‘बॉस स्कैम’ का खुलासा: डायरेक्टर बनकर WhatsApp पर भेजा मैसेज, कंपनी से ठगे 10 करोड़ रुपये, तीन राज्यों में छापेमारी

खबर सार :-

साइबर अपराधी रोज नए पैंतरे अपना कर लोगों से ठगी का प्रयास कर रहे हैं। इनके चुंगल बचना आम आदमी के लिए बहुत मुश्किल है। सरकार भी ऐसी ठगी को लेकर बहुत ज्यादा सतर्क है लेकिन लगातार नई-नई चालों से ये साइबर अपराधी लोगों को अपने जाल में फंसा ही लेते हैं और अब ये अपराधी बॉस बनकर लोगों को ठग रहे हैं।
‘बॉस स्कैम’ का खुलासा: डायरेक्टर बनकर WhatsApp पर भेजा मैसेज, कंपनी से ठगे 10 करोड़ रुपये, तीन राज्यों में छापेमारी

खबर विस्तार : -

नई दिल्लीः अगर आपके मोबाइल पर अचानक आपके बॉस या कंपनी के किसी बड़े अधिकारी के नाम से WhatsApp मैसेज आए और उसमें लिखा हो कि “मैं मीटिंग में हूं, तुरंत यह पेमेंट कर दो”, तो क्या आप बिना पुष्टि किए पैसे ट्रांसफर कर देंगे? साइबर अपराधियों ने इसी भरोसे का फायदा उठाकर एक बड़ी कंपनी को करोड़ों रुपये का चूना लगा दिया। मुंबई क्राइम ब्रांच ने अब ऐसे ही एक संगठित साइबर गिरोह का पर्दाफाश किया है, जिसे पुलिस ने ‘बॉस स्कैम’ नाम दिया है।

भरोसे का फायदा उठाकर लगाया चूना

मामला उस समय सामने आया जब देश के कई शहरों में कारोबार करने वाली एक बड़ी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी को WhatsApp पर एक मैसेज मिला। मैसेज भेजने वाले की प्रोफाइल फोटो कंपनी के डायरेक्टर की लगी हुई थी। फोटो और नाम देखकर अधिकारी को किसी तरह का शक नहीं हुआ। ठगों ने इसी भरोसे का फायदा उठाया और खुद को कंपनी के शीर्ष अधिकारी के रूप में पेश करते हुए तुरंत भुगतान करने का निर्देश दिया।

मैसेज में लिखा गया था कि वह एक जरूरी मीटिंग में व्यस्त हैं और कुछ महत्वपूर्ण पेमेंट तुरंत करनी है। अधिकारी ने इसे कंपनी के डायरेक्टर का आदेश समझकर अलग-अलग बैंक खातों में रकम ट्रांसफर करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद जब असली डायरेक्टर से संपर्क हुआ, तब पूरे मामले का खुलासा हुआ। लेकिन तब तक साइबर ठग कंपनी के खाते से 10 करोड़ 40 लाख रुपये से अधिक की रकम निकाल चुके थे।

पुलिस ने दिया ‘बॉस स्कैम’ नाम 

इस अनोखे तरीके से की गई ठगी को देखते हुए मुंबई पुलिस ने इसे ‘बॉस स्कैम’ नाम दिया। पुलिस के अनुसार, इस तरह के मामलों में अपराधी किसी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी की पहचान का इस्तेमाल करते हैं। वे सोशल मीडिया, इंटरनेट और अन्य माध्यमों से अधिकारियों की जानकारी जुटाते हैं और फिर उनके नाम से फर्जी प्रोफाइल बनाकर कर्मचारियों को निशाना बनाते हैं।

मुंबई क्राइम ब्रांच की दक्षिण साइबर पुलिस के लिए यह मामला सिर्फ एक धोखाधड़ी नहीं था, बल्कि देशभर में फैले एक बड़े साइबर नेटवर्क तक पहुंचने की चुनौती थी। पुलिस ने तकनीकी जांच, बैंकिंग ट्रांजेक्शन और डिजिटल फुटप्रिंट के आधार पर मामले की जांच शुरू की। हर बैंक खाते और पैसों के लेनदेन की कड़ी को जोड़ा गया, जिसके बाद पुलिस को इस गिरोह तक पहुंचने में सफलता मिली।

जांच के दौरान पुलिस ने महाराष्ट्र, बिहार और दिल्ली में एक साथ कार्रवाई की। सबसे पहले महाराष्ट्र के जालना, फिर बिहार के सीवान और इसके बाद दिल्ली में छापेमारी की गई। इस कार्रवाई में अब तक आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस पूछताछ में सामने आया कि यह गिरोह सुनियोजित तरीके से साइबर ठगी को अंजाम देता था।

