Deepfake AI guidelines 2026: डिजिटल युग में सोशल मीडिया जहां संवाद और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना है, वहीं डीपफेक कंटेंट ने इसे गंभीर चुनौती के रूप में घेर लिया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार किए जा रहे डीपफेक वीडियो, ऑडियो और तस्वीरें न केवल लोगों को भ्रमित कर रही हैं, बल्कि ब्लैकमेलिंग, मानहानि और सामाजिक अराजकता का कारण भी बन रही हैं। बढ़ते खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने डीपफेक कंटेंट पर नियंत्रण के लिए सख्त कदम उठाए हैं और संशोधित एआई गाइडलाइंस जारी की हैं।
आईटी मंत्रालय द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 में संशोधन के तहत फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए नए दिशा-निर्देश लागू किए गए हैं। इन नियमों के अनुसार, एआई से बनाए गए कंटेंट को स्पष्ट रूप से चिन्हित करना अनिवार्य होगा। यह चिन्ह या तो स्क्रीन पर दिखाई देने वाला लेबल होगा या कंटेंट के भीतर जोड़ा गया विशेष डिजिटल मेटाडेटा, जिससे यूजर्स को स्पष्ट जानकारी मिल सके कि सामग्री एआई द्वारा तैयार की गई है।
विशेषज्ञों ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पहले प्रस्तावित नियमों में हर एआई से बने कंटेंट पर स्पष्ट लेबल लगाने की बात थी, जो व्यवहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण थी। अब संशोधित नियमों में केवल भ्रामक और गुमराह करने वाले कंटेंट पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिससे संतुलित और व्यावहारिक समाधान सामने आया है।

जेएसए एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के पार्टनर सजाई सिंह के अनुसार, यह बदलाव सोशल मीडिया कंपनियों के लिए राहत की तरह है। उनका कहना है कि हर एआई कंटेंट को चिह्नित करना तकनीकी और प्रशासनिक रूप से कठिन था, लेकिन अब फोकस केवल उस सामग्री पर है जो लोगों को भ्रमित करती है या नुकसान पहुंचा सकती है। इससे कंपनियों की जिम्मेदारी स्पष्ट हुई है और नियमों को लागू करना आसान होगा।
सरकार ने डीपफेक से निपटने के लिए समय-सीमा भी कड़ी कर दी है। यदि किसी एआई-निर्मित कंटेंट को सरकार या अदालत द्वारा आपत्तिजनक या भ्रामक घोषित किया जाता है, तो संबंधित सोशल मीडिया कंपनी को उसे 3 घंटे के भीतर हटाना होगा। पहले यह समय सीमा 36 घंटे थी। इस बदलाव को डिजिटल सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
इसके अलावा, एक बार किसी कंटेंट पर एआई लेबल लगा दिए जाने के बाद उसे हटाया या छुपाया नहीं जा सकेगा। इससे पारदर्शिता बनी रहेगी और यूजर्स को गुमराह होने से बचाया जा सकेगा। सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसे ऑटोमेटेड टूल्स और एल्गोरिद्म का इस्तेमाल भी करना होगा, जो गैरकानूनी, अश्लील, धोखाधड़ी या भ्रामक एआई कंटेंट की पहचान कर उसे वायरल होने से पहले रोक सकें।

विशेषज्ञों का मानना है कि डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, चुनावों और सामाजिक सद्भाव के लिए खतरा बन सकता है। फर्जी वीडियो और ऑडियो के जरिए किसी भी व्यक्ति की छवि खराब करना या सांप्रदायिक तनाव पैदा करना आसान हो गया है। ऐसे में सरकार की यह पहल डिजिटल प्लेटफॉर्म को अधिक जवाबदेह बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, चुनौती अब भी कम नहीं है। एआई तकनीक तेजी से विकसित हो रही है और डीपफेक की पहचान करना लगातार कठिन होता जा रहा है। इसलिए विशेषज्ञों का सुझाव है कि नियमों के साथ-साथ जनजागरूकता भी जरूरी है, ताकि लोग किसी भी वायरल कंटेंट को आंख मूंदकर सच न मानें।
सरकार का उद्देश्य केवल प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि डिजिटल इकोसिस्टम में भरोसा कायम रखना है। स्पष्ट लेबलिंग, सख्त समय-सीमा और तकनीकी निगरानी के जरिए डीपफेक के खतरे को सीमित करने की कोशिश की जा रही है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सोशल मीडिया कंपनियां इन नियमों को कितनी प्रभावी ढंग से लागू करती हैं।
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