छोटी दीवाली के रूप में प्रसिद्ध है गिरिपार का आठों पर्व, सदियों पुरानी लोक परंपराएं आज भी जीवंत

खबर सार :-

आठों अथवा दुर्गा अष्टमी के दिन से क्षेत्र में दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती है, रविवार तो कुछ जगह सोमवार को आठों पर्व मनाया जाएगा।
सात दिन मनाई जाती है गिरिपार की दीवाली, हाथों में लेकर निकलते हैं हुशू

खबर विस्तार : -

नाहन,  सिरमौर जनपद की सदियों पुरानी लोक संस्कृति व परंपराओं को संजोए रख पाना चुनौती पूर्ण होता है। इसे  अगर स्वीकारा है तो वह है गिरिपार का पहाड़ी क्षेत्र। जब यहां दीपावली आने वाली होती है, तब आठों अथवा दुर्गा अष्टमी के दिन से क्षेत्र में दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती है। इसे दिवाली का पहला पड़ाव कहा जाता है।
यहां का यह मशहूर पारंपरिक अंदाज में मनाया जाने वाला धार्मिक उत्सव है। 

धार्मिक पुस्तकों में इसको अलग तरीके से प्रस्तुत किया गया है। हिंदू पंचांग व ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस बार दुर्गा अष्टमी का शुभ मुहूर्त रविवार को मनाया जाएगा। यह शुभ समय सुबह से सोमवार सुबह तक माना जाएगा। पहाड़ी क्षेत्रों में इसे भराड़ी पूजन व हुशू कहलाने वाली मशालों को जलाकर आठों पर्व के बाद मनाया जाएगा। कुछ गांवों में रविवार तो कुछ जगह सोमवार को आठों पर्व मनाया जाएगा।

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बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है पर्व

गिरिपार में दिवाली व बूढ़ी दिवाली चौदश, अवांस, पोड़ोई, दूज, तीज, चौथ व पंचमी के नाम से सप्ताह भर मनाई जाती है। दुर्गा अष्टमी से लेकर दीवाली तक उत्सव का आनंद पुराने अंदाज में यहीं मिलता है। दुर्गा अष्टमी के दिन मनाए जाने वाले इस त्यौहार को इलाके में छोटी दिवाली के नाम से भी जाना जाता है। दीवाली के एक माह बाद जब अमावस्या आती है, इसको काफी गांवों में बूढ़ी दीवाली मनाकर परंपरा निभाते हैं। यहां का पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है।

आठों अथवा दुर्गा अष्टमी पर क्षेत्र में भराड़ी नामक विशेष जंगली फूल के डमरू बनाए जाते हैं। इससे मां भवानी अथवा गौरा का पूजन किया जाता है। यह फूल सिरमौर के हिमालई अथवा पहाड़ी जंगलों में ही मिलते हैं। सफेद रंग के इन फूलों को काफी पवित्र माना जाता है। इसको पहले से नहीे लाया जाता है। बिना किसी से बात किए, बिना कुछ खाए-पिए सुबह घर का एक सदस्य जंगल से इसको लेकर आता है। इनके डमरू नुमा गुच्छे को पूजा तक रखते हैं। उसके बाद इसे अग्नि या जल में समाप्त करते हैं।

पहाडी क्षेत्रों में महीनों इसकी तैयारी है की जाती  

अष्टमी अथवा आठों के दिन सुबह खिचड़ी बनाई जाती है। इसका भोग लगाकर भराड़ी पूजन किया जाता है।सूर्यास्त होने के बाद बच्चों और कन्याओं को आठों धोरोटी यानी भात व खिचड़ी खिलाते हैं। यह पारम्परिक व्यंजन प्रसाद स्वरूप बांटे जाते हैं। यह विधान पूरा कर लेने के बाद हुशू कहलाने वाली बाबड़ी घास की मशाल बना लेते हैं। इसको जलाकर सिर पर घुमाई जाती है। यह मशालें जलाने के दौरान राजा बलि के जयकारे लगाए जाते हैं। उनको स्वर्गलोक विजेता व दानवीर माना जाता है।

 मशाल लेकर चलने की यहां आवश्यकता बताई जाती है।यह माना जा रहा है कि इस परंपरा में गिरिपार अथवा ग्रेटर सिरमौर में प्रचलित मान्यता के अनुसार इसको सिर पर रखकर चलने से कष्ट मिलते हैं। उन पर आने वाली आपदाएं दूर हो जाती हैं। यही नहीं और भी कारण बताए जाते हैं, इनमें बुरी आत्माओं के साए भी दूर रहते हैं। इसलिए इस परंपरा को आज भी निभाया जा रहा है। सिरमौर के अंतर्गत आने वाले उप मंडल में बहुत सारे इलाके हैं। इन सभी जगह यह पर्व मनाया जाता है।

एक फूल की पूजा में है बड़ी मान्यता 

इसे त्यौहार के रूप में भी मनाते हैं। यह उपमंडलों में संग्रह क्षेत्र में आते हैं।  माना जा रहा है कि इन्हीं परंपराओं व त्यौहारों के साथ विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण क्षेत्र में एकता भी रहती है। भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति सूची में इनको शामिल किया गया है। सिरमौर के अंतर्गत आने वाले उपमंडल संगड़ाह, शिलाई, कफोटा व राजगढ़ आदि की करीब 150 पंचायतों में पारंपरिक अंदाज से आठों अथवा दुर्गा अष्टमी त्यौहार मनाया जाता है।

आंठों के अलावा क्षेत्र में माघी, बूढ़ी दिवाली, दूज, गुगा नवमी व पांजवी आदि त्यौहार भी शेष हिंदुस्तान से अलग अंदाज में मनाए जाते हैं। इन्हीं परंपराओं व त्योहारों तथा विषम भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर गिरिपार के हाटी समुदाय को भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल किया गया है।

