बलोच नेताओं ने पाकिस्तान पर लगाया लोगों की जबरन आवाज दबाने का आरोप, कहा... पूरी कौम की दबाई जा रही आवाज
खबर सार :-
बलोच नेशनल मूवमेंट ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बलुचिस्तान में बड़े पैमाने पर हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर तत्काल कार्रवाई करने की अपील की है। बलूचिस्तान में जबरन गायब किए जाने, अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक जैसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यह बलोच लोगों की आवाज दबाने का सुनियोजित कोशिश का हिस्सा है। बलूचिस्तान में पूरी कौम को अपने अस्तित्व के कारण सजा दी रही है। आतंकवाद विरोधी कार्रवाई के नाम पर पाकिस्तान ने कानून को हथियार बना दिया है।
खबर विस्तार : -
जिनेवा : बलोच नेशनल मूवमेंट (बीएनएम) संगठन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बलूचिस्तान में हो रहे व्यापक मानवाधिकार उल्लंघनों पर तुरंत कार्रवाई करने की अपील की है। संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान की सरकार और उसके सुरक्षा तंत्र कानून का इस्तेमाल असहमति दबाने, आम नागरिकों को निशाना बनाने और पूरे क्षेत्र की आवाज दबाने के लिए कर रहे हैं।
लगातार बढ़ रहे अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक जैसे मामले
जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 61वें सत्र को संबोधित करते हुए बीएनएम के प्रतिनिधियों ने कहा कि बलूचिस्तान में जबरन गायब किए जाने, फर्जी मुठभेड़ों या बिना न्यायिक प्रक्रिया के हत्याओं और अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक जैसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
बलूचिस्तान में बलोच लोगों को अस्तित्व के कारण दी जा रही सजा
उनके मुताबिक यह सब बलोच लोगों की आवाज दबाने की सुनियोजित कोशिश का हिस्सा है। बीएनएम की सदस्य माहरा बलोच ने कहा कि बलूचिस्तान में आम लोगों को सिर्फ इसलिए सामूहिक सजा दी जा रही है, क्योंकि वे वहां रहते हैं और अपनी पहचान के साथ मौजूद हैं। बलूचिस्तान में एक पूरी आबादी को सिर्फ अपने अस्तित्व के कारण सजा दी जा रही है। उनके खिलाफ आतंकवाद विरोधी कार्रवाई के नाम पर पाकिस्तान ने कानून को हथियार बना दिया है। असहमति जताने वालों को अपराधी बनाया जा रहा है, लोगों की जिंदगी मिटाई जा रही है और पूरी कौम की आवाज दबाई जा रही है।
लगातार खतरे में जीने को मजबूर हैं बलोच के लोग
माहरा बलोच ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान के आतंकवाद निरोधक कानून का दुरुपयोग कर बलोच छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार रक्षकों को प्रतिबंधित या संदिग्ध व्यक्तियों की तरह चिह्नित किया जा रहा है। उनके अनुसार इससे उनकी स्वतंत्रता छिन जाती है। यात्रा का अधिकार प्रभावित होता है और वे लगातार खतरे में जीने को मजबूर हो जाते हैं।
उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2025 में ही बीएनएम के मानवाधिकार विभाग ‘पांक’ ने बलूचिस्तान में 1,355 जबरन गुमशुदगी और 225 गैर-न्यायिक हत्याओं के मामले दर्ज किए। माहरा ने कहा कि ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे वे लोग हैं जिन्हें घरों से उठाया गया, छात्र जिन्हें कैंपस से अगवा किया गया और वे शव जिन्हें दूसरों को डराने के लिए लौटाया गया।
दुनिया को बलूचिस्तान की वास्तविक स्थिति का पता न चल सके
उन्होंने बलोच यकजहती कमेटी (बीवाईसी) के नेतृत्व पर हो रही कार्रवाई का भी मुद्दा उठाया। माहरा ने कहा कि “महरंग बलोच, जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया, उन्हें मनमाने ढंग से गिरफ्तार किया गया, इलाज से वंचित रखा गया और केवल शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाने के कारण निशाना बनाया गया।”
उन्होंने यह भी कहा कि इंटरनेट बंद करना, बड़े पैमाने पर निगरानी रखना और सामूहिक दंड देना वहां आम बात बन गई है, ताकि दुनिया को बलूचिस्तान की वास्तविक स्थिति का पता न चल सके। माहरा बलोच ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग की कि पाकिस्तान पर दबाव बनाया जाए ताकि वह तुरंत इन मानवाधिकार उल्लंघनों को रोके, मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए बलोच कार्यकर्ताओं को रिहा करे और जबरन गायब किए जाने व गैर-न्यायिक हत्याओं की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराए।
कानून से ऊपर होने का व्यवहार कर रही पाकिस्तान की सेना
इससे पहले बुधवार को इसी सत्र में ‘पांक’ के मीडिया कोऑर्डिनेटर जमाल बलोच ने भी कहा था कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) से जुड़े प्रोजेक्ट्स के बीच अत्याचार और तेज हो गए हैं। उन्होंने कहा, “मैं इस परिषद के सामने बलूचिस्तान में पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे सुनियोजित मानवाधिकार उल्लंघनों की बात रखने आया हूं, जिन्हें चीन की रणनीतिक और आर्थिक भागीदारी से मजबूती मिल रही है। बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी एक राज्य नीति की तरह काम कर रही है। पाकिस्तान की सेना कानून से ऊपर की तरह व्यवहार करती है और छात्र, शिक्षक, पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को उठा ले जाती है।
आतंकवाद की तरह पेश किया जा रहा शांतिपूर्ण विरोध
जमाल बलोच ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण विरोध को आतंकवाद की तरह पेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के नेतृत्व वाले नागरिक अधिकार आंदोलनों को कुचला जा रहा है और बलूचिस्तान के कई जिलों में इंटरनेट बंद रखा जाता है, ताकि सैन्य अभियानों और पीड़ितों की आवाज दुनिया तक न पहुंच सके। उन्होंने यह भी दावा किया कि सीपीईसी से जुड़े प्रोजेक्ट्स के साथ-साथ दमन बढ़ा है, क्योंकि इन परियोजनाओं की सुरक्षा और संसाधनों पर नियंत्रण के लिए आम नागरिकों के जीवन का सैन्यीकरण किया जा रहा है।
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