Amit kumar Jha
अमित झा
इन दिनों जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी घटना ने देश-दुनिया का ध्यान इधर खींच रखा है। दो दर्जन से अधिक पर्यटकों को गोली मार कर उनकी जान ले ली गयी। आतंकियों ने गोली मारने से पहले उनके धर्म को लेकर सवाल किया था। इस आतंकी हमले पर पूरा देश क्षुब्ध है। अब सोशल मीडिया से लेकर बहुसंख्यक लोगों के बीच इस्लामिक आतंकवाद को लेकर खूब बातें हो रही हैं। लोग खुलकर कहने से नहीं चुक रहे कि आंतंकवाद का एक ही मजहब है- इस्लामिक आतंकवाद। गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे ने तो पहलगाम की घटना के बाद तंज कसते कहा भी कि अब वे अपनी हिफाजत के लिए कलमा पढना सीखेंगे। खैर, इस घटना के बाद आलम यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि जो घटना हुई है, उसके लिए दोषियों को मिट्टी में मिला दिया जायेगा। इन सबके बीच एक सवाल फिर से खड़ा हो गया है कि आखिर दुनियाभर में सनातनी समाज और उसकी विरासत पर कब तक हमले होते रहेंगे। उसकी उदारता, सहिष्णुता की परीक्षा कब तक ली जायेगी।
पहलगाम में हिन्दुओं को निशाना बना कर किया गया हमला इकलौता नहीं है। इससे पहले भी कश्मीर की धरती हिन्दुओं के खून से लहूलुहान होती रही है। हाल के समय में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों पर हुआ हमला सबसे बड़ा हमला है। इससे पहले भी घाटी में पर्यटकों को निशाना बनाकर भय का माहौल बनाने की कोशिश हुई है। इससे ठीक पहले जून 2024 में 09 पर्यटक मारे गये थे। रियासी हमला उदाहरण है। वर्ष 2000 में 1-2 अगस्त को अनंतनाग में 121 पर्यटक मारे गये थे। 20 दुलाई 2001 को 13, 04 जुलाई 1995 को पहलगाम में एक, 14 नवंबर 2005 में लाल चौक के पास 6 लोग मारे गये थे। इसके अलावे भी आतंकी हमलों की लंबी फेहरिस्त है। एक मिनट के लिए कश्मीर को संवेदनशील राज्य मानकर छोड़ भी दें तो पश्चिम बंगाल को देख लें। वहां मुर्शिदाबाद जिले में पिछले ही दिनों वक्फ कानून के विरोध में दंगे हुए। कट्टरपंथियों ने पुलिस प्रशासन को धता बता दिया। तोड़फोड़, आगजनी की। तीन लोग मारे भी गये। सरस्वती पूजा, दुर्गा पूजा, रामनवमी और ऐसे ही अन्य मौकों पर इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा फैलायी जाने वाली अराजकता की खबरें आम होती जा रही हैं।
पड़ोसी देश बांग्लादेश, पाकिस्तान में भी हिन्दुओं और अल्पसंख्यकों का हाल किसी से छिपा नहीं है। मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली सरकार में बांग्लादेश में कट्टरपंथियों के निशाने पर हिंदू लगातार दिख रहे हैं। इस देश में अब तक 100 से अधिक लोगों की मौत होने की खबर है। अब भी लगातार वहां कट्टरपंथी हिंदुओं और मंदिरों पर हमले कर रहे हैं। इस्कान और काली मंदिरों सहित हिंदुओं के घरों को भी निशाना बनाये जाने की सूचना आती रही है। भारत ने एडवाइजरी कर लोगों को यात्रा से बचने को कहा है। शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद बांग्लादेश में उपद्रवी हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते दिख रहे हैं। देश में 01 करोड़ 31 लाख के करीब हिंदू हैं। देश में जारी अनिश्चितता और अराजकता के बीच वहां के करीब 27 जिलों में हिंदुओं और अल्पसंख्यकों को टारगेट किया जा रहा है। पंचगढ़, दिनाजपुर, बोगुरा, रंगपुर, शेरपुर किशोरगंज, पश्चिम जसेर जैसे जिलों समेत अन्य जिलों में उनके घरों और दुकान को आग के हवाले किया जा रहा है। संपत्तियों को लूटा जा रहा है। हालात इतने खराब हो गए हैं कि वहां रहने वाले करीब 07 प्रतिशत हिंदू इन दिनों खौफ के साये में हैं। वैसे तो बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले कोई नई बात नहीं हैं। पहले भी उन्हें निशाना बनाया जाता रहा है। बांग्लादेश मामले पर भारत सरकार चिंता जता चुकी है। विदेश मंत्री जयशंकर के मुताबिक पड़ोसी देश की स्थिति चिंताजनक है। भारत सरकार वहां के मौजूदा तंत्र के साथ संपर्क में है।