यह भी पढ़ें :भोपाल में JAYS प्रदर्शन के दौरान हंगामा, महिला कार्यकर्ता ने कांस्टेबल को थप्पड़ मारा

नाहन,  सिरमौर जनपद की सदियों पुरानी लोक संस्कृति व परंपराओं को संजोए रख पाना चुनौती पूर्ण होता है। इसे  अगर स्वीकारा है तो वह है गिरिपार का पहाड़ी क्षेत्र। जब यहां दीपावली आने वाली होती है, तब आठों अथवा दुर्गा अष्टमी के दिन से क्षेत्र में दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती है। इसे दिवाली का पहला पड़ाव कहा जाता है।
यहां का यह मशहूर पारंपरिक अंदाज में मनाया जाने वाला धार्मिक उत्सव है। 

धार्मिक पुस्तकों में इसको अलग तरीके से प्रस्तुत किया गया है। हिंदू पंचांग व ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस बार दुर्गा अष्टमी का शुभ मुहूर्त रविवार को मनाया जाएगा। यह शुभ समय सुबह से सोमवार सुबह तक माना जाएगा। पहाड़ी क्षेत्रों में इसे भराड़ी पूजन व हुशू कहलाने वाली मशालों को जलाकर आठों पर्व के बाद मनाया जाएगा। कुछ गांवों में रविवार तो कुछ जगह सोमवार को आठों पर्व मनाया जाएगा।

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बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है पर्व

गिरिपार में दिवाली व बूढ़ी दिवाली चौदश, अवांस, पोड़ोई, दूज, तीज, चौथ व पंचमी के नाम से सप्ताह भर मनाई जाती है। दुर्गा अष्टमी से लेकर दीवाली तक उत्सव का आनंद पुराने अंदाज में यहीं मिलता है। दुर्गा अष्टमी के दिन मनाए जाने वाले इस त्यौहार को इलाके में छोटी दिवाली के नाम से भी जाना जाता है। दीवाली के एक माह बाद जब अमावस्या आती है, इसको काफी गांवों में बूढ़ी दीवाली मनाकर परंपरा निभाते हैं। यहां का पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है।

आठों अथवा दुर्गा अष्टमी पर क्षेत्र में भराड़ी नामक विशेष जंगली फूल के डमरू बनाए जाते हैं। इससे मां भवानी अथवा गौरा का पूजन किया जाता है। यह फूल सिरमौर के हिमालई अथवा पहाड़ी जंगलों में ही मिलते हैं। सफेद रंग के इन फूलों को काफी पवित्र माना जाता है। इसको पहले से नहीे लाया जाता है। बिना किसी से बात किए, बिना कुछ खाए-पिए सुबह घर का एक सदस्य जंगल से इसको लेकर आता है। इनके डमरू नुमा गुच्छे को पूजा तक रखते हैं। उसके बाद इसे अग्नि या जल में समाप्त करते हैं।

पहाडी क्षेत्रों में महीनों इसकी तैयारी है की जाती  

अष्टमी अथवा आठों के दिन सुबह खिचड़ी बनाई जाती है। इसका भोग लगाकर भराड़ी पूजन किया जाता है।सूर्यास्त होने के बाद बच्चों और कन्याओं को आठों धोरोटी यानी भात व खिचड़ी खिलाते हैं। यह पारम्परिक व्यंजन प्रसाद स्वरूप बांटे जाते हैं। यह विधान पूरा कर लेने के बाद हुशू कहलाने वाली बाबड़ी घास की मशाल बना लेते हैं। इसको जलाकर सिर पर घुमाई जाती है। यह मशालें जलाने के दौरान राजा बलि के जयकारे लगाए जाते हैं। उनको स्वर्गलोक विजेता व दानवीर माना जाता है।

 मशाल लेकर चलने की यहां आवश्यकता बताई जाती है।यह माना जा रहा है कि इस परंपरा में गिरिपार अथवा ग्रेटर सिरमौर में प्रचलित मान्यता के अनुसार इसको सिर पर रखकर चलने से कष्ट मिलते हैं। उन पर आने वाली आपदाएं दूर हो जाती हैं। यही नहीं और भी कारण बताए जाते हैं, इनमें बुरी आत्माओं के साए भी दूर रहते हैं। इसलिए इस परंपरा को आज भी निभाया जा रहा है। सिरमौर के अंतर्गत आने वाले उप मंडल में बहुत सारे इलाके हैं। इन सभी जगह यह पर्व मनाया जाता है।

एक फूल की पूजा में है बड़ी मान्यता 

इसे त्यौहार के रूप में भी मनाते हैं। यह उपमंडलों में संग्रह क्षेत्र में आते हैं।  माना जा रहा है कि इन्हीं परंपराओं व त्यौहारों के साथ विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण क्षेत्र में एकता भी रहती है। भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति सूची में इनको शामिल किया गया है। सिरमौर के अंतर्गत आने वाले उपमंडल संगड़ाह, शिलाई, कफोटा व राजगढ़ आदि की करीब 150 पंचायतों में पारंपरिक अंदाज से आठों अथवा दुर्गा अष्टमी त्यौहार मनाया जाता है।

आंठों के अलावा क्षेत्र में माघी, बूढ़ी दिवाली, दूज, गुगा नवमी व पांजवी आदि त्यौहार भी शेष हिंदुस्तान से अलग अंदाज में मनाए जाते हैं। इन्हीं परंपराओं व त्योहारों तथा विषम भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर गिरिपार के हाटी समुदाय को भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल किया गया है।

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