लखनऊ: वीआईपी और रईसी इलाकों में पतंगबाज़ी का शौक अब लोगों की ज़िंदगी पर भारी पड़ रहा है। शासन की रोक के बावजूद खुलेआम बिक रहे चाइनीज़ मांझे ने शहर के आम नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों की जान जोखिम में डाल रखी है। आए दिन सड़क पर हादसों की खबरें मिल रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी अब तक जागे नहीं हैं। ताज़ा मामला वजीरगंज क्षेत्र का है, जहां सुबह एक युवक बाइक से जा रहा था। तेज़ रफ्तार में उड़ रही पतंग का मांझा उसकी गर्दन पर आ लिपटा। संयोग अच्छा रहा कि युवक ने हेलमेट की पट्टी और रुमाल से खुद को बचा लिया, वरना एक और जान चली जाती। घटना के बाद युवक को अस्पताल ले जाया गया, जहां उसे मामूली इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई।
महज़ कुछ दिन पहले विधानसभा भवन के पास एक महिला कांस्टेबल चाइनीज़ मांझे की चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल हो गई थी। वह ड्यूटी पर थी, जब मांझा उसके चेहरे से टकराया और गहरे ज़ख्म दे गया।
वहीं, 11 जनवरी को शाहजहांपुर में ड्यूटी कर रहे एक पुलिस कांस्टेबल की चाइनीज़ मांझे से जान चली गई थी। 24 फरवरी को राजधानी लखनऊ के बीबीडी इलाके में एक युवक की गर्दन मांझे से कट गई थी, उसे तत्काल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और पांच टांके लगे थे। उत्तर प्रदेश सरकार ने चाइनीज़ मांझे की बिक्री और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है, लेकिन बाज़ारों में यह धड़ल्ले से बिक रहा है। ऑनलाइन पोर्टलों से लेकर लोकल दुकानों तक, यह घातक मांझा आसानी से उपलब्ध है। दुकानदारों ने बिक्री के लिए कोड वर्ड और छुपे हुए स्टॉक तैयार कर रखे हैं।
शहर के कोने-कोने में लगने वाले इन मांझों से आम आदमी और सुरक्षा बल, दोनों ही परेशान हैं, लेकिन प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारी आंखों पर पट्टी बांधकर बैठे हैं। न कोई सख्त कार्रवाई, न ही कोई अभियान — हालात कुंभकरण जैसी नींद में डूबे सिस्टम को बेनकाब कर रहे हैं। लोगों का गुस्सा अब सोशल मीडिया और सड़कों दोनों पर दिखाई देने लगा है। सवाल उठ रहे हैं कि जब सरकार ने पाबंदी लगा दी है, तो फिर यह मांझा कैसे और कहां से आ रहा है? क्या प्रशासनिक मिलीभगत इस मौत के धंधे को बढ़ावा दे रही है? आमजन और सामाजिक संगठनों की मांग है कि चाइनीज़ मांझे के खिलाफ ज़मीनी स्तर पर सघन अभियान चलाया जाए। दोषी दुकानदारों और आपूर्तिकर्ताओं पर आपराधिक धाराओं में मुकदमा दर्ज हो और जनजागरूकता के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जाएं।
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