पीलीभीत: उत्तर प्रदेश के तराई बेल्ट में किसानों का गुस्सा एक बार फिर सातवें आसमान पर है। मंगलवार को पीलीभीत की सदर तहसील का प्रांगण नारों और तल्ख भाषणों से उस वक्त गूंज उठा, जब भारतीय किसान यूनियन (भानु) के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने अपनी मासिक पंचायत का शंखनाद किया। यह पंचायत केवल एक औपचारिक बैठक नहीं थी, बल्कि प्रशासन की कार्यशैली के खिलाफ एक खुला मोर्चा था। 17 फरवरी 2026 को आयोजित इस पंचायत में किसानों ने दो-टूक शब्दों में चेतावनी दी कि यदि उनकी जायज मांगों पर जल्द अमल नहीं हुआ, तो 'खेत से खलिहान तक' आंदोलन की आग फैलेगी।
मंगलवार की दोपहर, जब सूरज अपनी तपिश बढ़ा रहा था, पीलीभीत सदर तहसील के प्रांगण में किसानों की भीड़ जुटने लगी। जिला अध्यक्ष भजनलाल 'क्रोधी' की अध्यक्षता में आयोजित इस पंचायत में तहसील प्रशासन की चूल्हें हिलाने वाली भाषा का प्रयोग किया गया। पंचायत के समापन पर किसानों ने उप जिलाधिकारी (SDM) सदर के नाम एक 6 सूत्रीय ज्ञापन तहसीलदार को सौंपा। इस ज्ञापन में उन बुनियादी समस्याओं को उठाया गया है, जिनसे आम ग्रामीण और किसान पिछले कई महीनों से त्रस्त हैं।
पंचायत को संबोधित करते हुए जिला अध्यक्ष भजनलाल 'क्रोधी' का गुस्सा सातवें आसमान पर दिखा। उन्होंने रूपपुर कृपा गांव में स्थित एक तेजाब (एसिड) फैक्ट्री का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। भजनलाल ने कहा, "यह फैक्ट्री आबादी के बीचों-बीच किसी टाइम बम की तरह है। इसकी विषैली गैसों से गांव के लोग बीमार पड़ रहे हैं, और चौंकाने वाली बात यह है कि यहां हार्ट अटैक और सांस की गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं।"
उन्होंने प्रशासन पर सांठगांठ का आरोप लगाते हुए कहा कि बार-बार शिकायत के बावजूद इस फैक्ट्री पर कोई अंकुश नहीं लगाया गया है। संगठन की मांग है कि इस फैक्ट्री को तत्काल आबादी क्षेत्र से बाहर स्थानांतरित किया जाए, वरना किसान खुद फैक्ट्री के गेट पर ताला जड़ने को मजबूर होंगे।
तहसील अध्यक्ष नंदकिशोर राठौर ने पीलीभीत के राजस्व विभाग पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि तहसील में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। राठौर ने कहा, "पीलीभीत का राजस्व प्रशासन फर्जी जाँच आख्या लगाने में माहिर हो चुका है। अधिकारी दफ्तर में बैठकर रिपोर्ट तैयार कर देते हैं, जिससे धरातल पर आपसी रंजिशें और मुकदमेबाजी बढ़ रही है।"
किसानों का तर्क है कि लेखपालों और कानूनों द्वारा दी जाने वाली गलत रिपोर्ट के कारण ग्रामीण इलाकों में विवाद सुलझने के बजाय और उलझ रहे हैं, जिसका सीधा आर्थिक बोझ गरीब किसानों की जेब पर पड़ रहा है। इतना ही नहीं, उन्होंने तहसील परिसर की बदहाली पर भी सवाल उठाए, जहां गंदगी और पेयजल की भारी किल्लत है।
विकास विभाग की सुस्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ग्राम पंचायत मीरपुर में एक नाली की पुलिया का मामला पिछले सात-आठ महीनों से अधर में लटका है। किसानों ने बताया कि जुलाई 2025 से वे जिलाधिकारी और उप जिलाधिकारी के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन ललौरी खेड़ा विकास खंड के अधिकारियों का रवैया 'टालू' बना हुआ है। 'गोलमोल' जांच और फाइलों के इधर-उधर घूमने से विकास कार्य ठप पड़े हैं।
जिला उपाध्यक्ष बाबू राम वर्मा ने ललौरी खेड़ा रेलवे स्टेशन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पूर्व में इसे 'हल्ट' बना दिया गया था, जिससे यात्रियों को भारी असुविधा हो रही है। उन्होंने इसे पुन: पूर्ण रेलवे स्टेशन का दर्जा देने की मांग की। वर्मा ने स्टेशन तक जाने वाले मार्ग की दुर्दशा बयां करते हुए कहा कि गांव से स्टेशन तक का रास्ता गहरे गड्ढों और कीचड़ में तब्दील हो चुका है। राहगीरों और यात्रियों का वहां से गुजरना किसी जंग जीतने जैसा है।
जिला सचिव डालचंद मौर्य ने तराई की सबसे बड़ी समस्या 'आवारा पशुओं' पर प्रशासन को घेरा। उन्होंने कहा कि पीलीभीत की हर ग्राम पंचायत में छुट्टा पशु फसलों को तबाह कर रहे हैं। रात-रात भर जागकर किसान अपनी फसल की रखवाली कर रहे हैं, फिर भी नुकसान कम नहीं हो रहा। उन्होंने मांग की कि तत्काल प्रभाव से इन पशुओं को पकड़कर गौशालाओं में भेजा जाए।
इस पंचायत में न केवल पुरुष कार्यकर्ता, बल्कि बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हुईं। चमेली देवी, कलावती, मोहन देवी और गीता रानी जैसी महिला नेत्रियां मंच के सामने डटी रहीं। इसके अलावा जिला मीडिया प्रभारी धर्मेंद्र कुमार गुप्ता, बाल मुकांड प्रजापति, रघुवर सिंह प्रजापति, दौलत सिंह प्रजापति, वीरेंद्र गिरी, सुरेश कुमार, ओंकार, कल्याण सिंह, ओम प्रकाश, सोहनलाल, बेणीराम, सुखलाल गंगवार, मदनलाल शर्मा, निसार शाह, सियाराम गंगवार और रामचंद्र राजपूत सहित सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने हुंकार भरी।
भारतीय किसान यूनियन (भानु) की यह मासिक पंचायत इस बात का संकेत है कि पीलीभीत में प्रशासन और जनता के बीच 'संवादहीनता' की खाई गहरी हो गई है। जब मामूली शिकायतों का निस्तारण महीनों तक नहीं होता, तो जनता का आक्रोश सड़कों पर आता है। अब गेंद प्रशासन के पाले में है, क्या वे इन 6 सूत्रीय मांगों पर ठोस कार्रवाई करेंगे या फिर पीलीभीत में एक बड़े जन-आंदोलन की पटकथा लिखी जाएगी?
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