भुवनेश्वरः ओडिशा की नवगठित भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने सामाजिक समानता और संवैधानिक गरिमा की दिशा में एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के नेतृत्व में सरकार ने आधिकारिक संचार, दस्तावेजों, प्रकाशनों और प्रमाणपत्रों में 'हरिजन' शब्द के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। यह कदम अनुसूचित जातियों की गरिमा और भारतीय संविधान में निहित मूल्यों की रक्षा के उद्देश्य से उठाया गया है।
राज्य के अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति विकास, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की ओर से जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, सभी विभागों और अधीनस्थ कार्यालयों को अब 'हरिजन' शब्द का प्रयोग बंद करना होगा और इसके स्थान पर केवल संविधान सम्मत शब्द 'अनुसूचित जाति' (Scheduled Caste) का प्रयोग किया जाएगा। यह निर्देश ओडिशा मानवाधिकार आयोग (OHRC) के निर्देशों और भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के पहले के आदेशों के संदर्भ में जारी किया गया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि जाति प्रमाण पत्र, विभागीय नामकरण, शासकीय प्रकाशन, सरकारी फॉर्म या किसी भी आधिकारिक दस्तावेज़ में यह शब्द अब नहीं लिखा जाएगा। अंग्रेजी के साथ-साथ उड़िया और अन्य भाषाओं में भी 'अनुसूचित जाति' का शुद्ध और संवैधानिक अनुवाद ही उपयोग किया जाएगा।
इस आदेश के पीछे प्रमुख कारण यह है कि ‘हरिजन’ शब्द अब संवेदनशील और अपमानजनक माना जाता है। भले ही महात्मा गांधी ने इस शब्द का उपयोग सकारात्मक संदर्भ में किया था, परंतु आज यह शब्द कई दलित संगठनों और समाज के वर्गों को सम्मानजनक नहीं लगता। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, ओडिशा मानवाधिकार आयोग (OHRC) और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार, पहले ही इसके उपयोग पर रोक लगाने की सिफारिश कर चुके हैं।
ओडिशा सरकार की तरफ से यह निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जातियों को प्राप्त संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के दृष्टिकोण से लिया गया है। कई वर्षों से समाज के एक वर्ग द्वारा यह मांग की जा रही थी कि 'हरिजन' जैसे शब्द जो प्रतीत होता है कि समानता के बजाय दया की दृष्टि को दर्शाते हैं, उनका उपयोग बंद किया जाए। महात्मा गांधी द्वारा कभी 'हरिजन' शब्द का प्रयोग कर इसे 'भगवान के लोग' कहा गया था, लेकिन समय के साथ दलित समाज ने इसे एक अपमानजनक और अवांछनीय शब्द के रूप में देखना शुरू कर दिया। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और कई सामाजिक संगठनों ने बार-बार इस शब्द के बहिष्कार की मांग उठाई है। ओडिशा सरकार के इस फैसले को सामाजिक न्याय की दिशा में एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है और इससे अन्य राज्यों को भी समान कदम उठाने की प्रेरणा मिल सकती है।
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