फर्जी भारतीय पहचान बनाकर रह रहे बांग्लादेशी नागरिक को अदालत ने ठहराया दोषी, डिपोर्टेशन का दिया आदेश
खबर सार :-
अदालत ने एफआरआरओ और संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों को निर्देश दिया कि आरोपी को डिटेंशन सेंटर में रखा जाए और दोनों देशों के बीच लागू कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए उसके निर्वासन की कार्रवाई जल्द पूरी की जाए।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने फर्जी भारतीय पहचान दस्तावेज हासिल कर देश में अवैध रूप से रह रहे एक बांग्लादेशी नागरिक को दोषी ठहराते हुए उसे बांग्लादेश वापस भेजने (डिपोर्टेशन) की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया है। अदालत ने माना कि आरोपी ने अपनी वास्तविक पहचान और नागरिकता छिपाकर धोखाधड़ी के माध्यम से भारतीय दस्तावेज प्राप्त किए और लंबे समय तक भारत में गैरकानूनी रूप से निवास किया।
आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने का निर्देश
आरोपी की पहचान साबू उर्फ शाबू सरदार के रूप में हुई है। उसके खिलाफ पहाड़गंज थाना क्षेत्र में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318(ए) तथा फॉरेनर्स एक्ट की धारा 14(ए) के तहत एफआईआर संख्या 160/2025 दर्ज की गई थी। मामले की सुनवाई दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट स्थित सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट के लिंक ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (जेएमएफसी) की अदालत में हुई।
अदालत ने शनिवार को अपना फैसला सुनाते हुए आरोपी को दोषी करार दिया। साथ ही संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि उसे विधिक प्रक्रिया पूरी करने के बाद बांग्लादेश वापस भेजा जाए। अदालत ने फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस (एफआरआरओ) को आरोपी को डिटेंशन सेंटर में रखने और निर्वासन की सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने का भी निर्देश दिया।
पुलिस के अनुसार, यह मामला सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट के स्पेशल स्टाफ को मिली एक गोपनीय सूचना के आधार पर सामने आया। सूचना में बताया गया था कि कुछ बांग्लादेशी नागरिक फर्जी भारतीय पहचान के सहारे दिल्ली में अवैध रूप से रह रहे हैं। सूचना के सत्यापन के बाद पुलिस ने पहाड़गंज इलाके में अभियान चलाकर आरोपी को हिरासत में लिया।
पूछताछ और प्रारंभिक जांच में सामने आया कि आरोपी अवैध रूप से भारत में दाखिल हुआ था। इसके बाद उसने अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर भारतीय नागरिक होने का झूठा दावा किया और विभिन्न सरकारी दस्तावेज हासिल कर लिए। पुलिस ने बताया कि आरोपी ने कथित तौर पर फर्जी सूचनाओं के आधार पर भारतीय पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक खाता और अन्य पहचान संबंधी दस्तावेज बनवा लिए थे।
नियमों के मुताबिक भेजे जाएंगे वापस
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने व्यापक स्तर पर दस्तावेजी, डिजिटल और तकनीकी साक्ष्य एकत्र किए। इनमें पासपोर्ट और इमिग्रेशन रिकॉर्ड, पहचान दस्तावेजों का सत्यापन, इलेक्ट्रॉनिक डेटा तथा अन्य सहायक प्रमाण शामिल थे। जांच में यह भी स्पष्ट हुआ कि आरोपी ने योजनाबद्ध तरीके से गलत जानकारी देकर वैध भारतीय पहचान दस्तावेज प्राप्त किए थे।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच के दौरान यह भी पता लगाया गया कि आरोपी ने किन प्रक्रियाओं और माध्यमों का इस्तेमाल कर फर्जी पहचान के आधार पर वास्तविक सरकारी दस्तावेज हासिल किए। इस पूरे मामले में तकनीकी विश्लेषण और दस्तावेजों के मिलान ने अहम भूमिका निभाई, जिससे आरोपी की असली पहचान और उसकी नागरिकता की पुष्टि हो सकी।
जांच एजेंसियों के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने अदालत के समक्ष इतने मजबूत और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किए कि आरोपी ने मुकदमे का विरोध नहीं किया। उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए उसने अदालत के सामने स्वेच्छा से अपना अपराध स्वीकार कर लिया। अदालत ने आरोपी की दोष स्वीकार करने की दलील पर विचार करते हुए उसे दोषी ठहराया।
सजा सुनाते समय अदालत ने आरोपी को उतनी अवधि की कारावास की सजा दी, जितनी वह न्यायिक हिरासत में पहले ही काट चुका था। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि सजा पूरी होने के बाद आरोपी को भारत में रहने की अनुमति नहीं होगी और उसे नियमानुसार बांग्लादेश भेजा जाएगा।
दिल्ली पुलिस ने इस फैसले को अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की एक महत्वपूर्ण सफलता बताया है। पुलिस का कहना है कि तकनीकी निगरानी, दस्तावेजी जांच और खुफिया सूचनाओं के समन्वय से इस मामले में सफल अभियोजन सुनिश्चित हुआ। अधिकारियों ने यह भी कहा कि राजधानी में फर्जी पहचान बनाकर रहने वाले विदेशी नागरिकों की पहचान और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का अभियान आगे भी जारी रहेगा, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और दस्तावेजी व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखी जा सके।
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