'टीबी की राजधानी' से 'टीबी कंट्रोल मॉडल' बना उत्तर प्रदेशः बीमारी की पहचान, इलाज और जनभागीदारी से बदली तस्वीर

खबर सार :-

उत्तर प्रदेश ने व्यापक जांच, समय पर इलाज, पोषण सहायता और जनभागीदारी के दम पर टीबी नियंत्रण में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। सबसे अधिक मरीजों वाला राज्य होने के बावजूद नियंत्रण के राष्ट्रीय मानकों पर शीर्ष राज्यों में जगह बनाना बड़ी उपलब्धि है। अब चुनौती यह है कि हर मरीज की समय पर पहचान हो, इलाज पूरा कराया जाए और टीबी मुक्त भारत के लक्ष्य को समय पर हासिल किया जाए।
'टीबी की राजधानी' से 'टीबी कंट्रोल मॉडल' बना उत्तर प्रदेशः बीमारी की पहचान, इलाज और जनभागीदारी से बदली तस्वीर

खबर विस्तार : -

Uttar Pradesh TB control model: देश में सबसे अधिक टीबी (क्षय रोग) मरीजों के कारण कभी 'टीबी की राजधानी' कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश ने अब टीबी नियंत्रण की दिशा में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। देश के कुल टीबी मरीजों में हर पांचवां मरीज उत्तर प्रदेश से होने के बावजूद राज्य ने समय पर जांच, बेहतर इलाज, व्यापक स्क्रीनिंग, पोषण सहायता और जनभागीदारी के जरिए टीबी नियंत्रण में नई मिसाल कायम की है। विभिन्न राष्ट्रीय मानकों पर बेहतर प्रदर्शन के आधार पर उत्तर प्रदेश अब टीबी नियंत्रण के मामले में देश के शीर्ष छह राज्यों में शामिल हो गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर मरीजों की पहचान और दवाइयों का पूरा कोर्स ही टीबी उन्मूलन की सबसे प्रभावी रणनीति है।

2022 से 2024 तक बढ़े मरीज, फिर दिखी नियंत्रण की दिशा

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में उत्तर प्रदेश में लगभग पांच लाख टीबी मरीज दर्ज किए गए थे। वर्ष 2023 में यह संख्या बढ़कर 6.24 लाख और 2024 में 6.73 लाख से अधिक पहुंच गई। यह संख्या केंद्रीय टीबी प्रभाग के 6.5 लाख मरीजों की पहचान के लक्ष्य से भी अधिक थी। हालांकि इसके बाद राज्य सरकार ने बड़े स्तर पर स्क्रीनिंग अभियान चलाया, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे। सात दिसंबर 2024 से 19 अक्टूबर 2025 के बीच 2.38 करोड़ उच्च जोखिम वाले लोगों की जांच की गई, जिसमें 5.14 लाख लोगों में टीबी की पुष्टि हुई। व्यापक जांच अभियान के कारण समय रहते मरीजों की पहचान संभव हुई और संक्रमण की श्रृंखला को रोकने में मदद मिली।

Uttar Pradesh TB Control Model- DR-Rishi Saxena

2026 में मरीजों की संख्या घटने की उम्मीद

राज्य क्षय रोग अधिकारी (एसटीओ) डॉ. ऋषि कुमार सक्सेना के अनुसार, 24 मार्च 2026 से जुलाई के पहले सप्ताह तक पूरे प्रदेश में 31 लाख से अधिक लोगों की टीबी जांच कराई गई। इसके लिए 25,821 आयुष्मान आरोग्य शिविर लगाए गए। राज्य के 26 हजार से अधिक उच्च जोखिम वाले गांवों और वार्डों में से 24 हजार से अधिक क्षेत्रों को कवर किया गया। अभियान के दौरान अब तक 1.85 लाख नए टीबी मरीजों की पहचान की गई है। डॉ. सक्सेना का कहना है कि 2025 से अब तक के आंकड़े संकेत देते हैं कि वर्ष 2026 में राज्य में टीबी मरीजों की संख्या में और कमी दर्ज की जाएगी।

हवाई अड्डों पर टीबी जांच शुरू करने वाला पहला राज्य बना यूपी

उत्तर प्रदेश ने टीबी नियंत्रण में एक और नई पहल करते हुए देश में पहली बार अंतरराष्ट्रीय और घरेलू हवाई अड्डों पर टीबी जांच की व्यवस्था शुरू की है। चौधरी चरण सिंह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लखनऊ), नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (जेवर), लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (वाराणसी) और महायोगी गोरखनाथ हवाई अड्डा (गोरखपुर) पर हैंड हेल्ड डिजिटल एक्स-रे मशीनों के माध्यम से लगभग 800 यात्रियों की टीबी जांच की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संक्रमण की समय रहते पहचान कर बीमारी के प्रसार को रोकने में मदद मिलेगी।

