India Nuclear Weapons Control : भारत में परमाणु हथियारों की कमान किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं होती। हाल ही में पाक में हुए बड़े संगठनात्मक फेरबदल के बाद वहां के सेना प्रमुख आसिम मुनीर को तीनों सेनाओं की सर्वाेच्च जिम्मेदारी और न्यूक्लियर सिस्टम का नियंत्रण दिया गया है। इस बदलाव ने भारत में भी यह सवाल दोबारा चर्चा में ला दिया है कि हमारे यहां परमाणु हथियारों पर अंतिम अधिकार किसके पास है और क्या प्रधानमंत्री संकट की घड़ी में अकेले न्यूक्लियर स्ट्राइक का आदेश दे सकते हैं?
भारत की नीति इस सवाल का सीधा जवाब देती है, देश ने परमाणु हथियारों को आक्रामकता के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए रखा है। दुनिया के नौ परमाणु संपन्न देशों में शामिल भारत अपनी ‘नो फर्स्ट यूज़’ नीति का सख्ती से पालन करता है। यानी जब तक कोई देश भारत पर परमाणु हमला नहीं करेगा अथवा उसके आसार नहीं दिखते, तब तक भारत कभी न्यूक्लियर अटैक नहीं करेगा।
जहां पाक में एक ही अधिकारी को सैन्य और परमाणु दोनों शक्तियों का केंद्रीकृत अधिकार मिल गया है, वहीं भारत का ढांचा बिल्कुल विपरीत है। यहां न्यूक्लियर हथियारों का नियंत्रण कई स्तरों की सुरक्षा और अनुमोदन प्रक्रिया से गुजरता है। परमाणु हमले का निर्णय न्यूक्लियर कमान अथॉरिटी (NCA) लेती है, जो दो हिस्सों में बंटी होती है, राजनीतिक परिषद और कार्यकारी परिषद। राजनीतिक परिषद की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं, लेकिन वे अकेले कोई आदेश जारी नहीं कर सकते। कार्यकारी परिषद के प्रमुख राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) होते हैं, जो तकनीकी और रणनीतिक मूल्यांकन के आधार पर अंतिम अनुमोदन देते हैं। दोनों समितियों की संयुक्त स्वीकृति के बाद ही किसी भी न्यूक्लियर हथियार को लॉन्च करने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
इस बहुस्तरीय प्रणाली का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परमाणु हथियारों का प्रयोग सिर्फ अत्यंत आवश्यक, सोच समझकर और सामूहिक निर्णय के बाद ही किया जाए। यही कारण है कि भारत की परमाणु नीति सुरक्षित, नियमानुकूल और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप मानी जाती है।
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