Dangers of Digital Gaming : गाजियाबाद के एक रिहायशी इलाके से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने न केवल कानून व्यवस्था बल्कि आधुनिक परवरिश और डिजिटल दुनिया के खतरों पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ एक ही परिवार की तीन सगी बहनों ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। नौवीं मंजिल से छलांग लगाने वाली इन मासूमों की उम्र महज 12, 14 और 16 साल थी। शुरुआती जांच और मौके से बरामद 18 पन्नों के लंबे सुसाइड नोट ने इस पूरी घटना के पीछे के असल विलेन का पर्दाफाश किया है- 'कोरियन लव गेम'।
डिजिटल एडिक्शन ने छीनीं तीन जिंदगियां
पुलिस के अनुसार, ये तीनों बहनें हर वक्त एक साथ रहती थीं और पिछले काफी समय से एक विशेष ऑनलाइन गेम की गिरफ्त में थीं। इस गेम का जादू उन पर इस कदर हावी था कि उन्होंने स्कूल जाना तक बंद कर दिया था। घर के बंद कमरों में वे घंटों तक मोबाइल स्क्रीन से चिपकी रहती थीं। जब पिता ने अपनी बेटियों को इस जानलेवा लत से दूर करने की कोशिश की और उन्हें गेम खेलने से सख्ती से मना किया, तो उन किशोरियों ने वह खौफनाक कदम उठाया जिसकी कल्पना किसी भी माता-पिता ने नहीं की होगी।
सुसाइड नोट की रोंगटे खड़े कर देने वाली बातें
मौके से बरामद 18 पन्नों के सुसाइड नोट में बहनों ने अपने माता-पिता के नाम भावुक लेकिन विचलित करने वाला संदेश छोड़ा है। नोट में लिखा है: मम्मी-पापा सॉरी… हम चाहकर भी यह गेम नहीं छोड़ पा रही हैं। अब आपको एहसास होगा कि हम इस गेम से कितना प्यार करते थे, जिसे आप हमसे छुड़वाना चाहते थे। यह शब्द दर्शाते हैं कि गेम ने न केवल उनका समय छीना, बल्कि उनके दिमाग को पूरी तरह से 'प्रोग्राम' कर दिया था।
क्या है 'कोरियन लव गेम' और यह कैसे काम करता है?
इस घटना के बाद हर कोई यह जानना चाह रहा है कि आखिर यह 'कोरियन लव गेम' क्या है? सुरक्षा विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यह कोई साधारण मनोरंजन वाला गेम नहीं है।
1. संपर्क की शुरुआत: यह सोशल मीडिया या मैसेजिंग ऐप्स के जरिए शुरू होता है। एक अज्ञात व्यक्ति (हैंडलर) यूजर से संपर्क करता है और खुद को कोरियाई नागरिक बताता है।
2. भावनात्मक जुड़ाव: शुरुआत में वह व्यक्ति दोस्ती और प्यार भरी बातें करता है। वह यूजर का भरोसा जीतता है और उन्हें एक काल्पनिक दुनिया का हिस्सा बना लेता है।
3. टास्क का जाल: भरोसा जीतने के बाद असली खेल शुरू होता है। इसमें कुल 50 टास्क होते हैं जो करीब 50 दिनों तक चलते हैं।
4. मजबूरी और धमकी: शुरुआती टास्क बहुत आसान होते हैं, लेकिन जैसे-जैसे दिन बढ़ते हैं, टास्क खतरनाक और डरावने होने लगते हैं। यदि कोई यूजर बीच में गेम छोड़ने की कोशिश करता है, तो उसे डराया-धमकाया जाता है और उसकी निजी जानकारी सार्वजनिक करने की धमकी दी जाती है।
वरिष्ठ मनोचिकित्सकों का कहना है कि किशोरों का मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं होता है, जिससे उनमें तार्किक निर्णय लेने की क्षमता कम होती है। मनोवैज्ञानिक बताते हैं, ये गेम विशेष रूप से किशोरों को एडिक्ट बनाने के लिए ही डिजाइन किए जाते हैं। बच्चे गेम के कैरेक्टर को ही असली दुनिया मान लेते हैं। जब उन्हें कोई चैलेंज दिया जाता है, तो उसे पूरा करने का जुनून उन पर इस कदर सवार होता है कि वे सही-गलत का फर्क भूल जाते हैं। हारने का डर या टास्क न पूरा कर पाने का दबाव उन्हें आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम की ओर धकेल देता है।
गाजियाबाद की यह घटना समाज के लिए एक वेक-अप कॉल है। तकनीक जहां वरदान है, वहीं बच्चों के लिए यह एक अंधेरी खाई भी साबित हो सकती है। यह जरूरी है कि हम अपने बच्चों को केवल गैजेट्स न दें, बल्कि उन्हें उनका सही उपयोग और डिजिटल दुनिया के खतरों के बारे में भी शिक्षित करें।
बच्चे के मोबाइल इस्तेमाल पर अभिभावकोें को नजर रखनी चाहिए। आउटडोर एक्टिविटी में ज्यादा जोर देना चाहिए। बच्चा बाहर खेलें जिससे उनका शारीरिक विकास होगा। बच्चों को दूसरे बच्चों के साथ मेलजोल बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। साथ ही स्क्रीन टाइम को कम करने की जरूरत है।
डॉ प्रसाद कन्नेकंटी
मानसिक रोग विभाग, केजीएमयू
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