साल दर साल अग्निकांडों से झुलस रहा कोलकाता, दो दशक में 200 से ज्यादा मौतें
खबर सार :-
कोलकाता में पिछले दो दशक में लगभग दो सौ से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। 19 अगस्त को न्यू मार्केट में लगी आग ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
खबर विस्तार : -
कोलकाता: "सिटी ऑफ जॉय" (खुशियों का शहर) के नाम से मशहूर कोलकाता, बार-बार होने वाली आग की घटनाओं की वजह से अब "सिटी ऑफ भय" (डर का शहर) में बदलता दिख रहा है। इस हफ्ते एक होटल में लगी आग में नौ लोगों की मौत के बाद आग से जुड़ी भयानक मौतों की यादों ने शहर में फिर से दहशत फैला दी है।
कोलकाता में आग लगने की घटनाएं सिर्फ लपटों और धुएं की कहानी नहीं हैं; यह बार-बार होने वाली लापरवाही की भी कहानी है—ऐसी कमियां जो किसी हादसे के तुरंत बाद तो सवाल खड़े करती हैं, लेकिन हालात सामान्य होने पर भुला दी जाती हैं। पिछले दो दशकों में शहर ने फैक्टरियों, अस्पतालों, बाजारों, रेलवे की इमारतों और होटलों में कई भयानक आग की घटनाएं देखी हैं। इन घटनाओं में दो सौ से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है।
साल-दर-साल वही हालात
हर बड़े हादसे के बाद प्रशासन हरकत में आता है। जांच कमेटियां बनती हैं, सुरक्षा उपायों की समीक्षा होती है, गाइडलाइंस जारी की जाती हैं और भरोसा दिलाया जाता है कि जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी। फिर भी, जैसे-जैसे समय बीतता है, वही सवाल फिर उठते हैं: इमरजेंसी एग्जिट (आपातकालीन निकास) की क्या हालत थी? क्या आग बुझाने वाले सिस्टम काम कर रहे थे? इमारत के अंदर मौजूद लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं थे? इस दौरान सत्ता के गलियारों में भी बड़े बदलाव हुए हैं। लेफ्ट फ्रंट के लंबे शासन के बाद तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई, और अब राज्य में बीजेपी की सरकार है। राजनीतिक चेहरे और सरकारें बदलीं, लेकिन आग की बड़ी घटनाओं के बाद जो हालात बनते हैं, वे काफी हद तक वैसे ही बने हुए हैं।
1. भयानक आग की घटनाएं: तपसिया फैक्टरी से शुरुआत
22 नवंबर 2006 को तपसिया की एक लेदर फैक्टरी में आग लग गई। उस समय अंदर लगभग 40 मजदूर मौजूद थे। आग लगते ही अफ़रा-तफरी मच गई। बाहर निकलने का सिर्फ एक दरवाजा था, और आरोप है कि आग लगने के बाद उसकी चाबी नहीं मिल रही थी। आखिरकार मजदूरों ने ताला तोड़कर बाहर निकलने का रास्ता बनाया। इस हादसे में नौ लोगों की मौत हो गई और 18 लोग घायल हो गए। कई मजदूर बुरी तरह झुलस गए। इस घटना ने औद्योगिक इकाइयों में सुरक्षा मानकों और इमरजेंसी एग्जिट के इंतजामों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
2. नंदराम मार्केट: 11 साल में दो बार आग; करोड़ों का नुकसान
कोलकाता के बड़ाबाजार इलाके में नंदराम मार्केट में 13 जुलाई 2019 को लगी आग ने व्यापारियों को हिलाकर रख दिया। आग दोपहर करीब 3 बजे नौवीं मंजिल पर बने कपड़ों के गोदाम में लगी थी। आग पर पूरी तरह काबू पाने में 90 से ज्यादा लोगों की टीम और 20 दमकल गाड़ियों को लगभग चार दिन तक लगातार कोशिश करनी पड़ी। गोदाम तो पूरी तरह जलकर खाक हो गया, लेकिन दो अन्य दुकानों को भी कुछ नुकसान पहुंचा। व्यापारियों ने शुरू में नुकसान का अनुमान कुछ लाख रुपये लगाया था। उस समय करीब 4,000 दुकानें जलकर खाक हो गई थीं और 12,000 व्यापारी प्रभावित हुए थे; उस आग से हुआ आर्थिक नुकसान ₹100 करोड़ से ज्यादा था।
3. स्टीफन कोर्ट: जान बचाने के लिए लोग इमारत से कूदे
23 मार्च 2010 को पार्क स्ट्रीट स्थित स्टीफन कोर्ट में लगी आग ने पूरे शहर को हिलाकर रख दिया। आग बहुमंजिला इमारत में तेज़ी से फैली, जिससे कई लोग अंदर ही फंस गए। बाहर निकलने का कोई रास्ता न मिलने पर, कुछ लोगों ने जान बचाने की हताशा में इमारत से छलांग लगा दी, जबकि अन्य धुएं और आग की लपटों के बीच फंसे रह गए। इस त्रासदी में 43 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए। स्टीफन कोर्ट की घटना ने पुरानी और घनी आबादी वाली इमारतों में आग से सुरक्षा की निगरानी की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
4. AMRI हॉस्पिटल: जब बाहर निकलना नामुमकिन हो गया