आरोपियों का काम अलग-अलग बैंक खातों की व्यवस्था करना, ठगी की रकम को कई खातों में घुमाना और फिर पैसे को सुरक्षित तरीके से निकालना था। जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह के सदस्य ठगी की रकम से सोना खरीदते थे, ताकि पैसों के असली स्रोत को छिपाया जा सके और जांच एजेंसियों को भ्रमित किया जा सके।

कई डिजिटल साक्ष्य बरामद

पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों के पास से मोबाइल फोन, बैंक पासबुक, एटीएम कार्ड और कई अन्य डिजिटल साक्ष्य बरामद किए हैं। इन दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस अब गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश कर रही है।

इस मामले में पुलिस को बड़ी सफलता तब मिली, जब समय रहते कार्रवाई करते हुए 5 करोड़ 63 लाख 98 हजार रुपये से अधिक की रकम विभिन्न बैंक खातों में फ्रीज करा दी गई। इससे ठगी गई रकम का एक बड़ा हिस्सा सुरक्षित किया जा सका। हालांकि, पुलिस अधिकारियों का मानना है कि यह पूरा नेटवर्क काफी बड़ा है और इसमें कई अन्य लोग भी शामिल हो सकते हैं।

जांच में यह भी पता चला है कि ठगी की रकम से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और महाराष्ट्र के कई बड़े ज्वेलर्स से सोना खरीदा गया। अब पुलिस की टीमें इन राज्यों में जाकर उन लोगों और संस्थानों की भूमिका की जांच कर रही हैं, जहां इस रकम का इस्तेमाल किया गया।

मास्टरमाइंड तक पहुंचने का प्रयास जारी

मुंबई पुलिस की नजर अब इस गिरोह के मुख्य संचालक यानी मास्टरमाइंड तक पहुंचने पर है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि फर्जी पहचान तैयार करने, बैंक खाते उपलब्ध कराने और रकम को ठिकाने लगाने का पूरा नेटवर्क कैसे काम करता था।

साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह के मामलों से बचने के लिए किसी भी बड़े वित्तीय लेनदेन से पहले संबंधित अधिकारी से सीधे फोन पर पुष्टि करना बेहद जरूरी है। केवल WhatsApp मैसेज, प्रोफाइल फोटो या नाम देखकर भुगतान करना कंपनियों के लिए बड़ा जोखिम साबित हो सकता है। ‘बॉस स्कैम’ का यह मामला एक बार फिर बताता है कि साइबर अपराधी भरोसे और जल्दबाजी दोनों का फायदा उठाकर बड़ी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।

यह भी पढ़ेंः-Anurag Dhankar: त्रिपुरा के DGP अनुराग धनखड़ की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत, पुलिस मुख्यालय में मिला शव
 

नई दिल्लीः अगर आपके मोबाइल पर अचानक आपके बॉस या कंपनी के किसी बड़े अधिकारी के नाम से WhatsApp मैसेज आए और उसमें लिखा हो कि “मैं मीटिंग में हूं, तुरंत यह पेमेंट कर दो”, तो क्या आप बिना पुष्टि किए पैसे ट्रांसफर कर देंगे? साइबर अपराधियों ने इसी भरोसे का फायदा उठाकर एक बड़ी कंपनी को करोड़ों रुपये का चूना लगा दिया। मुंबई क्राइम ब्रांच ने अब ऐसे ही एक संगठित साइबर गिरोह का पर्दाफाश किया है, जिसे पुलिस ने ‘बॉस स्कैम’ नाम दिया है।

भरोसे का फायदा उठाकर लगाया चूना

मामला उस समय सामने आया जब देश के कई शहरों में कारोबार करने वाली एक बड़ी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी को WhatsApp पर एक मैसेज मिला। मैसेज भेजने वाले की प्रोफाइल फोटो कंपनी के डायरेक्टर की लगी हुई थी। फोटो और नाम देखकर अधिकारी को किसी तरह का शक नहीं हुआ। ठगों ने इसी भरोसे का फायदा उठाया और खुद को कंपनी के शीर्ष अधिकारी के रूप में पेश करते हुए तुरंत भुगतान करने का निर्देश दिया।

