लखनऊ: सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (मोर्थ) ने एक मई से यूपी में वाहनों की फिटनेस ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन (एटीएस) से कराना अनिवार्य कर दिया है। मोर्थ के आदेश के चलते ट्रांसपोर्टनगर स्थित आईएंडसी (इंस्पेक्शन एंड सर्टिफिकेशन सेंटर) में करीब 15 दिनों तक वाहनों की फिटनेस बंद रही। 14 मई बुधवार से आईएंडसी सेंटर में पुरानी व्यवस्था के तहत वाहनों की फिटनेस शुरू हुई। यही नहीं झांसी में बने एटीएस को भी आईएंडसी सेंटर की तर्ज पर चालू किया गया है।
ऐसे में अब मोर्थ की ओर से एटीएस को लेकर जारी की गई गाइड लाइन ही सवालों के घेरे में आ गई है। अब पुरानी व्यवस्था के तहत आईएंडसी सेंटर शुरू हो जाने के बाद संचालनकर्ता कम्पनी को अभयदान मिल गया है। जानकारी के अनुसार टीपीनगर स्थित आईएंडसी सेंटर का संचालन श्री हरि फीलिंग कर रही है। उक्त कम्पनी को आईएंडसी संचालन के बदले परिवहन विभाग की ओर से 89,588 रुपए का भुगतान प्रतिमाह किया जाता है।
परिवहन विभाग को हर माह वाहनों की फिटनेस फीस के रूप में 35 से 40 लाख रुपए का राजस्व मिल रहा है। एटीएस की गाइड लाइन के तहत किसी कम्पनी को आईएंडसी सेंटर के संचालन की कमान सौंपी जाती है और फिटनेस फीस का पैसा उक्त कम्पनी को दिया जाता है तो विभाग निर्धारित किराया लेकर संचालन की जिम्मेदारी उक्त कम्पनी को दे सकता है।
जानकारों की मानें तो विभाग ने आईएंडसी सेंटर के संचालन के लिए कम्पनी रखने की व्यवस्था ही गलत बनायी हुई है। जब मशीनें खुद की थीं तो संचालन भी विभाग खुद कर सकता था, लेकिन निजी स्वार्थ के चलते इस व्यवस्था का निर्धारण किया गया। पहले बिना टेंडर के लाभ पहुंचाया गया और अब टेंडर देकर लाभ पहुंचाया जा रहा है।
टीपीनगर स्थित आईएंडसी सेंटर का टेंडर हासिल करने वाली कम्पनी श्री हरि फीलिंग ने कई बाउंसर लगा रखे हैं। जहां मशीनें लगी हैं, वहां इंट्री और एग्जिट प्वाइंट पर बाउंसर शुरू से ही लगे हुए हैं और वहां पर किसी को जाने नहीं देते हैं। उक्त कम्पनी की ओर से जब से संचालन शुरू किया गया तब से लेकर आज तक बाउंसर लगाए जाने की व्यवस्था सवालों के घेरे में है।
वहीं कम्पनी को कम रेट पर टेंडर देने का सवाल उठा तो विभाग द्वारा यह कहकर बचाव किया गया कि कम्पनी अनुभव प्राप्त करना चाहती है, इसलिए कम रेट में टेंडर फाइनल किया गया। अब कम्पनी बाउंसर रखकर कौन सा अनुभव प्राप्त कर रही है, यह खुद में बड़ा सवाल है। पूर्व के विभागीय मुखिया द्वारा कम्पनी के बाउंसर रखने को सही भी ठहराया और उसकी आड़ में की जा रही बंदरबांट पर पर्दा डालने के भी भरसक प्रयास किए और इस काम में लगभग कामयाब भी रहे।
आईएंडसी सेंटर के बिजली बिल का हर माह खर्च ही करीब 80 हजार रुपए है। इसमें बिजली बिल के साथ जनरेटर चलने का खर्च भी शामिल है। ऐसे में विभाग से 90 हजार रुपए के करीब प्राप्त करने वाली कम्पनी ने कैसे सेंटर संचालित कर लिया। सेंटर पर आधा दर्जन की संख्या में बाउंसर व गार्ड के अलावा मशीन चलाने के लिए कर्मचारी, सुपरवाइजर, कम्प्यूटर ऑपरेटर भी रखे गए हैं। बाउंसर, गार्ड से लेकर सुपरवाइजर और अन्य कर्मचारियों के वेतन का पैसा कम्पनी कहां से ला रही है, यह किसी से छिपा नहीं है।
ऐसा भी नहीं है कि आईएंडसी सेंटर पर वाहनों की फिटनेस के बदले हो रही वसूली की शिकायत नहीं हुई। शिकायतें भी हुईं और इसकी जांच भी कराई गई, मगर हमाम में सब नंगे की कहावत हर बार चरितार्थ होती रही। शिकायतों को धता बताते हुए क्लीन चिट दी जाती रही और लूट-खसोट का खेल लगातार जारी रहा। अब आईएंडसी सेंटर पर फिर से लागू की गई पुरानी व्यवस्था में लूट-खसोट का खेल बेरोकटोक चलेगा।
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