मार्च 2025 में अमेरिका के चिनो हिल्स (कैलिफोर्निया) स्थित एक हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ हुई। दीवारों पर भद्दे कमेंट लिखे जाने का मामला सामने आया। इसके पहले भी हिंदू मंदिरों को निशाना बनाए जाने की खबरें आती रही हैं। 03 अगस्त और 16 अगस्त 2022 को क्वींस न्यूयॉर्क में श्री तुलसी मंदिर, 30 अक्टूबर 2023 को सैक्रामेंटो में हरि ओम राधा कृष्ण मंदिर, 23 दिसंबर 2023 को कैलिफोर्निया में एसएमवीएस श्री स्वामीनारायण मंदिर, 1 जनवरी 2024 को सांता क्लारा, कैलिफोर्निया में शिव दुर्गा मंदिर सहित कई अन्य मंदिरों में अलग-अलग तारीख में तोड़-फोड हुए। चोरी की गयी। कई बार खालिस्तानी नारे और भारत विरोधी नारे भी लिखे गये। नवंबर 2024 में कनाडा में दो मंदिरों में हंगामा हुआ। हाथापाई भी हुई। टोरंटो के ब्रैम्पटन में हिंदू सभा के मंदिर कैंपस में घुसकर मारपीट की गयी। बैंकूवर के सर्रे में हिंदू मंदिर के बाहर भी बवाल हुआ। हमला और हाथापाई करने का आरोप खालिस्तानी लोगों पर लगा। इन लोगों की भीड़ पीले रंग के खालिस्तानी झंडे लेकर मंदिर परिसर में घुसी। झंडे के डंडों से मंदिर परिसर में मौजूद लोगों पर हमला किया। हालांकि, इसके पीछे सबसे बड़ा कारण राजनीतिक साजिश बताया गया। कनाडा की ट्रूडो सरकार की भूमिका को लेकर भी सवाल उठा था। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में जनवरी 2023 में तीन हिंदू मंदिरों पर भारत विरोधी और खालिस्तान समर्थक नारे लिखे जाने का मामला सामने आया था। 12 जनवरी को स्वामीनारायण मंदिर पर पेंटिंग को नुकसान पहुंचाया गया था। 17 जनवरी को शिव विष्णु मंदिर में तोड़फोड़ की गयी। 23 जनवरी को हरे कृष्णा मंदिर पर हमला किया गया। इसके बाद वहां हिंदू समुदाय सकते में आ गया था।
पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेटर दानिश कनेरिया ने पहलगाम आतंकी हमले पर प्रतिक्रिया दी है। कहा कि आज बांग्लादेश, बंगाल से लेकर कश्मीर तक हिंदू निशाने पर हैं। अपने एक्स पर लिखा था कि पहलगाम में एक और बर्बर हमला हुआ है। बांग्लादेश से बंगाल और कश्मीर तक, एक ही मानसिकता हिंदुओं को निशाना बना रही है लेकिन जो लोग धर्मनिरपेक्ष हैं और न्यायपालिका में भरोसा रखते हैं, वो इन कायर हमलावरों को उत्पीड़ित अल्पसंख्यक मानते हैं। जिन लोगों के परिवार को भी इस हमले में क्षति हुई है, उन्हें न्याय मिलना चाहिये। पहलगाम की आतंकी घटना के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने कड़ी नाराजगी जाहिर की थी। आरोप लगाते कहा था कि कश्मीर, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश-तीनों जगहों पर हिंदुओं को ही निशाना बनाया जा रहा है। पहलगाम की घाटी में न कोई बंगाली मारा गया ना ओडिया, मराठी, कन्नड़, हरियाणवी, तमिल या मलयाली। मारे गये तो हिंदू। चाहे वह कश्मीर हो, पश्चिम बंगाल हो या बांग्लादेश-मकसद एक ही है, हिंदुओं को मिटाना। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में हाल की सांप्रदायिक घटनाओं और बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए हमलों का हवाला देते उन्होंने कहा कि जब अतिवादी ताकतें हिंदुओं के बीच कोई भेदभाव नहीं करतीं तो फिर हिंदू जाति, भाषा, क्षेत्र, भाषा, खान-पान, विचारधारा और रीति-रिवाज के नाम पर क्यों बंट रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो आतंकवादियों का मुख्य मकसद भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक एकता को चोट पहुंचाना है। हिंदू धर्म की बहुलता, सहिष़्णुता और शांति का प्रतीक है। इसे चोट पहुंचाकर भारत को आंतरिक तौर पर अस्थिर करना आतंकी संगठनों का उद्देश्य रहता है। बार-बार हिन्दू यात्रियों, मंदिरों और धार्मिक स्थलों को टारगेट करना एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा लगता है ताकि समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा किया जा सके।
हिन्दू धर्म एवं इसके प्रतीकों का लगातार अपमान होता दिखता रहा है। अपने देश में ही हिन्दू धर्म को लेकर हर क्षेत्र में प्रयोग किये गये हैं। चाहे वह फिल्मों का हो या धारावाहिक हो, साहित्य हो या विज्ञापन। अधिकांश को लगता है कि हिन्दू धर्म पर कुछ भी बोला जा सकता है। इसके उदार होने की आड़ भी ली जाती है। हिन्दू धर्म की उदारता का आदर किये जाने की बजाय उसका उपहास उड़ाते कई शातिर लोग दिखते हैं। समाज का दर्पण कभी फिल्मों, साहित्यों को माना जाता था, पर कालखंड में लंबे समय तक इन पर वामपंथी विचारक हावी रहे। हिन्दू धर्म पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से प्रहार होते रहे। सहिषणुता की चादर के नीचे अवधारणात्मक रुप से उन्हें गलत बताया। मनगढंत प्रयोग किये गये। उन्हें रचनात्मक स्वतंत्रता का प्रतीक बताकर कहा गया कि हिन्दू धर्म तो उदार है। अपनी कमियों को खुलकर स्वीकारता है। फिल्मी दुनिया में पीके, ओह माय गॉड जैसी फिल्में बनाकर हिन्दू धर्म और उसके प्रतीकों का खूब मजाक शातिराना तरीके से उड़ाया गया। कला और साहित्य के क्षेत्र में सहिष्णुता के नाम पर न जाने कितने प्रयोग किये गये। पाकिस्तान की नींव डालने वाले अल्लामा इकबाल ने अपनी पहचान को अरब से जोड़कर बताया था। अपनी शिकवा नज्म में अपने खुदा से शिकवा किया था कि जिन मुसलमानों ने आपके लिए इतना खून बहाया, काफिरों को भी मारा, उनकी यह स्थिति आज क्यों है। परंतु इकबाल साहित्य में क्रांतिकारी बने रहे। भारतीय लोक संस्कृति में एम एफ हुसैन को बहुत बड़ा कलाकार बताया गया क्योंकि वह हिंदू देवी को नंगा चित्रित करता था। कलात्मक स्वतंत्रता का नाम लेकर और कथिक सहिष्णुता की आड़ में हिंदू धर्म से घृणा करने वाले लोगों ने मां काली को सीएए आंदोलन में बुर्के और हिजाब में दिखा दिया था। कभी शिवलिंग तो कभी त्रिशूल पर कंडोम चढ़ाकर दिखाये गये। यह सब हुआ क्योंकि कथित रुप से कहा जाता है कि हिन्दू धर्म सहिष्णु है। माता काली पर पार्टी नेत्री महुआ मोईत्रा के बयान को खारिज करने वाली टीएमसी ने सयानी घोष को विधानसभा चुनाव में अपना उम्मीदवार बनाया था। उसने शिवलिंग पर कंडोम के साथ तस्वीर साझा की थी। पहलगाम की घटना के बाद केंद्र सरकार क्या सबक लेती है, इस पर सबकी नजर है। आतंकवाद को बर्दाश्त न करने की नीति को फिर से स्थापित करके दिखाएगी। आंतरिक सुरक्षा को और मजबूत करने सहित बांग्लादेश, पाकिस्तान जैसे देशों का असल चेहरा अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उजागर करने पर और ध्यान फोकस करेगी। देश में या पड़ोसी देशों में भी कट्टरपंथियों के निशाने पर अधिकांशतः हिंदू समाज ही दिखता है। ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार दूरदर्शी कदम उठाते आगे बढ़े और हमारे देश की सनातनी विरासत, पहचान को और अक्षुण्ण रखने के भी लक्ष्य को पा सके।
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