मैसेज में लिखा गया था कि वह एक जरूरी मीटिंग में व्यस्त हैं और कुछ महत्वपूर्ण पेमेंट तुरंत करनी है। अधिकारी ने इसे कंपनी के डायरेक्टर का आदेश समझकर अलग-अलग बैंक खातों में रकम ट्रांसफर करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद जब असली डायरेक्टर से संपर्क हुआ, तब पूरे मामले का खुलासा हुआ। लेकिन तब तक साइबर ठग कंपनी के खाते से 10 करोड़ 40 लाख रुपये से अधिक की रकम निकाल चुके थे।

पुलिस ने दिया ‘बॉस स्कैम’ नाम 

इस अनोखे तरीके से की गई ठगी को देखते हुए मुंबई पुलिस ने इसे ‘बॉस स्कैम’ नाम दिया। पुलिस के अनुसार, इस तरह के मामलों में अपराधी किसी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी की पहचान का इस्तेमाल करते हैं। वे सोशल मीडिया, इंटरनेट और अन्य माध्यमों से अधिकारियों की जानकारी जुटाते हैं और फिर उनके नाम से फर्जी प्रोफाइल बनाकर कर्मचारियों को निशाना बनाते हैं।

मुंबई क्राइम ब्रांच की दक्षिण साइबर पुलिस के लिए यह मामला सिर्फ एक धोखाधड़ी नहीं था, बल्कि देशभर में फैले एक बड़े साइबर नेटवर्क तक पहुंचने की चुनौती थी। पुलिस ने तकनीकी जांच, बैंकिंग ट्रांजेक्शन और डिजिटल फुटप्रिंट के आधार पर मामले की जांच शुरू की। हर बैंक खाते और पैसों के लेनदेन की कड़ी को जोड़ा गया, जिसके बाद पुलिस को इस गिरोह तक पहुंचने में सफलता मिली।

जांच के दौरान पुलिस ने महाराष्ट्र, बिहार और दिल्ली में एक साथ कार्रवाई की। सबसे पहले महाराष्ट्र के जालना, फिर बिहार के सीवान और इसके बाद दिल्ली में छापेमारी की गई। इस कार्रवाई में अब तक आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस पूछताछ में सामने आया कि यह गिरोह सुनियोजित तरीके से साइबर ठगी को अंजाम देता था।

आरोपियों का काम अलग-अलग बैंक खातों की व्यवस्था करना, ठगी की रकम को कई खातों में घुमाना और फिर पैसे को सुरक्षित तरीके से निकालना था। जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह के सदस्य ठगी की रकम से सोना खरीदते थे, ताकि पैसों के असली स्रोत को छिपाया जा सके और जांच एजेंसियों को भ्रमित किया जा सके।

कई डिजिटल साक्ष्य बरामद

पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों के पास से मोबाइल फोन, बैंक पासबुक, एटीएम कार्ड और कई अन्य डिजिटल साक्ष्य बरामद किए हैं। इन दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस अब गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश कर रही है।

इस मामले में पुलिस को बड़ी सफलता तब मिली, जब समय रहते कार्रवाई करते हुए 5 करोड़ 63 लाख 98 हजार रुपये से अधिक की रकम विभिन्न बैंक खातों में फ्रीज करा दी गई। इससे ठगी गई रकम का एक बड़ा हिस्सा सुरक्षित किया जा सका। हालांकि, पुलिस अधिकारियों का मानना है कि यह पूरा नेटवर्क काफी बड़ा है और इसमें कई अन्य लोग भी शामिल हो सकते हैं।

जांच में यह भी पता चला है कि ठगी की रकम से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और महाराष्ट्र के कई बड़े ज्वेलर्स से सोना खरीदा गया। अब पुलिस की टीमें इन राज्यों में जाकर उन लोगों और संस्थानों की भूमिका की जांच कर रही हैं, जहां इस रकम का इस्तेमाल किया गया।

मास्टरमाइंड तक पहुंचने का प्रयास जारी

मुंबई पुलिस की नजर अब इस गिरोह के मुख्य संचालक यानी मास्टरमाइंड तक पहुंचने पर है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि फर्जी पहचान तैयार करने, बैंक खाते उपलब्ध कराने और रकम को ठिकाने लगाने का पूरा नेटवर्क कैसे काम करता था।

साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह के मामलों से बचने के लिए किसी भी बड़े वित्तीय लेनदेन से पहले संबंधित अधिकारी से सीधे फोन पर पुष्टि करना बेहद जरूरी है। केवल WhatsApp मैसेज, प्रोफाइल फोटो या नाम देखकर भुगतान करना कंपनियों के लिए बड़ा जोखिम साबित हो सकता है। ‘बॉस स्कैम’ का यह मामला एक बार फिर बताता है कि साइबर अपराधी भरोसे और जल्दबाजी दोनों का फायदा उठाकर बड़ी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।

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