मेदिनीपुर में 400 साल पुरानी परंपरा, दीवार पर उकेरी गई मां काली की होती है पूजा

खबर सार :-

पूजा समिति के कोषाध्यक्ष सुमनजीत दे ने बताया कि इस पूजा को लेकर इलाके के लोगों में काफी उत्साह रहता है। मंदिर के पुजारी श्यामल भट्टाचार्य पिछले करीब 30 वर्षों से यहां पूजा कर रहे हैं।
मेदिनीपुर में सदियों से निभा रहे पूजा की परंपरा, मां काली की होती है पूजा

खबर विस्तार : -

मेदिनीपुर, पश्चिम मेदिनीपुर जिले के मेदनीपुर शहर में मां काली का एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जहां सदियों से परंपरा निभाई जा रही है। शहर के मीरबाजार स्थित श्रीश्री कांथ काली मंदिर में करीब 400 से 450 वर्षों से दीवार पर उकेरी गई मां काली की आकृति की पूजा होती आ रही है। 

जानकारी के अनुसार, मां काली की आकृति उकेर कर उसकी पूजा की जाती है। यहां न तो नई प्रतिमा बनाई जाती है और ना ही किसी प्रकार से विसर्जन की परंपरा को निभाया जाता है। लोगों का कहना है कि कई पीढियों से इस परंपरा को निभाया जा रहा है। इसी आकृति की पूजा कर लोग अपनी मन्नतें भी मांगते हैं। इसी विशेषता के कारण देवी को काली के नाम से पुकारा जाता है।  इस मंदिर की सबसे ज्यादा खासियत है कि यहां मिट्टी की प्रतिमा भी नहीं बनाई जाती है। इसके स्थान पर मंदिर में किसी प्रकार की वस्तुएं लगाकर मूर्ति बनाने की परंपरा भी नहीं है। केवल आकृति की ही पूजा होती है।

मां काली की आकृति की है पूजा होती 

डायमंड हार्बर के नुनगोला क्षेत्र के निवासी नंदगोपाल मुखोपाध्याय को एक बार स्वप्न में मां काली ने दर्शन देकर मेदिनीपुर के मीरबाजार में अपने स्थान के बारे में बताया था।  इसके बाद इस स्थान पर लोग गए और वहां पर काफी तलाश करने के बाद वह स्थान भी मिला, जहां दीवार एक पीपल के पेड़ के नीचे स्थित है। लोगों ने अपनी साधना के अनुसार वहां पूजा पाठ शुरू कर दिया। बताया जाता है कि यहां पर एक पुरानी और जर्जर दीवार भी पाई गई थी। विश्वास है कि नंद गोपाल मुखोपाध्याय ने उस दीवार को खोज कर स्वास्तिक चिन्ह और मां काली के हाथ में रहने वाले हथियार के निशान देखे। 

इसके बाद वहां मंदिर का रूप दिया जाने लगा। मंदिर प्रबंधन ने भी बताया कि आज की दीवार पर निशानों का महत्व होता है। दीवार पर मां काली की आकृति उकेर कर उसकी नियमित पूजा की जाने लगी है। यह परंपरा बरसों से निभाई जा रही है। इसमें किसी प्रकार की लापरवाही या चूक नहीं होती है। मंदिर की एक और खास बात यह है कि यहां कभी प्रतिमा नहीं बनाई जाती है।  स्थानीय लोगों का कहना है कि यह देवी की आकृति में बदलाव भी नहीं किया गया। मंदिर की मूल दीवार को भी ठीक पहले जैसे ही सुरक्षित रखा गया है।  केवल काली मूर्ति की पहले दीवार और देवी की आकृति पर नए रंगों का ही इस्तेमाल कर आधुनिकता देने की कोशिश की जाती है। जैसे सभी मंदिरों में पूजा पाठ और हवन भोग आदि की परंपरा है, वैसे ही यहां भी भोग लगाया जाता है। 

अनाज को प्रसाद के रूप में है बांटा जाता 

करीब दो क्विंटल चावल और दाल से भोग तैयार किया जाता है। उसे पूजा के बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद के स्वरूप बांट दिया जाता है । आस्था के अनुसार लोग सुबह ही मंदिर में पूजा करने के लिए पहुंच जाते हैं। शहर के अलावा आसपास के क्षेत्र से भी यहां दर्शन करने के लिए लोग पहुंचते हैं। इस बार काली मां की पूजा को लेकर बाजार इलाके में हमेशा की तरह तैयारी की गई है। स्थानीय लोगों ने यहां सजावट करने के लिए देवी मां की आकृति का रंगरौगन किया है। उसके बाद पूजा का सिलसिला शुरू है। देवी की आकृति के पास एक पंडाल बनाया गया है। इसमें नीचे लोग बैठते हैं। यहां पर रंग बिरंगी झालर लगाकर परिसर को जगमग किया गया है। वैसे भी दिवाली की त्यौहार के दौरान रोशनी का अद्भुत आनंद उठाने के लिए लोग व्याकुल रहते हैं। पूजा के लिए एक समिति भी बनाई गई है और इस समिति के कोषाध्यक्ष सुमन जीत दे हैं।

हजारों की संख्या में आते हैं श्रद्धालु

 उन्होंने बताया कि पूजा को लेकर इलाके में लोगों का काफी उत्साह रहता है। यहां बड़ी संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं और पूजा के अवसर पर धार्मिक आयोजनों के साथ सामाजिक कार्यक्रम में भी हिस्सा लेते हैं। इसके अलावा सांस्कृतिक समारोह का भी आयोजन किया जाता है। इसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी होती है। मंदिर में पुजारी श्यामल भट्टाचार्य हैं। पिछले करीब 30 सालों से वह यहां नियमित पूजा का कार्यक्रम संभालते हैं। पुजारी भट्टाचार्य ने बताया कि श्रद्धालुओं की मां के प्रति गहरी आस्था है। भक्तों का विश्वास है की मां उनकी मनोकामना पूरी करती हैं और इसीलिए हजारों की संख्या में लोग यहां पर एकत्रित होते हैं। 

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