जीडीपी आंकड़ों पर सवाल उठाकर चर्चा में आए पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग, मंत्रालय ने दी सफाई
खबर सार :-
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग द्वारा जीडीपी आंकड़ों पर उठाए गए सवालों और सांख्यिकी मंत्रालय के स्पष्टीकरण की विस्तृत रिपोर्ट। जानिए उनके प्रशासनिक सफर और विवादों से जुड़ी पूरी कहानी।
खबर विस्तार : -
New Delhi : हाल ही में देश के आर्थिक विकास को लेकर जारी हुए ताजा आंकड़ों के बाद प्रशासनिक गलियारों से जुड़े एक पुराने अधिकारी की टिप्पणी ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। पिछले महीने की अंतिम तारीख को चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के लिए जीडीपी वृद्धि के आंकड़े सामने आए थे, जिसमें देश की आर्थिक वृद्धि दर 7.8 फीसदी दर्ज की गई। इस प्रदर्शन को वैश्विक चुनौतियों के बीच सकारात्मक माना गया, लेकिन पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के बयानों ने इस पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
गर्ग ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि इस अवधि में महंगाई के प्रभाव को समायोजित करने के बाद नॉमिनल जीडीपी वृद्धि केवल 2.6% के आसपास होनी चाहिए थी और वास्तविक रूप से यह शून्य के करीब थी। उनके इस बयान को सोशल मीडिया पर व्यापक प्रचार मिला, जिसके बाद कई विपक्षी नेताओं और अर्थशास्त्रियों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। इस बढ़ती बहस के बीच सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने छह बिंदुओं का विस्तृत जवाब जारी किया और स्पष्ट किया कि जीडीपी की गणना की प्रक्रिया और आंकड़े पूरी तरह से नियमसंगत और सटीक हैं।
पूर्व अधिकारी का प्रशासनिक सफर और शुरुआती विवाद
सुभाष चंद्र गर्ग राजस्थान कैडर के 1983 बैच के प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं जो वर्ष 2014 में केंद्र सरकार की सेवा में आए थे। शुरुआत में उन्हें विश्व बैंक में कार्यकारी निदेशक नियुक्त किया गया था, जिसके बाद वे जून 2017 में वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग में सचिव बने। वर्ष 2019 के शुरुआती महीनों में उन्हें पदोन्नत कर देश का वित्त सचिव बनाया गया। हालांकि, उनका यह कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं चल सका।
जुलाई 2019 में उनका तबादला ऊर्जा मंत्रालय में कर दिया गया, जिसके ठीक बाद उन्होंने अपनी निर्धारित सेवानिवृत्ति से एक साल पहले ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति यानी वीआरएस के लिए आवेदन कर दिया। उनके सेवाकाल के दौरान केंद्रीय बैंक के साथ नीतिगत मामलों पर गंभीर मतभेद देखने को मिले थे। गर्ग के नेतृत्व में आर्थिक मामलों के विभाग ने केंद्रीय बैंक के आर्थिक पूंजी ढांचे की समीक्षा का मुद्दा उठाया था, जिसके तहत सरकार ने अतिरिक्त पूंजी के उपयोग को लेकर अपनी प्राथमिकताएं रखी थीं। इस प्रक्रिया के दौरान सरकार और केंद्रीय बैंक के शीर्ष अधिकारियों के बीच गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हुई थी, जो बाद में व्यापक चर्चा का विषय बनी।
नीतिगत मतभेद और पुस्तकों में किए गए खुलासे
सेवा से समय से पहले हटने के बाद गर्ग ने अपने अनुभवों और प्रशासनिक कामकाज पर कई किताबें लिखीं और अपने विचार साझा किए। उन्होंने अपने लेखों और पुस्तकों में यह खुलकर जिक्र किया कि आम चुनाव के बाद आर्थिक सुधारों की गति को लेकर उनके और राजनीतिक नेतृत्व के बीच मतभेद थे। उन्होंने तत्कालीन वित्त मंत्री के साथ अपने कामकाजी संबंधों के सहज न होने का भी उल्लेख किया और अपने समय से पूर्व सेवानिवृत्ति के कारणों में इसे एक मुख्य वजह बताया।
इसके अलावा, उन्होंने अपनी पुस्तकों में प्रशासनिक बैठकों के दौरान आए तनावपूर्ण पलों और नीतिगत वार्ताओं का भी विवरण दिया है। उनके इन खुलासों में पूर्व के मुख्य आर्थिक सलाहकारों के शोध और राजकोषीय लक्ष्यों को लेकर मंत्रालय के भीतर चली बैठकों की आंतरिक बातें भी शामिल रहीं। हालांकि, सरकार के भीतर इन सभी मुद्दों पर हमेशा से अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं और अधिकारी स्तर पर लिए गए कई फैसलों पर उस समय भी मिश्रित प्रतिक्रियाएं आई थीं।
चालू वित्त वर्ष के जीडीपी आंकड़े और मौद्रिक नीतियां
चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूत वापसी करते हुए 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की है। इससे पिछली तिमाही और पिछले वर्ष की समान अवधि के आंकड़ों की तुलना में यह प्रदर्शन बेहतर माना गया है। वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव और संघर्षों के असर के बावजूद घरेलू बाजार की यह रफ्तार आर्थिक स्थिति को मजबूत आधार दे रही है। हालांकि, जीडीपी गणना के पैमानों, महंगाई के समायोजन और आंकड़ों के वास्तविक अर्थ को लेकर समय-समय पर विशेषज्ञों और पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों के बीच तकनीकी बहस होती रही है, जिससे नीतिगत निर्णयों पर जनता और बाजार का ध्यान आकर्षित होता रहता है।
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