टीबी उन्मूलन अभियान में जनप्रतिनिधियों और युवाओं की बड़ी भागीदारी

100 दिवसीय गहन टीबी उन्मूलन अभियान को जनआंदोलन का स्वरूप देने के लिए राज्यपाल, मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री सहित उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के करीब 212 मंत्रियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। अभियान में देशभर के 182 सांसद, 909 विधायक और विधान परिषद सदस्य भी जुड़े। इसके अलावा प्रदेश के 8,458 स्कूलों के लगभग चार लाख छात्र-छात्राओं तथा पांच हजार महाविद्यालयों के माध्यम से तीन लाख से अधिक युवाओं ने जागरूकता अभियान में हिस्सा लिया। गांवों, कस्बों और शहरों में टीबी के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए बड़े स्तर पर जनसंपर्क कार्यक्रम आयोजित किए गए।

दो लाख से अधिक मरीजों को मिली पोषण सहायता

टीबी मरीजों को केवल दवा ही नहीं बल्कि पोषण और सामाजिक सहयोग भी उपलब्ध कराया जा रहा है। इस अभियान के दौरान नौ हजार से अधिक नगरीय निकाय प्रतिनिधियों और 34 हजार पंचायती राज जनप्रतिनिधियों ने गांव-गांव जाकर लोगों को टीबी के लक्षण, जांच और इलाज की जानकारी दी। 13,302 टीबी विजेताओं यानी बीमारी से पूरी तरह ठीक हो चुके लोगों ने भी अपने अनुभव साझा कर लोगों को जागरूक किया। मरीजों की सहायता के लिए पांच हजार से अधिक नए निक्षय मित्रों का पंजीकरण किया गया, जिनकी मदद से अब तक 2.06 लाख से अधिक पोषण किट वितरित की जा चुकी हैं।

Uttar Pradesh TB Control Model-Anand Gupta

बाल और नाखून छोड़कर शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है टीबी

बलरामपुर अस्पताल के वरिष्ठ क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ. आनंद कुमार गुप्ता बताते हैं कि टीबी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक जीवाणु से होने वाली संक्रामक बीमारी है। यह केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहती बल्कि बाल और नाखून को छोड़कर शरीर के लगभग किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकती है। लगभग 90 प्रतिशत मामलों में यह फेफड़ों में होती है, जिसे पल्मोनरी टीबी कहा जाता है। जबकि शरीर के अन्य अंगों में होने वाली बीमारी एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (EPTB) कहलाती है।

हर संक्रमित व्यक्ति को नहीं होती सक्रिय टीबी

विशेषज्ञों के अनुसार टीबी के जीवाणु से संक्रमित होने का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति बीमार भी हो जाएगा। कई लोगों में यह जीवाणु शरीर में निष्क्रिय अवस्था में रहता है, जिसे लेटेंट टीबी कहा जाता है। ऐसे लोगों में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते और वे सामान्य जीवन जीते हैं। लेकिन जब रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है तो यही जीवाणु सक्रिय होकर फेफड़ों या अन्य अंगों को प्रभावित करने लगता है। अनुमान है कि संक्रमित लोगों में केवल लगभग 10 प्रतिशत को ही सक्रिय टीबी विकसित होती है।

अधूरा इलाज बना सकता है बीमारी को और खतरनाक

डॉ. आनंद कुमार गुप्ता के अनुसार टीबी का मरीज जब खांसता, छींकता, हंसता या थूकता है तो हवा में मौजूद सूक्ष्म बूंदों के माध्यम से जीवाणु दूसरे लोगों तक पहुंच सकते हैं। इसलिए शुरुआती जांच और समय पर इलाज बेहद जरूरी है। टीबी पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी है, लेकिन मरीज को कम से कम छह महीने तक नियमित दवा लेनी होती है। यदि मरीज बीच में दवा छोड़ देता है तो बीमारी दोबारा लौट सकती है और मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) टीबी का रूप ले सकती है, जिसका इलाज अधिक कठिन और लंबा होता है। बलरामपुर अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन सात से आठ नए टीबी मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।

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