिंग मार्जिन और मुनाफे पर पड़ा।
आयात से पूरी होती है भारत की 60% एलपीजी जरूरत
भारत अपनी कुल एलपीजी जरूरत का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। पश्चिम एशिया से आपूर्ति प्रभावित होने के बाद भारतीय कंपनियों ने अमेरिका और अन्य बाजारों से खरीद बढ़ाई। हालांकि, वैकल्पिक बाजारों से एलपीजी मंगाने की वजह से लैंडेड कॉस्ट यानी भारत तक पहुंचने वाली वास्तविक आयात लागत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। इस बढ़ी लागत का असर कम करने के लिए सरकार और तेल कंपनियों ने घरेलू एलपीजी कीमतों में भी बदलाव किया। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के दौरान 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत में 89 रुपये की बढ़ोतरी की गई। इसका उद्देश्य कंपनियों पर पड़ रहे अंडर-रिकवरी के बोझ को कुछ हद तक कम करना था।
जुलाई से बदली तस्वीर, दूसरी तिमाही में राहत
हालांकि, एलपीजी बाजार में अब हालात धीरे-धीरे बदलते नजर आ रहे हैं। आपूर्ति में सुधार के साथ अंतरराष्ट्रीय कीमतों में नरमी आई है। सऊदी सीपी जुलाई 2026 में घटकर 592 डॉलर प्रति मीट्रिक टन और अगस्त 2026 में 632 डॉलर प्रति मीट्रिक टन पर आ गया। इससे कंपनियों की खरीद लागत पर दबाव कम होने की उम्मीद है। केयरएज रेटिंग्स के मुताबिक, जुलाई 2026 से अंतरराष्ट्रीय एलपीजी कीमतों में गिरावट के कारण वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में एलपीजी अंडर-रिकवरी में करीब 40 प्रतिशत की क्रमिक कमी आ सकती है। यदि यह रुझान आगे भी जारी रहता है तो सरकारी तेल कंपनियों की लाभप्रदता में सुधार देखने को मिल सकता है।
रिफाइनिंग मार्जिन सुधरा, लेकिन LPG ने बढ़ाई चिंता
पहली तिमाही में रिफाइनिंग मार्जिन में सुधार OMCs के लिए सकारात्मक संकेत रहा, लेकिन एलपीजी कारोबार में बढ़ते घाटे ने इस लाभ का बड़ा हिस्सा दबा दिया। इससे साफ है कि कंपनियों की कमाई केवल रिफाइनिंग प्रदर्शन पर निर्भर नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों, आयात लागत और घरेलू ईंधन मूल्य निर्धारण का भी बड़ा असर पड़ता है। आने वाले महीनों में एलपीजी कीमतों, पश्चिम एशिया की स्थिति और वैश्विक आपूर्ति शृंखला की दिशा महत्वपूर्ण रहेगी। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें मौजूदा नरम स्तरों पर बनी रहती हैं और आयात लागत घटती है, तो OMCs को एलपीजी कारोबार में राहत मिल सकती है। इसके साथ ही घरेलू कीमतों और लागत के बीच संतुलन भी कंपनियों की कमाई के लिए अहम बना रहेगा।
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