सीहोर में पशुधन के लिए होती है पूजा-अर्चना, परंपरा के अनुसार लग रहा बारह खंभा मेला

खबर सार :-

हमारे देश में प्रथाओं और परंपराओं की कमी नहीं है। फिल्मों में तो मेला दिलों के लिए लगाते हुए दिखाया जाता है, लेकिन हम ऐसे मेला का जिक्र करने जा रहे हैं जो पशुओं के स्वास्थ्य और उनके संवर्धन के लिए लगाया जाता है। ऐसा मेला मध्य प्रदेश के सीहोर में लगाया जाता है।
मध्यप्रदेश में पशुओं को समर्पित मेला, सीहोर जिला में है लगता बारह खंभा मेला

खबर विस्तार : -

सीहोर, मध्य प्रदेश के सीहोर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर की अनोखी परंपरा का हम जिक्र कर रहे हैं। यहां सालों से लगने वाला बारह खम्बा मेला परंपरा पर आधारित है। यह ऐसा मेला है, जिसमें पशुओं के संवर्धन के लिए पूजा-अर्चना की जाती है। दीपावाली के दूसरे दिन इछावर तहसील के ग्राम देवपुरा में बारह खंबा मेला लगता है। यह यहां का काफी बड़ा और चर्चित मेला है। इसे मध्यक्षेत्र के सबसे बड़े मेला के रूप में जाना जाता है। इसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

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देवशिला पर दूध चढ़ाने को कल्याणकारी बताया

बहुरंगी संस्कृतियों, और परंपराओं के रूप में विख्यात है। हमारे देश में कुछ किलोमीटर के अन्तराल में ही स्थानीय बोली, परिवेश और सांस्कृतिक विविधता के दर्शन हो जाते हैं। देश के तीज, त्योहारों और मेलों का जीवन में एक विशेष महत्व है। हर क्षेत्र में कुछ बदलावा पाया जाता है। यह हमारी जीवंत और समृद्धशाली सांस्कृतिक का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के कल्याण की कामना की जाती है।

दरअसल, बारह खम्बा मेले के बारे में काफी कथाएं हैं। इस क्षेत्र में यह किवदंती प्रचलित है कि गाँव के एक किसान को लगातार पशुधन की हानि हो रही थी। वह पशुओं का शौकीन था, लेकिन उसके पशु लगातार बीमार रहते थे। कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो जाती थी। इससे किसान काफी परेशान रहता था। उसका काफी पैसा बर्बाद हो रहा था। कुछ समय बाद इस किसान को जंगल में एक ग्वाला मिला। ग्वाला ने उस किसान को समझाया। उसने बारह खबे के बीच एक देवशिला का उल्लेख किया। उस देवशिला पर पड़वाँ के दिन दूध चढ़ाने को कल्याणकारी बताया।

हजारों लीटर दूध देवशिला पर है चढाया जाता

उसने ग्वाला की बात पर पहले तो भरोसा नहीं किया, लेकिन बाद में मान ली। यह बात उस किसान ने ग्रामवासियों को बताई। तभी से यहाँ दिपावली के दूसरे दिन यानी पड़वाँ को दूध चढ़ाने की प्रथा शुरू हो गई और मेला लगने लगा। आज भी यह प्रथा निभाई जा रही है। इस बात को क्षेत्रीय जनसम्पर्क अधिकारी देवेन्द्र ओगारे अपने अंदाज में कहते हैं कि मेले में लाखों जनजातीय वर्ग के लोग अपने ईष्ट देव की शिला का दूध से अभिषेक और पूजा अर्चना करने आते हैं। उनका कल्याण होता है। वह अपने पशुधन की स्वास्थ्य और सुरक्षा की कामना करते हैं। उनकी मांग पूरी हो जाती है।

सुबह से शाम तक हजारो लीटर दूध देवशिला पर चढाया जाता है। मान्यता के अनुसार, दुधारू पशु का दूध चढ़ाने से वह साल भर रोगमुक्त रहते हैं। बताया जाता है कि जनजातीय समुदाय के अलावा सभी वर्गों के श्रद्धालु यहां आते हैं। इसमें अनुमान के आधार पर कहा जा सकता है कि दो लाख से अधिक श्रद्धालु आते हैं। यह 12 शिला स्तम्भों से बने छत के नीचे विद्यमान थी। इसीलिए इस स्थान का नाम बारह खंबा पड़ गया। वर्तमान में देवपुरा गाँव बारह खंबा के नाम से ही जाना जाता। बारह खंबा मेला इछावर में प्राचीन काल से ही लगता आ रहा है। यह स्थान इछावर से 15 किमी दूर है। देवपुरा गाँव में जनजातीय समुदाय के आराध्य देव से संबंधित शिला यहीं पर है। इसे बारह खंबा वाले देव महाराज के नाम से जाना जाता है। 

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