नई दिल्ली: भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) बैटरी उत्पादन के लिए जरूरी क्रिटिकल मिनरल्स, जैसे लिथियम, कोबाल्ट और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को बढ़ाने के लिए सरकार ने कई रणनीतिक कदम उठाए हैं। इन प्रयासों के तहत, सरकार ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (एनसीएमएम) की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य 2024-25 से 2030-31 तक सात वर्षों की अवधि में इन खनिजों के उत्पादन और खनन के प्रयासों को तेज करना है। इसके लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 16,300 करोड़ रुपए के निवेश को मंजूरी दी है, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और अन्य कंपनियों द्वारा 18,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त निवेश भी अपेक्षित है।
केंद्रीय भारी उद्योग राज्य मंत्री, भूपतिराजू श्रीनिवास वर्मा के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने क्रिटिकल मिनरल्स की खोज के लिए 368 परियोजनाओं की शुरुआत की है। आने वाले वर्षों में इन परियोजनाओं की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है। वित्त वर्ष 2024-25 में 195 नई परियोजनाओं को क्रियान्वित किया जाएगा, जबकि अगले वित्त वर्ष के लिए 227 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है।
इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 में किए गए संशोधनों के रूप में सामने आया है। 2023 में आए एमएमडीआर संशोधन अधिनियम के तहत, अब विदेशी कंपनियों को खनन और अन्वेषण के लिए 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति है। ये कंपनियाँ भारतीय सहायक कंपनियाँ बना सकती हैं या मौजूदा भारतीय कंपनियों में निवेश कर सकती हैं। इसके अलावा, सरकार ने 2024-25 के केंद्रीय बजट में 25 खनिजों पर सीमा शुल्क समाप्त कर दिया है और 2 खनिजों पर मूल सीमा शुल्क को कम कर दिया है, जिससे क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में और अधिक निवेश को आकर्षित किया जा सके।
भारत में लगभग 7.23 मिलियन टन रेयर अर्थ एलिमेंट्स ऑक्साइड (आरईओ) के भंडार मौजूद हैं, जो प्रमुख रूप से आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, और अन्य राज्यों में पाए जाते हैं। इन कदमों से भारत को वैश्विक क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मजबूत करने और ईवी बैटरी उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। सरकार का उद्देश्य इन खनिजों की आपूर्ति को बढ़ाकर भारत को वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है।
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