Mobile Gaming Addiction: 21वीं सदी तकनीक की सदी मानी जा रही है। इस युग में नई पीढ़ी के बच्चों में मोबाइल से लेकर एआई आधारित गेमिंग के प्रति दीवानगी बढ़ती जा रही है। आज के दौर का बच्चा खिलौनों से पहले मोबाइल फोन से परिचित हो जाता है। डिजिटल तकनीक ने जहां शिक्षा और जानकारी को आसान बनाया है, वहीं अत्यधिक स्क्रीन टाइम और मोबाइल गेमिंग बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। हाल के वर्षों में बच्चों में गेमिंग की लत एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरी है, जिसने कई परिवारों की चिंता बढ़ा दी है।
हम बच्चों को शुरुआत में रोने पर चुप कराने या उसका ध्यान भटकाने के लिए देते हैं। यह मोबाइल और गेम शुरुआत में बच्चों के लिए मनोरंजन का साधन होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह आदत लत में बदल जाती है। घंटों मोबाइल पर गेम खेलना बच्चों की पढ़ाई, नींद, खान-पान और पारिवारिक संवाद को प्रभावित करता है। केजीएमयू के मनोचिकित्सक डॉ. कन्नेकंटी के अनुसार, अत्यधिक गेमिंग बच्चों के दिमाग में डोपामाइन हार्मोन के असंतुलन का कारण बनती है, जिससे वे वास्तविक जीवन की खुशियों में रुचि खोने लगते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं। यदि अभिभावक खुद हर समय मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, तो बच्चों से संयम की अपेक्षा करना व्यर्थ है। घर में कुछ स्थानों को ‘नो फोन जोन’ घोषित करें, जैसे भोजन की मेज या पारिवारिक बैठक। यह आदत बच्चों में संतुलित डिजिटल व्यवहार विकसित करती है।
डॉ. कन्नेकंटी के अनुसार, बच्चों को गेमिंग की लत से छुटकारा दिलाना बहुत बड़ा चैलेंज होता है। इसलिए उन्हें बहुत ही सावधानी से हैंडल करना चाहिए। अचानक मोबाइल या गेम पर पूरी तरह रोक लगाने से बच्चे चिड़चिड़े और विद्रोही हो सकते हैं। बेहतर है कि उनके साथ मिलकर एक स्पष्ट समय-सारिणी बनाई जाए। बच्चों के लिए नियम तय करें-पहले पढ़ाई, होमवर्क और आउटडोर खेल, उसके बाद सीमित समय (30–45 मिनट) गेमिंग। इससे बच्चों में अनुशासन आता है और वे गेमिंग को अधिकार नहीं, बल्कि इनाम की तरह देखते हैं।

बोरियत बच्चों को स्क्रीन की ओर खींचती है। उन्हें खेल, डांस, संगीत, चित्रकला या किसी रचनात्मक गतिविधि से जोड़ना बेहद जरूरी है। शारीरिक गतिविधियों से न केवल शरीर स्वस्थ रहता है, बल्कि प्राकृतिक रूप से खुशी देने वाले हार्मोन सक्रिय होते हैं, जिससे डिजिटल गेमिंग की चाह कम होती है।
डॉक्टर के अनुसार, हर गेम नुकसानदेह नहीं होता, लेकिन कई गेम हिंसक और अत्यधिक लत लगाने वाले होते हैं। इसलिए मोबाइल में पैरेंटल कंट्रोल सेटिंग्स का उपयोग करें। इसके अलावा गेम की एज रेटिंग (PEGI) भी जरूर जांचें। इससे बच्चे उम्र के अनुसार सुरक्षित और सीमित कंटेंट तक ही पहुंच पाते हैं।
अक्सर बच्चे कमरे में अकेले बैठकर गेम खेलते हैं, जिससे वे समाज से कटने लगते हैं। नियम बनाएं कि गेम केवल कॉमन एरिया में खेले जाएं। इससे माता-पिता बच्चों की गतिविधियों पर नजर भी रख सकते हैं और उनके साथ संवाद भी बना रहता है। जब अभिभावक रुचि दिखाते हैं, तो बच्चे खुलकर बात करते हैं।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि सोने से पहले मोबाइल की नीली रोशनी बच्चों की नींद को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। इसलिए कुछ जरूरी नियम बनाएं-सोने से कम से कम एक घंटा पहले सभी गैजेट बंद हों। खाना खाते समय मोबाइल या टीवी पूरी तरह वर्जित हो। यह आदत बच्चों के मानसिक संतुलन के लिए बेहद जरूरी है।
कई बच्चे तनाव, अकेलेपन या असुरक्षा से बचने के लिए आभासी दुनिया में शरण लेते हैं। माता-पिता रोज कम से कम 20 मिनट बच्चों के साथ बिना किसी स्क्रीन के बिताएं। उनकी बातें सुनें, भावनाओं को समझें। जब बच्चा भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस करता है, तो उसे गेमिंग की लत नहीं लगती।

उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. बबीता सिंह चौहान ने बच्चों में बढ़ती डिजिटल लत को गंभीर सामाजिक संकट बताया है। गाजियाबाद में तीन सगी बहनों द्वारा आत्महत्या की हृदयविदारक घटना के बाद आयोग ने सभी जिलाधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं।
प्राथमिक जांच में सामने आया है कि बच्चियों द्वारा आत्महत्या के पीछे मोबाइल गेम की लत और उस पर पिता द्वारा लगाई गई रोक एक बड़ा कारण रही। डॉ. चौहान ने इसे केवल पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि समाज और शिक्षा व्यवस्था के लिए चेतावनी बताया।

दरअसल, कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षा अनिवार्य थी, लेकिन सामान्य हालात लौटने के बाद भी कई स्कूल व्हाट्सएप और डिजिटल माध्यमों से ही होमवर्क भेज रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि छोटे बच्चों के हाथों में हर समय मोबाइल रहने लगा है।
महिला आयोग ने निर्देश दिया है कि कक्षा 5 तक के स्कूलों में, विशेष परिस्थितियों को छोड़कर, मोबाइल के माध्यम से होमवर्क और असाइनमेंट भेजने पर तत्काल रोक लगाई जाए। बच्चों को ऐसा कार्य दिया जाए, जिसे बिना मोबाइल के पूरा किया जा सके। डॉ. बबीता सिंह चौहान ने स्पष्ट कहा कि शिक्षा के नाम पर किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। प्रशासन, विद्यालय और अभिभावकों को मिलकर डिजिटल अनुशासन लागू करना होगा, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
अन्य प्रमुख खबरें
Genetic test for cancer treatment: कैंसर से डरे नहीं, जेनेटिक टेस्ट से इलाज संभव
सुबह जल्दी उठना सेहत का राज या कुछ और, जानें असली कारण
Mother’s Day special: 2026 में कब है मदर्स डे?, क्या है हर साल डेट बदलने का कारण
आपके एसी से टपकता है पानी तो न हों परेशान, इन टिप्स को अपनाकर बनाएं यूजफुल
Summer tips: टेबल फैन को इन जगहों पर रखें, घर बन जाएगा एसी रूम
ऑडिशन ने दिलाई पहचान, जिम्मेदारी तले कहां दब गया DID का ये कंटेस्टेंट
Summer health tip:गर्मियों में आपके बोतल से आती है दुर्गंध अपनाएं ये घरेलु नुस्खे
Health tips for tea lover: अगर आप भी हैं टी-लवर तो जान लें, इसे पीने का सही समय
गर्मियों में ले रहें पेनकिलर हो जाइए सावधान, किडनी के लिए बड़ा खतरा
40 के बाद महिलाओं में ये बड़े बदलाव, छोटी सी चूक पड़ सकती है भारी
आप भी हैं ओवरथिंकिंग के शिकार, समय रहते जानें इसका कारण
चिलचिलाती धूप में आपके पेट का ये हाल, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलती
स्टाइलिश और कूल लुक के लिए 8 बेस्ट कॉटन कुर्ता, बजट सिर्फ 799