9 दिसंबर 2011 की सुबह ढाकुरिया स्थित AMRI हॉस्पिटल में लगी आग कोलकाता की सबसे विनाशकारी अग्निकांडों में से एक है। अस्पताल के बेसमेंट से शुरू हुई आग के साथ-साथ जहरीला धुआं भी तेजी से फैल गया। ICU में भर्ती मरीजों और गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए स्थिति विशेष रूप से भयावह थी, क्योंकि उनमें से कई शारीरिक रूप से सुरक्षित बाहर निकलने में असमर्थ थे। बचाव कार्यों के बावजूद, 93 लोगों की जान चली गई। इस घटना के बाद अस्पतालों में आग से सुरक्षा, बेसमेंट में ज्वलनशील पदार्थों के भंडारण और आपातकालीन निकासी की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए।
5. सियालदह मार्केट: सोते हुए मजदूरों की मौत
27 फरवरी 2013 की सुबह, सियालदह में सूर्य सेन स्ट्रीट पर स्थित कागज और प्लास्टिक के बाजार में आग लग गई। बाजार के अंदर कई मजदूर सो रहे थे। आग इतनी तेजी से फैली कि उन्हें संभलने या भागने का मौका ही नहीं मिला; कई लोग अंदर ही फंस गए। इस हादसे में बीस लोगों की जान चली गई। इसने एक बार फिर कमर्शियल जगहों पर रहने और काम करने वालों के लिए सुरक्षा नियमों का पालन करने की अहमियत को उजागर किया।
6. स्ट्रैंड रोड: आग बुझाने आए फायरफाइटर वापस नहीं लौटे
9 मार्च 2021 को स्ट्रैंड रोड पर ईस्टर्न रेलवे की न्यू कोयलाघाट बिल्डिंग में भीषण आग लग गई। आग बुझाने के ऑपरेशन के दौरान नौ लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में रेलवे का एक अधिकारी, फायर डिपार्टमेंट के चार कर्मचारी, एक पुलिस अधिकारी और एक RPF जवान शामिल थे। इस घटना ने न केवल बिल्डिंग में आग से सुरक्षा की कमियों को उजागर किया, बल्कि ऊंची इमारतों में बचाव अभियान के दौरान फायर सर्विस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े किए।
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7. मेछुआ होटल: वही सवाल फिर उठा—इस बार 14 मौतें
29 अप्रैल 2025 को मेछुआ के एक होटल में लगी आग ने शहर को फिर से झकझोर दिया। इस घटना में दो बच्चों समेत 14 लोगों की मौत हो गई, जबकि 13 अन्य घायल हो गए। घटना के बाद, मेछुआ और आसपास के इलाकों में चल रहे होटलों की सुरक्षा व्यवस्था और रखरखाव पर सवाल उठाए गए। मामले की जांच के लिए कोलकाता पुलिस की एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई गई।
8. आनंदपुर: 72 घंटे बाद भी मरने वालों की संख्या साफ नहीं
26 जनवरी 2026 को आनंदपुर के नजीराबाद इलाके में मोमो फैक्ट्री के गोदाम में आग लग गई। कुछ ही पलों में आग बगल के गोदामों तक फैल गई। मौके पर अलग-अलग जिलों के मजदूर मौजूद थे; कुछ तो भागने में सफल रहे, लेकिन कई अंदर ही फंस गए। लगभग 72 घंटों तक तलाशी अभियान चलाया गया। इस दौरान कई शवों के अवशेष बरामद किए गए। शुरुआत में 18 लोगों की पहचान की गई, जबकि 27 लोगों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज की गई थी। इस घटना में मरने वालों की कुल संख्या अभी स्पष्ट नहीं है।
न्यू मार्केट में लगी आग ने पुराने सवालों को फिर से खड़ा कर दिया
19 अगस्त, 2026 की देर रात न्यू मार्केट इलाके के एक होटल में लगी आग ने शहर के फायर सेफ्टी सिस्टम पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। इस आग के बाद, न सिर्फ उस होटल बल्कि शहर के दूसरे होटलों और गेस्ट हाउस की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं। क्या होटल में आग बुझाने के जरूरी उपकरण मौजूद थे? क्या इमरजेंसी एग्जिट सुरक्षित और बिना रुकावट के थे? क्या इमरजेंसी के समय लोगों को बाहर निकालने के लिए पर्याप्त इंतजाम थे? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही मिल पाएंगे।

जान-माल के नुकसान को रोकने की बड़ी चुनौती
पिछले दो दशकों में कोलकाता का रिकॉर्ड बताता है कि आग लगने की हर बड़ी घटना के बाद सिस्टम हरकत में तो आता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस हरकत से कोई स्थायी बदलाव आता है? पिछले 20 सालों में कोलकाता में आग लगने की घटनाओं में 200 से ज्यादा लोगों की जान गई है। हर घटना के बाद शहर यही सवाल पूछता है: जो सिस्टम आग लगने के बाद जागता है, वह त्रासदी होने से पहले क्यों नहीं जागता?
हादसे के बाद जांच और कार्रवाई जरूरी है, लेकिन असल फायर सेफ्टी तो पहले से ही शुरू हो जाती है। बिल्डिंग का नियमित निरीक्षण, इमरजेंसी एग्जिट की निगरानी, आग बुझाने के उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करना, इलेक्ट्रिकल सिस्टम की जांच और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ समय पर कार्रवाई—ये ऐसे उपाय हैं जिनसे बड़ी त्रासदियों को रोका जा सकता है।
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