याददाश्त कमजोर होना सिर्फ उम्र का असर नहीं, अल्जाइमर के इन 3 लक्षणों को न करें नजरअंदाज
खबर सार :-
अल्जाइमर के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 21 सितंबर को विश्व अल्जाइमर दिवस मनाया जाता है। यह बीमारी धीरे-धीरे रोजमर्रा के कामकाजों पर भी असर डालती है।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली: अल्जाइमर एक ऐसी बीमारी है जो धीरे-धीरे याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और रोजमर्रा के काम करने की काबिलियत पर असर डालती है। लोग अक्सर शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं और उन्हें बुढ़ापे का सामान्य हिस्सा मान लेते हैं। लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं है। बदलावों को जल्दी पहचानकर डॉक्टर से सलाह लेने से भविष्य की देखभाल और मदद की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।
इस बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 21 सितंबर को 'वर्ल्ड अल्जाइमर डे' मनाया जाता है। बीमारी का जितनी जल्दी पता चल जाए, उतनी ही बेहतर तरीके से जरूरी मदद की तैयारी और इंतजाम किया जा सकता है; इसलिए शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि अल्जाइमर और डिमेंशिया के शुरुआती लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन कुछ आम बदलावों पर ध्यान देना जरूरी है। इनमें समय या जगह को लेकर उलझन, रोजमर्रा के कामों की योजना बनाने या समस्याएं सुलझाने में कठिनाई और पहले आसानी से किए जाने वाले जाने-पहचाने कामों को करने में परेशानी शामिल है।
अल्जाइमर के मुख्य लक्षण
याददाश्त कमजोर होने से जब रोजमर्रा के कामकाजों पर असर पड़ने लगे तो एक अहम चेतावनी का संकेत हो सकता है। कुछ लोग धीरे-धीरे काम या सामाजिक गतिविधियों से दूर होने लग सकते हैं। अगर ऐसे बदलाव दिखें, तो उन्हें सिर्फ बुढ़ापे का असर मानने के बजाय किसी हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना बेहतर है। इसके मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं-
1- भ्रम होना- जब आप जाने-पहचाने रास्तों में भ्रमित हो जाएं, तो यह अल्जाइमर का एक प्रमुख लक्षण है। धीरे-धीरे यह समस्या बढ़ने लगती है और कई बार लोग अपने घर का रास्ता भी याद रखने में कठिनाई का सामना करते हैं।
2- रोजमर्रा के कामों में कठिनाई- खाना खाना, हिसाब रखना या फिर नहाना जैसे रोजमर्रा के कामों में कठिनाई इस बीमारी का एक संकेत है।
3- बातों को भूलने लगना- अक्सर बातों या नामों को भूल जाना। समस्या गंभीर होने की स्थिति में मरीज अपना नाम और पहचान भी भूलने लगते हैं।
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अल्जाइमर से बचाव के उपाय
1- अल्जाइमर से बचने के लिए शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से सक्रिय रहना जरूरी है। नियमित व्यायाम को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं; रोजाना टहलना, योग या अपनी क्षमता के अनुसार अन्य शारीरिक व्यायाम करना शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की सेहत के लिए फायदेमंद है।
2- दोस्तों और परिवार के साथ मजबूत सामाजिक संबंध बनाए रखें। बातचीत करना, लोगों से मिलना-जुलना और ग्रुप एक्टिविटीज में हिस्सा लेना व्यक्ति को मानसिक और भावनात्मक रूप से सक्रिय रख सकता है।
3- संतुलित और पौष्टिक आहार को प्राथमिकता दें, जिसमें फल और सब्जियां शामिल हों। पर्याप्त और नियमित नींद लेना भी बहुत जरूरी है; सोने का एक निश्चित समय बनाए रखने की कोशिश करें।
4- अपने दिमाग को सक्रिय रखने के लिए नई-नई चीजें सीखते रहें। किताबें पढ़ना, कोई नया हुनर सीखना, या संगीत या रचनात्मक कामों में रुचि लेना मानसिक सतर्कता बनाए रखने में मदद कर सकता है। साथ ही, ऐसी गतिविधियों के लिए भी समय निकालें जिनसे आपको खुशी और संतुष्टि मिलती हो।
अल्जाइमर और डिमेंशिया में अंतर
अक्सर अल्जाइमर और डिमेंशिया को एक ही बीमारी समझा जाता है, जबकि डिमेंशिया कोई बीमारी नहीं है। यह एक स्थिति है, जो याददाश्त में कमी के लक्षणों को दर्शाता है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जबकि अल्जाइमर मस्तिष्क की एक बीमारी है और यह डिमेंशिया के 80 फीसदी तक मामलों के लिए जिम्मेदार होता है। अल्जाइमर रोग में टाउ (Tau) प्रोटीन की अहम भूमिका होती है। यह प्रोटीन मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं के भीतर असामान्य रूप से जमा होकर उनकी कार्यक्षमता को प्रभावित करता है, जिससे याददाश्त, निर्णय लेने की क्षमता और व्यवहार पर असर पड़ता है।
बुजुर्गों को दें अपनेपन का सहारा
अल्जाइमर होने का कोई एक निश्चित कारण नहीं है। बढ़ती उम्र, हादसा, मस्तिष्क की कोशिकाओं में बदलाव या फिर अनुवांशिक कारणों से भी अल्जाइमर का खतरा बना रहता है। यह बीमारी अक्सर 65 साल से अधिक आयु के लोगों में होती है। ऐसे में इन संकेतों को सामान्य मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। ऐसे समय में बुजुर्गों को परिवार के साथ और समुचित देखभाल की जरूरत होती है। अल्जाइमर का कोई पक्का इलाज नहीं है, लेकिन दवाओं और थेरेपी से इसके लक्षणों को कम किया जा सकता है।
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